हारकर जीतने वाले बाजीगर बने योगी, जाने क्यों ?

कहते हैं गोरखपुर में बीजेपी की हार की आधी स्क्रिप्ट तो उसी दिन लिख दी गई थी, जब वहां से उपेंद्र दत्त शुक्ला को प्रत्याशी बनाया गया था. उपेंद्र शुक्ला अगर जीतते तो ये बीजेपी, मोदी और योगी की जीत से ज्यादा गोरखपुर के मठ की हार होती. गोरखपुर में बीजेपी की इस हार में कहीं न कहीं ‘मठ’ की अपनी जीत भी छिपी है. मोदी-शाह युग से पहले आलम ये था कि पूर्वांचल में एक वक्त में मामला योगी बनाम बीजेपी हो गया था. वह जिसे चाहते उसे टिकट मिलता, जिसे नहीं चाहते वह टिकट पाकर भी हार जाता. मजबूरन बीजेपी को उनके आगे घुटने टेकने पड़ते. उनकी हर बात माननी पड़ती. योगी की बनाई हिन्दू युवा वाहिनी इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी.

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला. मुख्यमंत्री के लिए कई नाम सामने आए. मनोज सिन्हा का नाम फाइनल तक हो गया. लेकिन ऐसा माना जाता है कि आरएसएस के समर्थन से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे. उनके मुख्यमंत्री बनते ही यूपी में सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राह्मणों में थी. यह बात केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंची. इसके बाद मोदी और शाह ने डैमेज कंट्रोल के लिए कई कोशिशें की, जिसमें महेंद्र पांडेय को यूपी बीजेपी का अध्यक्ष बनाना भी शामिल है. बीजेपी नेतृत्व पूर्वांचल में ठाकुर बनाम ब्राह्मण से भली भांति परिचित हो चुका था. इसलिए योगी की सीट पर टिकट देने के लिए किसी ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी, ताकि यहां भी संतुलन बनाया जा सके.

बीजेपी संगठन और आरएसएस की राय से गोरखपुर उपचुनाव के लिए उपेंद्र दत्त शुक्ल मोदी और अमित शाह की पहली पसंद बने. लेकिन सूत्र बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ कतई नहीं चाहते थे कि गोरखपुर का नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में जाए. योगी के सामने अपनी सीट बचाने से ज्यादा अहम था गोरखपुर में अपने ‘मठ’ की ताकत को बचाना. इसके बावजूद उपेंद्र दत्त शुक्ल को गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. चूंकि आदेश अमित शाह का था, तो इसके सीधे विरोध में जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. लेकिन अंदरखाने साजिशों और दुरभिसंधियों का दौर शुरू हो गया. बतौर सीएम योगी ने जमकर प्रचार किया, लेकिन योगी के लोग निष्क्रिय हो गए.

सभी जानते हैं कि पूर्वांचल में बीजेपी का मतलब योगी और योगी का मतलब संगठन है. ऐसे में किसी भी उम्मीदवार के लिए उनकी मर्जी के बिना जीत हासिल करना टेढ़ी खीर है. इस बार तो आलम ये रहा कि बूथ पर बीजेपी के एजेंट तक मौजूद नहीं थे. इसके उलट सपा और बसपा के समर्थक जोश से लगे हुए थे, जिसका परिणाम सबके सामने है।

गोरखनाथ मठ के बूथ पर वोटों को संख्या
सपा – 1775
कांग्रेस – 56
भाजपा – 43

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