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लद्दाख में पानी की समस्या को खत्म करने वाला शख्स

बचपन से ही हमें प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपयोग करने का सुझाव दिया जाता रहा है। हमें यह अक्सर बताया जाता है कि प्रकृति के नायाब तोहफे हमे बार-बार नहीं मिलते इसलिए जरुरी है कि हमे जो कुछ भी प्राकृतिक रूप से मिला है हम उसका प्रयोग बेहद सावधानी से करें। हालाँकि हम इस बात को भली भाँती जानते हैं कि मनुष्य अपनी उत्तरजीविता के लिए समस्त संसाधनों का सतत प्रयोग करता जायेगा और एक अवस्था में आकर
वो सारे संसाधन नष्ट हो जायेंगे, यही नियति है।

ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए हमे कुछ ऐसे संसाधनों की आवश्यकता होगी जो मानव निर्मित हों और प्राकृतिक संसाधनों के विकल्प के तौर पर उभरे। उदाहरण के तौर पर, पेट्रोल–डीज़ल के बजाय अब सीएनजी के उपयोग पर जोर दिया जाता है। मानव निर्मित संसाधन भले ही विकल्प
के तौर पर तैयार किये जाते हों, लेकिन वो कारगर भी हों ऐसा हर बार जरुरी नहीं। लेकिन भारत में एक ऐसा ही मानव निर्मित संसाधन उत्पादित किया गया जो बेहद कारगर भी साबित हुआ है, जिसके विषय में हम आप सभी से बात करेंगे।

हम आपका परिचय एक ऐसी शख्सियत से करवा रहे हैं जिसने सन1987 में भारत का प्रथम‘कृत्रिम ग्लेशियर‘ बना कर सबको चौंका दिया था। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं भारत के‘बर्फ–मानव‘  चेवांग नोर्फेल की जिन्हे अबतक 12‘कृत्रिम ग्लेशियर‘ बनाने का श्रेय जाता है। उन्हें इस उपलब्धि के लिए सन2015 में देश के चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है। इसके अलावा उन्हें अन्य कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

बात दरअसल1987 की एक ठण्ड रात की है, जब चेवांग काम से घर लौट रहे थे। उन्होंने एक पाइप से पानी को बहते और फिर एक जगह जाकर इकट्ठा होकर बर्फ में तब्दील होते देखा। अगर लद्दाख़ की बात की जाये तो वहां पानी की विकट समस्या है और 80 प्रतिशत की आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है, चेवांग को उस पाइप से बहते पानी में उस इलाके में पानी की समस्या का एक रोचक उपाय मिला। चूँकि वो खुद एक सिविल इंजीनियर थे तो उन्हें ऐसे ही पानी इकट्ठा करके‘कृत्रिम ग्लेशियर‘ बनाने का ख्याल आया।

आखिर क्या थी कृत्रिम ग्लेशियर की रूपरेखा ?

चेवांग इस बात को भली भाँती समझते थे कि अगर पानी के बहाव की गति सामान्य से धीमी कर दी जाए तो उसके तीव्रता से जम जाने की संभावना अधिक रहती है, चूँकि वो उस इलाके में स्कूल, डैम, सड़क बनाने के काम के माहिर रहे थे तो उन्होंने इसके लिए कई सारे गेटनुमा दीवारों एवं पिट्स/गड्ढों (तस्वीर देखें) का निर्माण किया और उसे एक दूसरे से उचित दूरी पर पानी के आकर इकट्ठा होने के गणित से स्थापित कर दिया।

अब बारी थी पानी को उचित रूप से दिशा देने की और चूँकि पानी का बहाव हर कहीं सामान्य गति से होता था और इसलिए वह हर जगह बर्फ में तब्दील नहीं होता था। चेवांग ने पानी के बहाव की गति में विभिन्न जरियों से अवरोध उत्पन्न किये जिससे पानी के जम कर बर्फ बनने की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सकता था।

इस प्रकार से न ही सिर्फ चेवांग ने पानी की गति धीमी की बल्कि उसे इकट्ठा करने का भी उचित इंतज़ाम किया और ऐसा करते हुए वो अबतक 12 कृत्रिम ग्लेशियर बना चुके हैं और चूँकि यह ग्लेशियर सामान्य ग्लेशियर की तुलना में कम ऊंचाई पर बने थे और खेतिहर इलाके के आस पास थे इसलिए इनके गलने की प्रक्रिया जटिल नहीं थी और इस पानी का इस्तेमाल खेती के लिए सहज रूप से किया जाने लगा।

चेवांग के पूरे प्रयास से हमें यह प्रेरणा अवश्य मिलती है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। ऐसे कितने ही लोगों ने दुनिया की रूपरेखा बदल दी क्योंकि वो दुनिया की समस्याओं को अपनी समस्या समझ कर स्थिति को सुधारने के दिशा में प्रयास कर पाए। हम अक्सर सरकारों एवं सरकारी विभागों को अपनी समस्या के लिए कोसते हैं, लेकिन क्या कभी हम खुद प्रयास करते हैं अपने समस्या का हल पाने के लिए?

चेवांग ने बस कोशिश भर की और आज वो हम सभी के लिए प्रेरणा बन कर उभरे हैं, उन्होंने न सिर्फ इसे अपनी समस्या के तौर पर देखा बल्कि अपने पूरे गाँव की समस्या समझकर कड़ी मेहनत करके आज यह मुकाम हासिल किया की उन्हें देश ने बर्फ मानव की उपाधि से नवाज़ा। हमे गर्व है कि हम ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ लोगों की इंसानियत की कोई सीमा नहीं है।

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