मुसलमानों में चल रहे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

नई दिल्ली। मुसलमानों में निकाह हलाला, बहुविवाह के अलावा अब मुता निकाह और मिस्यार निकाह (निश्चित अवधि के लिए शादी का करार) को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई है। हैदराबाद के रहने वाले मौलिम मोहिसिन बिन हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुसलमानों में प्रचलित मुता और मिस्यार निकाह को अवैध और रद घोषित करने की मांग की है। इसके अलावा याचिका में निकाह हलाला और बहुविवाह को भी चुनौती दी गई है।

शनिवार को वकील अश्वनी उपाध्याय के जरिये दाखिल की गई जनहित याचिका में मोहसिन ने महिलाओं को संविधान में मिले बराबरी और जीवन के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14,15 और 21 की दुहाई देते हुए मुता और मिस्यार निकाह, निकाह हलाला और बहुविवाह को रद करने की मांग की है। यह भी कहा गया है कि शरीयत एक्ट 1937 की धारा 2 के उन अंशों को रद घोषित किया जाए जिनमें इन्हें मान्यता दी गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि मुता विवाह एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का करार होता है, लेकिन मुता विवाह का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है, महिलाओं को मुता विवाह करने का अधिकार नहीं है। यही मिस्यारी निकाह में भी होता है। याचिका में कहा गया है कि व्यवहारिक तौर पर ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों का भविष्य अनिश्चित रहता होता है और समाज में भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता जो बाकी बच्चों को मिलता है।

क्या है मुता और मिस्यार निकाह

हैदराबाद के व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर शिया मुसलमानों में प्रचलित मुता और सुन्नी में प्रचलित मिस्यार निकाह को अवैध और रद घोषित करने की मांग की है। मुता और मिस्यार निकाह में मेहर तय करके एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का लिखित करार किया जाता है। समय पूरा होने पर निकाह स्वत: समाप्त हो जाता है और महिला तीन महीने की इद्ददत अवधि बिताती है।

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