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नींव के पत्थरों पर ‘पत्थरदिल’ सियासत!

भूपेश पंत.

 

साफ दर्ज है कि पिथौरागढ़ में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की धरती पर गांधी आंदोलन को शुरू करने का श्रेय स्व. प्रयाग दत्त पंत को ही जाता है. उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव भी हासिल किया…

इस लेख की शुरुआत में फिर से अपनी बात दोहराना चाहूंगा कि जो समाज अपने इतिहास के नायकों का सम्मान नहीं करता उसकी कोख से सिर्फ खलनायक ही जन्म लेते हैं. इस बात में छिपी टीस देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ी मेरी पारिवारिक विरासत तक सीमित नहीं है बल्कि जात-पांत और क्षेत्रवाद के दायरों में उलझे समाज और संवेदनहीन सियासत का आईना भी है. उपेक्षा, अपमान और तिरस्कार से भरी ये सच्चाई है पिथौरागढ़ जनपद के पहले स्वतंत्रता सेनानी स्व. प्रयागदत्त पंत और उनके भाई स्व. बंशीधर पंत की. सबकुछ खो देने की मंशा से आजादी के आंदोलन में कूदे इन सेनानियों ने जिस देश के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर किया उसे हमारी सरकारें उचित सम्मान तक ना दे सकीं. इतना ही नहीं, स्व. प्रयागदत्त पंत के योगदान को राजनीतिक साजिश का शिकार बनाकर गुमनामी के अंधेरे में गुम कर दिया गया है. इस सेनानी का इससे बड़ा तिरस्कार क्या होगा कि पिथौरागढ़ जिले में उन्होंने आजादी की जो अलख जगायी, उससे प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे सेनानी के नाम पर वही कॉलेज समर्पित कर दिया गया जिसका नाम स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम पर रखे जाने की मांग सालों से की जा रही थी.

कुछ सियासी नुमाइंदों की शह पर सूबे का शासन और प्रशासन इतिहास के पन्नों को बदलने की आपराधिक साजिश में भी शामिल रहा जिसका खुलासा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचनाओं से हुआ…

पिथौरागढ़ पीजी कॉलेज को स्व. प्रयागदत्त पंत के नाम से जोड़ने की स्वतंत्रता सेनानियों और जनता की बेहद पुरानी मांग को ठुकरा कर कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार ने जिन स्व. लक्ष्मण सिंह महर के नाम से उसे जोड़ा वो पिथौरागढ़ में स्व. प्रयागदत्त पंत के आजादी की अलख जगाने के बाद ही स्वतंत्रता संग्राम में आये थे. साफ है कि तिवारी सरकार का ये फैसला जाति विशेष के वोट बैंक और संकीर्ण सोच पर आधारित था और तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के दबाव में लिया गया था. स्व. प्रयागदत्त पंत के साथ साथ यही उपेक्षा उनके भाई और स्वतंत्रता सेनानी स्व बंशीधर पंत को भी मिली. दोनों पंत भाई कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी भी रहे लेकिन ये कांग्रेस का ही नहीं देश का भी दुर्भाग्य है कि सम्मान देना तो दूर सूबे की सरकारों ने उनका एक तरह से तिरस्कार ही किया है. इतना ही नहीं पिछली हरीश रावत सरकार में कुछ सियासी नुमाइंदों की शह पर सूबे का शासन और प्रशासन इतिहास के पन्नों को बदलने की आपराधिक साजिश में भी शामिल रहा, जिसका खुलासा स्वतंत्रता सेनानी पंत परिवार के सदस्य और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन पंत के सामने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचनाओं से हुआ. पेशे से वकील जनार्दन पंत स्वतंत्रता सेनानी स्व. प्रयागदत्त पंत के छोटे भाई स्वतंत्रता सेनानी स्व. बंशीधर पंत के पुत्र हैं. वो पिछले कई सालों से अपने ताऊजी (स्व. प्रयागदत्त पंत) और पिता (स्व. बंशीधर पंत) को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मान दिलाने की जद्दोजहद में लगे हैं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. उनकी बड़ी बहिन और स्व. बंशीधर पंत की पुत्री स्व. कलावती जोशी ने भी इस बाबत लंबे समय तक हर चौखट खटखटायी लेकिन जीते जी उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी.

स्वतंत्रता सेनानी फर्जीवाड़े पर विरोध दर्ज कराते जनार्दन पंत (पिथौरागढ़)

 

बनाया फर्जी स्वतंत्रता सेनानी!

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की फेहरिस्त में न तो इस नाम के किसी व्यक्ति का रिकॉर्ड है और ना ही उनके नाम पर इस मद में कभी कोई पेंशन जारी की गयी है…

सूचना के अधिकार के तहत जनार्दन पंत को ये चौंकाने वाली जानकारी मिली कि पिथौरागढ़ ज़िले में जिन स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी बताकर राजकीय इंटर कॉलेज रोड़ीपाली का नामकरण किया गया, उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं है. जबकि पिथौरागढ़ के तत्कालीन कांग्रेसी विधायक मयूख महर ने उनके नाम के शिलापट का आनावरण करते हुए कहा था कि क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के नाम को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये उनकी विधानसभा क्षेत्र के नौ शैक्षणिक संस्थानों के नाम स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखे गये हैं. इस मौके पर विधायक जी ने स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा की ओर से इलाके में विद्यालय बनाने के लिये कई नाली जमीन दान पर देने का जिक्र किया था. लेकिन जब जनार्दन पंत ने स्व. बसेड़ा के स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान की पड़ताल करनी चाही तो पता लगा कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की फेहरिस्त में न तो इस नाम के किसी व्यक्ति का रिकॉर्ड है और ना ही उनके नाम पर इस मद में कभी कोई पेंशन जारी की गयी है.

बंशीधर पंत ने पिथौरागढ़ के सिमलगैर में खादी और सिंगर सिलाई मशीन के पुर्जों की दुकान खोली. उन्होंने अपनी दुकान में तिरंगा झंडा लगा रखा था जिसे हटवाने के लिये अंग्रेज प्रशासन ने उनके पूरे परिवार को प्रताड़ित किया…

राज्य में फर्जी स्वतंत्रता सेनानी बनाने का ये मामला सामने लाने और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू करवाने के लिये कागजी कार्यवाही कर रहे जनार्दन पंत आरोप लगाते हैं कि उत्तराखंड की पिछली हरीश रावत सरकार का ये रवैया क्षुद्र राजनीति, जातीय समीकरण और क्षेत्रवाद से प्रेरित था. पंत परिवार की ऐतिहासिक विरासत को लेकर राज्य सरकारों की उपेक्षा से क्षुब्ध जनार्दन पंत वजह जानना चाहते हैं कि आज़ादी के 70 साल बाद भी इन दोनों सेनानियों के नाम पर इनके अपने गृह जनपद पिथौरागढ़ में आजतक एक भी सार्वजनिक संस्थान क्यों नहीं है? क्या वजह है कि उत्तराखंड में आये दिन घोषित-अघोषित स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर शिक्षण संस्थाएं, सड़कें और दूसरे सार्वजनिक संस्थान बांटने वाली पिछली रावत सरकार इन दोनों पंत भाइयों के नाम पर चुप्पी साधे रही? पंत कहते हैं कि पिथौरागढ़ में स्व. रुद्र सिंह बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित करना और दो घोषित स्वतंत्रता सेनानियों की उपेक्षा करना इस बात का प्रमाण है कि पिछली हरीश रावत सरकार इस बाबत लिये गये अपने फैसलों में किसी छिपे एजेंडे के तहत काम कर रही थी. ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ की जा रही इस तरह की छेड़छाड़ सरकार के उच्च पदस्थ लोगों की मिलीभगत या शह के बिना मुमकिन नहीं है, लिहाजा इस खुलासे से निवर्तमान कांग्रेस सरकार के दूसरे फैसलों पर भी संदेह किये जाने के वाजिब कारण हैं. स्वतंत्रता सेनानी को लेकर हुए फर्जीवाड़े को लेकर जनार्दन पंत ने पिछले साल महामहिम राज्यपाल को भेजे ज्ञापन में स्व. बसेड़ा को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने की कार्यवाही में लिप्त साजिशकर्ताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सभी फैसलों की सीबीआई या किसी उच्च स्तरीय संस्था से जांच कराने की मांग की थी ताकि सरकार और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों की कारगुजारियां बेनकाब हो सकें. साथ ही उन्होंने स्व. प्रयागदत्त पंत और स्व. बंशीधर पंत का नाम उनकी गरिमा के अनुरूप पिथौरागढ़ जनपद के नाम या बड़ी शैक्षणिक संस्था से जोड़ने और स्व. प्रयागदत्त पंत की जीवनी को स्कूलों के पाठ्यक्रम में जगह देने की मांग भी दोहराई. जनार्दन पंत ने उत्तराखंड के काबीना मंत्री और क्षेत्रीय बीजेपी विधायक प्रकाश पंत से इस गंभीर मुद्दे पर उचित कार्रवाई करने और पंत भाइयों के त्याग को उचित सम्मान दिलाने की मांग की है.

 क्या किया पंत भाइयों ने!

बंशीधर पंत को अगस्त 1942 में जेल भेज दिया गया. परिवार दाने दाने को मोहताज था और दो बच्चे मृत्युशैया पर पड़े थे….. कुछ दिन पश्चात उनका एक पुत्र चल बसा.

बीडी पांडे लिखित कुमाऊं के इतिहास पर नज़र डालें तो स्व. प्रयाग दत्त पंत को पिथौरागढ़ जनपद (तत्कालीन अल्मोड़ा जनपद की सीमान्त तहसील) के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है. आज़ादी की लड़ाई में पं. गोविंद बल्लभ पंत, पं हरगोविंद पंत और बी. डी. पांडे के समकक्ष रहे प्रयागदत्त पंत को पिथौरागढ़ जिले में गांधीवादी आंदोलन का सूत्रधार माना जाता है. इतना ही नहीं उत्तराखंड की सिविल सेवाओं की परीक्षा हेतु राज्य के समग्र अध्ययन के लिये बौद्धिक प्रकाशन से प्रकाशित केशरी नंदन त्रिपाठी की सामान्य अध्ययन पुस्तिका में साफ दर्ज है कि पिथौरागढ़ में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की धरती पर गांधी आंदोलन को शुरू करने का श्रेय स्व. प्रयाग दत्त पंत को ही जाता है. उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव भी हासिल किया. गांधीजी के असहयोग आंदोलन के संदेश को अपने ओजस्वी विचारों के ज़रिये कुमाऊं के दूरदराज इलाकों के पिछड़े इलाकों में फैलाने वाले प्रयागदत्त पंत 1921 में बागेश्वर में आयोजित कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन में पिथौरागढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे. उनकी अकाल मृत्यु के बाद देश की आजादी के उनके अधूरे सपने को पूरा करने का बीड़ा उनके छोटे भाई स्व. बंशीधर पंत ने उठाया. बर्मा में जापानी हमले के बाद 1940 में पिथौरागढ़ आये बंशीधर पंत ने पिथौरागढ़ के सिमलगैर में खादी और सिंगर सिलाई मशीन के पुर्जों की दुकान खोली. उन्होंने अपनी दुकान में तिरंगा झंडा लगा रखा था जिसे हटवाने के लिये अंग्रेज प्रशासन ने उनके पूरे परिवार को प्रताड़ित किया. पिथौरागढ़ तहसील के कांग्रेस संगठन मंत्री की हैसियत से बंशीधर पंत को अगस्त 1942 में जेल भेज दिया गया. परिवार दाने दाने को मोहताज था और दो बच्चे मृत्युशैया पर पड़े थे. उन्हें इस शर्त पर छोड़ा गया कि सत्याग्रह करने पर सरकार को सूचित करना होगा और हाज़िरी लगानी होगी. कुछ दिन पश्चात उनका एक पुत्र चल बसा. 1946 तक बंशीधर पंत ने किसान संगठन का काम किया जिसमें छत्रसिंह आजाद, जगत सिंह चौहान, हरिदत्त शास्त्री और धर्म सिंह जैसे सेनानियों का उन्हें पूरा सहयोग मिला. बंशीधर पंत ने रजवारशाही के खिलाफ किसानों के उल्लेखनीय अहिंसात्मक संघर्ष का नेतृत्व करते हुए ज़मींदारों की बंदूकें छीन कर मालखाने में जमा करवाईं और भूमिहीनों के हक हकूक के लिये संघर्ष किया.

 

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