Politics begins on the potholes of Mumbai

मुंबई में रास्तों के गड्ढों पर राजनीति शुरू

मुंबई में पश्चिम एक्सप्रेस-वे के जरिए कांदिवली से दादर आने में दो घंटे का समय लगता है. जबकि दोनों जगहों की दूरी महज 20 किलोमीटर है. ऐसा इसलिए कि सड़कों पर गड्ढे हैं या गडढों में सड़क, यह पता करना मुश्किल है. मुंबई में इन दिनों इन्हीं गड्ढों पर राजनीति चल रही है. ऊपर से पीडब्लूडी मंत्री चंद्रकांत पाटिल का कहना है कि लोग गड्ढों में गिरकर नहीं, बल्कि दूसरी वजहों से मरते हैं.

कार्ल माकर्स ने कहा था कि राजनीति एक बडा गड्ढा है और उसमें धर्म की भांग पडी है. लेकिन मुंबई और उसके आसपास राजनीति गड्ढे में है और उसमें भांग नही अब लोग गिरे पड़े हैं. अकेले मुंबई मे ही महानगरपालिका ने बारिश से पहले गड्ढे सुधारने पर 200 करोड रुपये खर्च कर दिए और अब फिर से इसके लिए बजट जारी किया जाएगा. महाराष्ट्र में गड्ढे भरने का बजट पांच हजार करोड़ रुपये तक जाता है. यानि सबकी कमाई है. मुंबई और उसके आसपास अब तक गड्ढों के कारण हुई दुर्घटना से 6 लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन सरकार के मंत्री चंद्रकांत पाटिल को यह नहीं दिखता. वह साफ कहते है, “इस साल बारिश ज्यादा हुई, इसलिए गड्ढे भी बन गए. अब ठेकेदार इनको भरेंगे लेकिन वक्त लगेगा. दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा.”

मुश्किल यह है कि सितंबर तक बारिश रहती है. उसी के साथ गणेश उत्सव, डांडिया और दिवाली जैसे त्यौहार आते हैं. जाहिर है लोग परेशान होंगे ही. लेकिन फिलहाल राजनीति उफान पर हैं. कांग्रेस नेता संजय निरुपम गड्ढे गिनो प्रतियोगिता कर रहे है तो मनसे ने पीडब्लयू डी के दफ्तर में घुसकर तोडफोड कर दी. कोई ये नही बताता कि सबके प्रतिनिधि बीएमसी में कार्पोरेटर हैं, उनकी भी तो जिम्मेदारी है कि अपने इलाकों की सड़के पहले ही ठीक करा लें. एक अंदाज के अनुसार, अकेले मुंबई में ही 80 हजार छोटे-बड़े गड्ढे हैं. जाहिर है ये जब तक भरेंगे, तब तक लोगो की सांसे अटकी रहेगी कि पता नही किस सडक पर जान चली जाए.

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