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इन विधवा कॉलोनियों की सुध कौन लेगा ?

जैसे ज़ख्म अक्सर अपने निशान छोड़ जाते हैं, वैसे ही समय भी अपना निशान छोड़ जाता है। उसकी भी अपनी अलग पहचान होती है- कभी नाम से, कभी जगह से या फिर किसी समुदाय से। कुछ इसी तरह की पहचान के साथ अपने आप में सिमटी हुई है दिल्ली के तिलक विहार की ‘विधवा कॉलोनी’। यूं तो यहां भी आम सी गलियां और घर हैं लेकिन इस कॉलोनी में रहने वाले लोगों के ज़ख्मों और वक़्त ने कॉलोनी की इस पहचान को तय किया है।

1984 के सिख दंगों के पीड़ित लोगों को सरकार द्वारा यहां घर दिये गये थे। यहां हर घर में कम से कम एक पुरुष तो इन दंगों में अपनी जान खो ही चुका है। उनकी बेवाओं और बच्चों के लिये अब बस यही घर रह गए हैं। हर घर में मौजूद विधवा के कारण ही इस जगह का ‘विधवा कॉलोनी’ के नाम से बुलाया जाता है। शरीर तो कुछ ही पलों में दम तोड़ देता है लेकिन जो ज़िन्दा ही लाश बन जाए वह इंसान हर पल मरता है।

देश की राजधानी में मौजूद ये विधवा कॉलोनी, इस तरफ संकेत तो ज़रूर करती है कि संविधान की कल्पनाओं वाला लोकतंत्र  साकार नहीं हो पाया। ये कॉलोनी उस कानून व्यवस्था को भी चुनौती देती है जो अपने कंधे पर टंगी बंदूक को एक तमगे की तरह दर्शाता है पर फिर भी एक आम नागरिक के हितों की रक्षा करने में नाकामयाब रहता है।

हमारे इसी देश में एक और गांव है जिसके नाम के आगे विधवा जोड़ा जा रहा है। अमृतसर शहर के पास मौजूद इस गांव मकबूलपुरा में नशे के कारण हालात इतने ख़ौफ़नाक हैं कि यहां लगभग हर घर में एक मौत नशे के कारण ज़रूर हुई है। इसी के चलते इस गांव की पहचान भी विधवाओं के गांव के रूप में होनी शुरू हो चुकी है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई घरों में कोई भी पुरुष नहीं बचा है।

मकबूलपुरा की हरनाम कौर (बदला हुआ नाम) ने इसी गांव में अपने चार बेटों को नशे की आहुति में जलते देखा है फिर भी गरीबी के चलते वह इसी गांव में रहने को मजबूर हैं। ऐसा भी नहीं कि मकबूलपुरा के के बारे में कभी बात ना हुई हो। इसके बारे में बहुत लिखा गया है लेकिन आज भी नशे के कारण यहां किसी ना किसी पुरुष की मौत हो रही है और बाद में उसकी विधवा, इस गांव की पहचान बनकर ज़िंदगी गरीबी में बसर करने के लिए विवश है।

जहां 1984 के दंगों ने तिलक विहार में एक विधवा कॉलोनी को बसाया तो वहीं निराश और बेरोज़गार, पंजाब के सिखों को कब नशे की तरफ मोड़ दिया गया, इसका पंजाब में किसी को अंदाज़ा भी नहीं है। मकबूलपुरा की हरनाम कौर और बाकि महिलाएं भी यही सवाल करती होंगी कि यहां नशा इतनी आसानी से कैसे उपलब्ध है? अगर इसकी वजह पाकिस्तान का बॉर्डर है तो राजस्थान, गुजरात और कश्मीर में भी नशा इतनी आसानी से क्यों नहीं मिलता?

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