क्यों मुट्ठी भर नक्सलियों के आगे कमजोर पड़ा सरकारी सिस्टम?

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के सुकमा में साल का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ है। इस हमले में सीआरपीएफ के 9 जवान शहीद हो गए। गश्त पर निकले सीआरपीएफ जवानों पर 100 से ज्यादा नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। ऐसा नहीं है कि इन्होंने तैयारी पूरी नहीं की थी। सभी जवान एंटी लैंडमाइन व्हीकल में सवार थे लेकिन विस्फोट इतना भयानक था कि 9 जवान शहीद हो गए। मऊ हो या भिंड, हापुड़ हो या नागपुर, शहीदों की रुकी हुई सांस ने सबको अपना कर्जदार बना दिया है। किसी के परिवार में मां-बाप अकेले रह गए तो किसी के परिवार में पत्नी। हम और आप इस दर्द की सिर्फ कल्पना कर सकते हैं।

जिस जगह पर ये हमला हुआ था वो अति संवेदनशील है। नक्सली यहां जवानों को देखना नहीं चाहते और जवान इस इलाके में लोगों को सुरक्षा देना चाहते। ये एक ऐसा इलाका है जहां एक तरफ ओडिशा की सीमा है तो दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश का बॉर्डर। एक तरफ तेलंगाना की सीमा। नक्सली इस इलाके में कोई भी निर्माण कार्य होने नहीं देते क्योंकि ये उनके लिए घातक हो सकता है।

इस हमले के बाद सरकार कह रही है हमने इसे चुनौती की तरह लिया है लेकिन फिर वही सवाल। सरकार हर बार ऐसे हमलों के बाद यही जवाब देती है जबकि जमीन पर जवानों की सुरक्षा के लिए क्या हो रहा है कुछ नजर नहीं आता। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने शहीदों के परिवार वालों को नौकरी भी देगी और मुआवजा भी लेकिन परिवार वाले सुरक्षा भी चाहते हैं। ये सवाल हर किसी के जेहन में है कि क्यों मुट्ठी भर नक्सलियों के सामने कमजोर हो जाता है हमारा सिस्टम। आधुनिक हथियारों से लैस हमारे जवान क्यों नहीं परख पाते हैं नक्सलियों के चाल को। कमजोरियों कहां है। ये देश अब और जवानों की शहादत नहीं चाहता।

वहीं इस हिंसा में पिछले दो दशक से ज्यादा वक्त में 12,000 लोगों की जान गई है जिसमें 2,700 सुरक्षाकर्मी हैं। गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के मुताबिक, मारे गए लोगों में 9,300 ऐसे मासूम नागरिक शामिल हैं जिनकी या तो नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर बताकर हत्या कर दी या वे सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच की गोलीबारी में आ गए थे। हालांकि सुरक्षा बलों पर वक्त-वक्त पर होते हमलों के बावजूद पिछले 3 सालों में नक्सल हिंसा में 25 फीसदी की गिरावट आई है।

नक्सल शब्द की उत्पत्ति

नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है।

1967 में नक्सलवादियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया। आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।

 

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