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सत्ता संभालने के तीन साल बाद कहां है सबका विकास ?

(सुबीर रॉय)

आम तौर पर यह माना जाता है कि वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बनने में ‘सबका विकास’ का नारा अहम रहा। प्रश्न यह है कि इस मोर्चे पर राजग सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा है? यह सवाल अहम है क्योंकि भाजपानीत केंद्र सरकार के पांच साल के कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे होने को हैं। अब वह अगले चुनाव की तैयारी में लग गई है। समावेशी विकास लोगों के जीवन में दो तरह से बदलाव लाता है। रोजगारशुदा लोगों की आय बढ़ती है जबकि बेरोजगारों को रोजगार मिलते हैं। अब तक धारणा यही है कि रोजगार वृद्घि धीमी रही है। आर्थिक समीक्षा में भी इस बात को स्वीकार किया गया। निकट भविष्य में कोई सुधार होता भी नहीं दिखता। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक देश में बेरोजगारी का स्तर वर्ष 2017 और 2018 में भी 3.4 फीसदी के मौजूदा स्तर पर ही बना रहेगा। जबकि वर्ष 2016 में यह 3.5 फीसदी था। वर्ष 2016 के मुकाबले बेरोजगारों की तादाद तीन लाख बढ़कर 2018 में 1.8 करोड़ हो जाएगी।

यानी जो रोजगारशुदा हैं उनको सकल घरेलू उत्पाद में 7 फीसदी से अधिक की वृद्घि का लाभ मिला। प्रति व्यक्ति आय में हुए साल दर साल इजाफे में भी उनका फायदा हुआ। लेकिन बढ़ती आय समान रूप से बेहतरी का सबब यहां भी नहीं बनी क्योंकि रोजगार की गुणवत्ता में कमी आई। सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों क्षेत्र अस्थायी कर्मचारियों को रखने पर तवज्जो दे रहे हैं।
वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद देश के रोजगार क्षेत्र में तीन सकारात्मक बातें थीं। पहला, विनिर्माण क्षेत्र में उछाल थी और खेती छोड़कर आए श्रमिक वहां काम पर लग गए। इससे खेतिहर मजदूरों का मेहनताना बढ़ा। इससे कृषि और गैर कृषि हर क्षेत्र में आय का स्तर सुधरा। इस अवधि में निर्यात भी बेहतर था। कपड़ा उद्योग जिसकी रोजगार में अहम भूमिका है, उसका निर्यात में अहम योगदान रहा। जहां तक मध्यम वर्ग की बात है तो सॉफ्टवेयर और सेवा क्षेत्र में उसे खूब रोजगार मिले। दिसंबर 2014 से दिसंबर 2015 के बीच रोजगार में जो बढ़ोतरी हुई वह पूरी तरह कपड़ा और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ही हुई।
मौजूदा परिदृश्य कुछ ऐसा है कि ये दोनों ही क्षेत्र न तो निर्यात और न ही रोजगार में कोई मदद कर पा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में सुधार की स्थिति मिलीजुली है। विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन लगातार कम हुआ है। यह वर्ष 2014-15 के 3 फीसदी से घटकर 2015-16 में 2.8 फीसदी हुआ और 2016-17 में उसके बढ़कर 3.1 फीसदी होने की उम्मीद है। कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले कपड़ा क्षेत्र की हालत तो और भी बुरी है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के मुताबिक वर्ष 2014-15 में इसमें केवल 2.8 फीसदी की दर से इजाफा हुआ। वर्ष 2015-16 में यह घटकर 2.6 फीसदी हुआ और वर्ष 2016-17 के अप्रैल-जनवरी में यह 1.2 फीसदी के निराशाजनक स्तर पर रहा। कपड़ा और उसके सह उत्पादों का निर्यात 2013-14 में 12.4 फीसदी था। वर्ष 2014-15 में यह घटकर 0.5 फीसदी रह गया और वर्ष 2015-16 में यह 3.2 फीसदी ऋणात्मक हो गया।
इतना ही नहीं, सूचना प्रौद्योगिकी और बीपीओ क्षेत्र भी संकट के दौर से गुजर रहा है। स्वचालन और कृत्रिम बुद्घिमता के तेज विस्तार ने इन कंपनियों में कर्मचारियों की तादाद में कमी की है। यही वजह है कि इस समय इन क्षेत्रों में  वृद्घि और कर्मचारियों के रोजगार में कोई तारतम्य नहीं नजर आ रहा है। रोजगार में वृद्घि, शीर्ष वृद्घि से पीछे है। इस बीच स्टार्टअप के अच्छे दिन भी समाप्त हो चुके हैं। अब उनको उस तरह वेंचर कैपिटल नहीं मिल पा रहा है जैसा शुरू में मिलता रहा है। अब वे भी रोजगार में कटौती कर रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की समस्याओं के लिए जहां वे खुद प्रत्यक्ष जिम्मेदार नहीं हैं, वहीं नोटबंदी का कदम उठाकर मोदी सरकार ने सूक्ष्म, मझोले और छोटे उद्यमों की हालत ही खराब कर दी। सरकार को पता था कि यह क्षेत्र ग्रामीण इलाकों से पलायन करके आने वाले लोगों को सबसे अधिक रोजगार देता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उसने मुद्रा की स्थापना भी की थी लेकिन नोटबंदी ने इस विचार को जबरदस्त झटका पहुंचाया।
इसने आपूर्ति शृंखला को बाधित कर दिया और छोटे उद्यम जहां रोजमर्रा का काम नकदी में होता था वे इससे निपट नहीं पाए। 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोट बंद होने से उसे तगड़ा नुकसान पहुंचा और वे कारोबार एक तरह से बंद हो गए। इनमें काम करने वाले श्रमिकों में से कई प्रवासी थे। उनका पैसा और काम दोनों छिन गया और उन्हें मजबूरन अपने घर वापस जाना पड़ा। इसकी वजह से अगले कई महीनों तक दिक्कत बनी रही। कामगारों पर असर साफ नजर आया। अब यह देखना है कि सरकारी अंाकड़ों में यह असर किस तरह परिलक्षित होता है।
इस परिदृश्य के उलट कृषि क्षेत्र में जीडीपी के वर्ष 2016-17 के दौरान 4.4 फीसदी की तेज गति से विकसित होने की उम्मीद है। अब तक यह नहीं पता है कि समावेशी विकास में यह किस तरह असर डालेगी लेकिन अखबारों में ऐसी तमाम खबरें आई हैं जिनके मुताबिक किसान बंपर फसल को लेकर चिंतित हैं क्योंकि इससे उपज की कीमत गिरती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कृषि ऋण माफी की घोषणा की है और अन्य राज्य भी उसका अनुसरण कर सकते हैं। सरकार खुद यह नहीं मानती कि कृषि में उछाल से विकास को गति मिलेगी। कुछ लोगों की दलील है मोदी और भाजपा को मालूम है कि सबका विकास का नारा काम नहीं करेगा इसलिए वे हिंदुओं को एकजुट करने की नीति अपना रहे हैं। इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से हुई और शायद पार्टी के हाथ जीत का फॉर्मूला भी लग गया है जिसे आगे आजमाया जाएगा।

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