जेल की सलाखों के पीछे शुरू हुआ ये स्टार्टअप हुआ हिट

जूतों का ब्रांड नेम इनमेट अपने आप में एक पूरी कहानी है. इनमेट यानी जेल के कैदी इन जूतों को बनाकर बेचते हैं. ये जूते पुणे की येरवडा जेल में बनते हैं और इन्हें इस रूप में ढालते हैं येरवडा जेल के 70 कैदी फिलाहल ये काम कर रहे हैं. इस बिजनेस को दिवेज मेहता ने शुरू किया है. उन्हें ये ख्याल अपने कॉलेज टाइम में आया था. आइए जानें उनके बिजनेस के बारे में…

शुरू हुआ कारोबार: लेदर मैन्यूफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट दिवेज मेहता का पारिवारिक कारोबार है. कॉलेज के दिनों में इन्हें एक प्रोजेक्ट के दौरान कैदियों की स्किल डेवलपमेंट का आइडिया मिला. इसी आइडियो को उन्होंने बिजनेस  कॉन्सेप्ट में ढाल दिया. आज भले ही बात सुनने में सीधी लग रही होगी लेकिन कैदियों तक पहुंच बनाने से पहले दिवेज को तरह-तरह की मंजूरियां लेने के लिए सरकारी दफ्तरों में एड़ियां घिसवानी पड़ीं.

कैदियों को सीखाया काम: शूज और चप्पल बनवाने के लिए ट्रेन करवाने के लिए जेल प्रशासन से हां मिलने के बाद कैदियों को काम सिखाया.दिवेज और उनकी टीम ने कैदियों की ट्रेनिंग पर कड़ी मेहनत की लेकिन फिर भी एक ट्रेन्ड कैदी और एक स्किल्ड लेबर के बीच में बहुत बड़ा अंतर होता है.

कौदियों को मिलते हैं 200 रुपये: उन्होंने कहा कि जेल नियमों के मुताबिक कैदियों को 55 रुपये प्रतिदिन दिए जाने चहिए लेकिन कंपनी उन्हें 200 रुपये प्रतिदिन का देती है. कंपनी नई इकाइयां लगाने की योजना बना रही है. जहां कैदी अपनी सजा पूरी करने के बाद भी इस काम को जारी रख सकेंगे.

होती है ऑनलाइन बिक्री: मेहता ने बताया कि अब इनमेट के साथ काम करने वाले कैदियों की संख्या बढ़कर 60 हो गई है. इसमें 18-65 वर्ष के लोग काम करते हैं. नए कैदी भी इस काम से लगातार जुड़ रहे हैं. जब एक बार कैदी चप्पल का ऊपरी भाग ठीक से बना लेते हैं तो उसके बाद उन्हें पूरी चप्पल बनाने का काम दिया जाता है. जिसकी गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया जाता है ताकि उनकी ऑनलाइन बिक्री की जा सके.

 

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