हमें गरीब कुम्हारों का ध्यान ही नहीं रहता

कल दीयों का त्योहार दिवाली है। लोगों में इसे लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। सभी अपने-अपने घरों की साफ-सफाई और उसे बिजली की सुंदर-सुंदर लड़ियों से सजाने में व्यस्त हैं। मगर हमें यह जरूर जानना चाहिए कि दिवाली का त्योहार मूलत: है क्या? यह बम-पटाखों या लड़ियों का त्योहार नहीं है, बल्कि जब श्रीराम अपना वनवास खत्म करके वापस अयोध्या लौटे थे, तो खुशी में अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाए थे और इसने अमावस्या भरी अंधेरी रात को उजाले से भर दिया था। आज भी इसी सोच को अपनाने की जरूरत है।

हम लड़ियां खरीदने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि हमें गरीब कुम्हारों का ध्यान ही नहीं रहता। अमावस्या की अंधेरी रात को चाइनीज लाइट रोशन नहीं कर सकती, जबकि दीये जलाने से हम उन लोगों की जिंदगी भी रोशन कर पाएंगे, जो दीये बनाते और बेचते हैं। आखिरकार सभी के साथ मिल-जुलकर खुशियां मनाना ही तो  त्योहार का मूल अर्थ है।

दिवाली पर लघु और मध्यम उद्योगों को केंद्र सरकार की तरफ से तोहफा दिया गया है। अब केवल 59 मिनट में एमएसएसई के तहत आने वाले उद्योगों को एक करोड़ रुपये तक का लोन उपलब्ध हो जाएगा। यह निर्देश उस सर्वे की प्रामाणिकता को भी दर्शाता है कि भारत दस्तावेजों में नहीं, बल्कि हकीकत की जमीन पर भी विकास की राह पर है। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत में बेरोजगारी की दर कम हो जाएगी और नौजवानों को नौकरी के लिए यहां-वहां धक्के न खाने पड़ेंगे। इन सबसे देश में व्यापार करना सरल हो जाएगा और लोगों की माली जरूरतें भी पूरी हो जाएंगी।

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