लापता अधिकारी को क्यों किया 38 लाख का भुगतान?

देहरादून : जिस लेखा परीक्षा (ऑडिट) विभाग पर राज्य के सरकारी कार्यालयों की वित्तीय अनियमितता उजागर करने की जिम्मेदारी है, उसी विभाग में बड़ा गोलमाल सामने आया है। लेखा परीक्षा निदेशालय में जिस जिला लेखा परीक्षा अधिकारी को नवंबर 2013 में उत्तर प्रदेश के लिए रिलीव कर दिया गया था, उसे अब गुपचुप सेवा में वापस ले लिया गया है। संबंधित अधिकारी चार साल से अधिक समय सेवा से भी गायब रहे। इसके बाद भी उन्हें 38 लाख रुपये का पूरा वेतन भी जारी कर दिया गया है।

इस अधिकारी का नाम विरेश कुमार सिंह है। वर्ष 2007 में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में वित्त अधिकारी के रूप में कार्यरत रहने के दौरान विरेश कुमार को रिश्वत लेने के आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। नवंबर 2013 में निलंबन अवधि में ही इन्हें उत्तर प्रदेश के लिए रिलीव कर दिया गया था। उत्तर प्रदेश के हालिया ग्रेडेशन में भी अपने संवर्ग में इनकी वरिष्ठता सूची में 21वां स्थान भी दर्ज है। हालांकि, उत्तराखंड से रिलीव होने के बाद विरेश कुमार ने उत्तर प्रदेश में ज्वाइन ही नहीं किया। गंभीर यह कि वह उत्तराखंड में भी तैनात नहीं रहे, न ही उनके कार्यमुक्ति के आदेश को निरस्त किया गया था। इसके बाद भी अधिकारी को सेवा में वापस ले लिया जाना अपने आप में बड़ा सवाल है।

उधर, विरेश कुमार का दावा है कि उन्हें रिलीव करने का आदेश तत्कालीन प्रमुख सचिव वित्त राधा रतूड़ी ने निरस्त कर दिया था। हालांकि, चार साल से अधिक समय विभाग से बाहर रहने को लेकर वह स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए।

एसीपी के 40 लाख देने की भी तैयारी 

चार साल से अधिक अवधि तक गायब रहने के बाद सेवा में वापस लिए जाने वाले अधिकारी को अब एसीपी (एस्योर्ड कॅरियर प्रोगेशन) के रूप में 40 लाख रुपये और देने की तैयारी चल रही है। इसके लिए कमेटी का भी गठन कर दिया गया है।

सचिव वित्त और लेखा अमित नेगी ने बताया कि विरेश कुमार सिंह का निलंबन वापस ले लिया गया था। हालांकि उनके गायब रहने के बाद सेवा में वापस लिए जाने की जानकारी नहीं है। यदि ऐसा किया गया है तो यह गंभीर मामला है, इसकी जांच कराई जाएगी।

ऑडिट कार्मिकों में आक्रोश 

विरेश कुमार सिंह के प्रकरण के बाद लेखा परीक्षा निदेशालय के कार्मिकों में आक्रोश पनपने लगा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि एक तरफ उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी के लिए नियमों को ताक पर रखा जा रहा है, वहीं उत्तराखंड कैडर के अधिकारियों को चार वर्षों से कोई सेवा लाभ नहीं दिए गए हैं।

 

 

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