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जानिए , आखि़र क्यों धवस्त हुआ DU में भगवा किला ?

पूरे देश में जिस तरह मोदी लहर एक सुनामी बनकर देश की सबसे बड़ी और पूरानी पार्टी कांग्रेस पर कहर बनी, उससे साफ हो चुका था कि मोदी सुनामी के आगे किसी भी पार्टी का टिकाव शुन्य से अधिक नहीं है।तो क्या डीयू में हुए छात्र संघ चुनाव के नतीजे इस बात का संकेत है कि मोदी लहर अब थमने लगी है।

मोदी राज में पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी की ऐसी हार हुई। साल 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसके बाद हुए डीयूएसयू चुनाव में 18 साल बाद एबीवीपी ने शीर्ष चार पदों पर जीत हासिल की थी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शीर्ष दो पदों पर हार की सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। डीयूएसयू में चार साल बाद एबीवीपी को ऐसी हार मिली है। कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सीट पर जीत मिली है। वहीं एबीवीपी को सचिव और संयुक्त सचिव पद पर।

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने दावा किया है कि उसे सचिव और संयुक्त सचिव पद पर भी जीत मिली है लेकिन डीयू प्रशासन ने मिलिभगत से एबीवीपी को विजयी घोषित कर दिया।

वहीं इस जीत से उत्साहित कांग्रेस ने साफ किया है कि डीयूएसयू के चुनाव नतीजे को अदालत में चुनौती देगी। पिछले साल डीयूएसयू के चुनाव में कांग्रेस को केवल संयुक्त सचिव पद पर जीत मिली थी, बाकी तीन मुख्य सीटों पर एबीवीपी जीती थी। साल 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसके बाद हुए डीयूएसयू चुनाव में 18 साल बाद एबीवीपी ने शीर्ष चार पदों पर जीत हासिल की थी।

वहीं 2015 में भी एबीवीपी ने शीर्ष चारों पदों पर जीत हासिल की थी।डीयूएसयू में एबीवीपी की हार के पीछे अलग अलग वजह निकल कर सामने आ रही हैं। बहुत से लोग मान रहे हैं कि डीयू के रामजस कॉलेज में इस साल फरवरी में हुए एक सेमिनार को लेकर हुए विवाद से एबीवीपी को भारी नुकसान हुआ है। एबीवीपी के समर्थकों पर सेमिनार में शामिल होने वाले छात्रों और अध्यापकों के संग मारपीट का आरोप लगा था।

माना जा रहा है कि एबीवीपी के समर्थकों की जोरजबरी की राजनीति के खिलाफ छात्रों ने चुनाव में अपनो रोष व्यक्त किया। डीयूएसयू में एनएसयूआई की जीत के पीछे वामपंथी छात्र संगठनों की मेहनत भी एक वजह बतायी जा रही है। डीयूएसयू से कुछ दिन पहले आए जेएनयू छात्र संघ चुनाव में वामपंथी छात्र संगठनों के साझा उम्मीदवारों ने एबीवीपी को सभी शीर्ष पदों पर हराया था।

पिछले कुछ सालों से जेएनयू किसी ने किसी वजह से चर्चा में है। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उपाध्यक्ष शहला रशीद, उमर खालिद समेत कई छात्र नेता मोदी सरकार और बीजेपी की तीखी आलोचना करते रहे हैं। एक सबसे बड़ी वजह ये भी है कि डीयू में वामपंथी छात्र संगठन मजबूत नहीं हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा बीजेपी और एबीवीपी के खिलाफ बनाये गये माहौल का सीधा फायदा कांग्रेस के छात्र संगठन को हुआ है।ं

 

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