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कैसे बर्बाद हो रहा एक चौथाई अनाज

लखनऊ। दैवीय आपदा से अगर किसानों की फसल बच गई तो उनकी उपज का एक चौथाई भाग बीमारियों और लापरवाही की भेंट चढ़ना तय है। उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में उपज का 26 प्रतिशत खाद्यान्न कीटों, फसल की बीमारियों और रखरखाव की खामियों की वजह से खराब हो जाता है। वहीं आरटीआई से सामने आई जानकारी के अनुसार 25 राज्यों में एफसीआई के गोदामों में करीब 8679.39 मीट्रिक टन अनाज खराब हो गया।

उत्तर प्रदेश में किसानों की 26 प्रतिशत फसल खेत में ही बर्बाद हो जाती है। “प्रदेश में किसानों की 26 प्रतिशत फसल खराब हो जाती है। कभी-कभी रोगों से होने वाली क्षति महामारी का रूप भी ले लेती है और इसके प्रकोप से शत-प्रतिशत तक फसल नष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है,” ज्ञान सिंह, कृषि निदेशक, उत्तर प्रदेश बताते हैं, “इसलिए बुवाई से पूर्व सभी फसलों में बीजशोधन का कार्य शत-प्रतिशत कराया जाना बहुत अधिक आवश्यक है।” जहां, किसानों को अपनी मेहनत और लागत का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। वहीं, दूसरी ओर भंडार गृहों में लाखों टन अनाज बर्बाद होने से देश की अर्थव्यवस्था को चपत लग रही है।

किसानों को फसलों को कीट-पतंगों और बीमारियों से बचाव के लिए मिलने वाली ट्रेनिंग के बारे में हरदोई के कोथावां ब्लॉक के बेलंदखेड़ा निवासी कमलकिशोर (32) बताते हैं, “दो साल पहले ब्लॉक में कुछ किसानों को कीट-पतंग रोधक किट मिली थी। तबसे कुछ नहीं मिला।” एक चौथाई से भी अधिक उपज की बर्बादी में से सबसे बड़ी भूमिका किसानों को सही समय पर सलाह न मिलना है। हालांकि उत्तर प्रदेश कृषि विभाग नए सिरे से एक अभियान चलाकर कृषि उपज को बचाने के लिए जागरुकता अभियान चलाने की बात कह जरूर रहा है।

ब्लॉक के ही गाँव मुन्नालाल खेड़ा निवासी किसान जगदीश (42) कहते हैं, “उनके खेत में कौन सा रोग लगा है, कैसे निदान करें, इसकी कोई जानकारी नहीं है। कई बार ब्लॉक आफिस भी गए, वहां से कोई जानकारी नहीं मिली।” वहीं हरदोई जिले के ही भरावन ब्लॉक के अतरौली निवासी सुधीर कुमार (33) कहते हैं, “हमारे गाँव में कभी न तो कोई कृषि विभाग का अधिकारी आया और न ही किसी ने बताया कि अगर फसल में ये बीमारी लगी है तो ये उपाय करो। जब भी उनकी फसल में कुछ दिक्कत होती है तो वह बराती चाचा (उन्नतशील किसान) (68) से बात कर लेते हैं और वह जो उपचार बताते हैं, हम सब वही करते हैं।’’

बीजशोधन कर बचाएं फसलों को रोग से

बीजशोधन का मुख्य उद्देश्य बीज जनित और भूमि जनित रोगों को रसायनों और बायोपेस्टीसाइडस से शोधित कर बीजो एवं मृदा में पाये जाने वाले रोगों के कारक को नष्ट करना होता है। बीजशोधन के लिए उपयोग किए गए। रसायनों, बायोपेस्टीसाइड्स को बुवाई के पूर्व सूखा अथवा कभी-कभी संस्तुतियों के अनुसार घोल या स्लरी बना कर मिलाया जाता है। जिससे इनकी एक परत बीजों की बाहरी सतह पर बन जाती है। बीज पर और बीज में पाये जाने वाले कीटों को अनुकूल परिस्थतियों में नष्ट कर देती है। प्रदेश में खरीफ की प्रमुख फसलों में शत-प्रतिशत बीजशोधन कराने हेतु 16 मई से 15 जून तक विभाग द्वारा अभियान के रूप में राजकीय अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से समस्त ग्राम पंचायतों में किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।

खरीफ की फसलों को ऐसे कीटों से बचाएं

खरीफ की प्रमुख फसलों जैसे धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंग, उर्द, अरहर, मूंगफली, सोयाबीन एवं तिल में बीजशोधन कार्य के लिए संस्तुतियों के अनुसार प्रमुख कृषि रक्षा रसायनों-थिरम 75 प्रतिशत डब्लूएस, कोर्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी., स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90 प्रतिशत़ टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत, कार्बाक्सिन 37.5 प्रतिशत़़थिरम 37.5 प्रतिशत डी.एस., टेबुकोनाजोल 2 प्रतिशत डी.एस., मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू.एस. एवं ट्राइकोडरमा आदि रसायनों का उपयोग किया जाता है।

किसान उपयोगी खाद्यान्न उत्पादन के राष्ट्रीय कार्यक्रम तथा बीजशोधन अभियान को सफल बनाने के लिए कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र, स्वयं सेवी संगठन, स्वयं सहायता समूह एवं प्रगतिशील किसानों के साथ पेस्टीसाइड एसोसिएशन, थोक और फुटकर विक्रेताओं का सहयोग लिया जाएगा।

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