क्या फर्क है दूसरे नाकाम रहे मुख्यमंत्रियों और त्रिवेंद्र में ?

(लेखक : योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार, देहरादून )

राजधानी अटी हुई है त्रिवेंद्र के “गुणगान” से, “केंद्र में नरेंद्र, उत्तराखंड में त्रिवेंद्र” और “भ्रष्टाचार पर प्रहार, पारदर्शी सरकार” जैसे नारे हर मोड़ और चौराहे पर हैं । समाचार पत्रों के पन्ने एडवर्टोरियल से रंगे हैं तो पार्टी से लेकर सरकार का पूरा तंत्र प्रचार में जुटा है, करोड़ों रुपया प्रचार पर लुटाया जा रहा है। उत्तराखंड के लिये यह सब कोई नया नहीं है, सालों से उत्तराखंड यही देखता आया है। नया है तो सिर्फ ‘अंदाज’ और जुमले ।

मुख्यमंत्री एक ओर तो बात करते हैं ‘धर्मयुद्ध’ की और दूसरी ओर मनता है जश्न, एक ओर जीरो टालरेंस और दूसरी ओर लाखों की फिजूलखर्ची । समझ नहीं आ रहा है कि त्रिवेंद्र यह कैसा ‘धर्मयुद्ध’ लड़ रहे हैं । अगर ‘धर्मयुद्ध’ लड़ा जा है तो रहा है तो फिर यह जश्न कैसा ? अब जब बात निकली ही है तो दूर तक जाएगी ही। आखिर मुख्यमंत्री किस ‘धर्मयुद्ध’ की बात कर रहे हैं? किस प्रहार का जिक्र कर रहे हैं ? क्या एनएच घोटाले में चंद मझोले व छोटे अफसरों को सलाखों के पीछे डालने को भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार कह रहे हैं ?

ऐसा है तो वह भूल रहे हैं कि यह साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये का घोटाला है, जो उनकी सरकार ने नहीं खोला बल्कि हाईकोर्ट के निर्देश पर हुई जांच में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में ही खुल चुका था। इस सरकार ने तो सीबीआई जांच की घोषणा की जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ। यह उस दिन ‘धर्मयुद्ध’ या भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार साबित होगा जिस दिन घोटाले के मास्टर माइंड, बड़े अफसर और सफेदपोश बेपर्दा होंगे। सिर्फ यह कहने भर से ही कुछ नहीं होता कि घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को उनकी जगह पहुंचा कर रहेंगे। सच यह है कि प्रदेश के हालात किसी से छिपे नहीं हैं, भ्रष्टाचार की कहानियां हर जुबां पर है ।

डोईवाला अस्पताल निजी हाथों में क्यों गया, भू कानून के दायरे से जमीनें क्यों निकली, आबकारी नीति में बदलाव क्यों हुआ, लोकायुक्त क्यों नहीं बन रहा, अतिक्रमण के खिलाफ अभियान क्यों रुका, इन सबके सही जवाब नहीं हैं किसी जिम्मेदार के पास । यह सही है कि पुराने चेहरे सत्ता के गलियारों से नदारद हैं, लेकिन ऐसा कतई नहीं रामराज आ गया हो। साल भर में यह भी समझ आने लगा है कि सत्ता के गलियारों में घूमने वाले पुराने दलालों के समीकरण अंदरूनी सियासी ध्रुवों के चलते बिगड़े हुए हैं। लेकिन मौजूदा मुख्यमंत्री के बगलगीर सत्ता का पूरा आनंद उठा रहे हैं। सिफारिशियों का अभी भी बोलबाला है, मनचाहे ठेके, मनचाही नौकरी, पोस्टिंग और प्रमोशन अभी भी विशेषाधिकार के दायरे में ही हैं।

घपलों की फाइलों पर आज भी पहरा है, भ्रष्टाचार और घोटालों पर हल्ला या सरकार की हरकत सिर्फ सियासत का दाव बना हुआ है । सरकार एक्शन में होती तो व्यवस्थाएं पटरी पर भी होतीं । तमाम उदाहरण है जहां सरकार पर सवाल हैं । शुरुआत भ्रष्टाचार से ही, केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले सरकार को इक सुराग दिया कि राज्य में हर साल एक करोड़ लीटर कैरोसिन की हेराफेरी हो रही है। कैरोसिन उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा है। मुद्दा बहुत गंभीर था, कम से कम पंद्रह करोड़ रुपये सालाना का घोटाला। मंत्रालय से लेकर विभाग के जिम्मेदारों की मिलीभगत के बिना जो कतई संभव नहीं। मुख्यमंत्री अगर वाकई धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं, तो क्यों नहीं कैरोसिन के चोर सलाखों के पीछे पहुंचे ?

हकीकत यह है कि पहुंचेंगे कैसे? कैरोसिन का यह खेल हर सरकार में साल दर साल चलता आ रहा है। केंद्र के खुलासे के बाद भी इस पर सन्नाटा पसरा है। चलिए अब बात सिडकुल की। सिडकुल यानी उत्तराखंड में भ्रष्टाचार का सबसे बड़े गढ़। अफसरों, नेताओं और ठेकेदारों के लिए हमेशा सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना रहा। ऐसा नहीं है कि त्रिवेंद्र सरकार को सिडकुल की कारस्तानियों की कोई जानकारी नहीं है। सिडकुल की जमीन की बंदरबांट को लेकर भाजपा विपक्ष में रहते हुए तमाम दस्तावेजों के साथ खासा हल्ला करती रही है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसका रुख बदल जाता है। सालभर पहले जब सरकार बनी तो उसके संज्ञान में एक नया मामला आया। पता चला कि सिडकुल में औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के नाम पर सात सौ करोड़ रुपये ठिकाने लगाए गए।

मुख्यमंत्री ने मामले की जांच कराई को प्रारंभिक जांच में ही यह सही पाया गया। लेकिन इसके बाद इस मामले में भी सन्नाटा छा गया। भ्रष्टाचार पर जिस प्रहार का दम सरकार भर रही है, इस मामले में वह प्रहार कहीं नजर नहीं आया। जबकि हकीकत यह है कि अकेले सिडकुल से ही भ्रष्टाचार का सफाया हो जाए तो संदेश साफ नजर आने लगे। अब जिक्र खाद्यान घोटाले का, सरकार ने करोड़ों रुपये के खाद्यान घोटाले पर से पर्दा जरूर उठाया लेकिन जितनी तेजी से पर्दा उठा, उतनी ही तेजी से पर्दा गिरा भी दिया गया। शुरुआती दौर में यह लगा कि इस घोटाले में पुरानी सरकार के कई दिग्गज धरे जाएंगे लेकिन बाद में पता चला कि जांच की आंच खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के एक बगलगीर के रिश्तेदार तक पहुंच रही है, जिसके बाद जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई। ऐसा ही कुछ हश्र सरकारी बसों की खरीद में हुए घोटाले की जांच का हुआ, जिसमें 100 करोड़ रुपये में पुराने माडल की 429 बसें खरीदी गईं।

तस्वीर साफ होने के बावजूद सरकार की ओर से कोई एक्शन नहीं । तकरीबन सोलह करोड़ रुपये का बीज घोटाला भी अब चंद लोगों पर मुकदमा दर्ज करने के बाद ठंडा पड़ चुका है। यह तो रही बात चंद उन घोटालों की, जिन्हें लेकर सरकार ने कुछ समय तक सुर्खियां भी बटोरी। अब बात सरकार के उन फैसलों की जो जीरो टालरेंस और पारदर्शिता दोनो पर सवाल उठाते हैं। चुनाव आचार संहिता से 15 दिन पहले चालीस स्टोन क्रशर, 20 स्क्रीनिंग प्लांट और आधा दर्जन से अधिक निजी नाम भूमि पर खनन के पट्टे पिछली सरकार ने जारी किए, जिन पर नई सरकार ने आते ही पहले रोक लगाई, वाहवाही बटोरी और उसके बाद चुपचाप उन्हें बहाल कर दिया। हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे निजी खनन पटटों पर चुगान शुरू करने की अनुमति दी, पहले यह कह कर रोक लगा दी गयी कि इसका भारतीय मृदा प्रशिक्षण संस्थान से अध्ययन कराया जाएगा और बाद में रोक हटा ली गयी। सरकार के यह फैसले क्या संदिग्ध नहीं ?

यही नहीं जिन तबादलों पर सरकार ने रोक लगायी उन्हें बहाल कर कर दिया । सवाल तो बनता है कि सरकार के धर्मयुद्ध में आखिर यह कौन सी संधि थी ? सरकार धर्मयुद्ध और प्रहार की बात कर रही है तो क्या सरकार दावा कर सकती है कि अब प्रदेश में घूसखोरी बंद हो चुकी है । विधायक निधि में कमीशनखोरी नहीं हो रही है । शिक्षा महकमे में अटेचमेंट का और दूसरे महकमों में प्रतिनियुक्त पर भेजने का खेल बंद हो चुका है। आबाकरी और खनन में पूरी पारदर्शिता के साथ काम चल रहा है । लोक निर्माण विभाग और सिंचाई के ठेकों में मनमानी नहीं चल रही ।

सच यह है कि सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस का जुमला भले ही गढ़ ले लेकिन पारदर्शिता सिर्फ नारों में है । आखिर त्रिवेंद्र भी तो वही सब कर रहे हैं जो और मुख्यमंत्री करते आए हैं । क्या फर्क है दूसरे नाकाम रहे मुख्यमंत्रियों और त्रिवेंद्र में ? तो फिर यह धर्मयुद्ध जैसी बात क्यों सरकार ?

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