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उत्तराखंड में एक करोड़ रुपये किलो वाली जड़ी की तलाश

(मंजीत नेगी )

पौराणिक मान्यताओं की हकीकत चाहे जो हो, लेकिन प्रकृति के आंचल में बसे उत्तराखंड की मनोरम पहाड़ियों पर आकर मन आस्था और विश्वास से भर जाता है. उत्तराखंड की इन दुर्गम और खूबसूरत पहाड़ियों के सीने में संजीवनी सहित कई पौराणिक कथाओं के राज दफन है. पहली बार उत्तराखंड सरकार ने द्रोणागिरी इलाके में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए द्रोणागिरी ट्रैक का आयोजन किया.

जोशीमठ से द्रोणागिरी की दूरी तकरीबन 55 किलोमीटर है, जिसमें 13 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है. यही रास्ता चीन की सीमा पर बसे नीति गांव को भी जाता है. यात्रा आगे बढ़ती है रास्ते में पौराणिक महत्व का तपोवन गांव आता है. मान्यता है कि इसी गांव में देवी सती ने हजारों साल तक शिव की आराधना की थी. यहां मौजूद पुजारियों से हमने संजीवनी के बारे में जानने की कोशिश की. तपोवन से आगे बढ़ते ही द्रोणागिरी पर्वत की झलक मिलनी शुरू हो जाती है.

द्रोणागिरी ट्रैक में देशभर से आये लोगों ने हिस्सा लिया. पारम्परिक लोकनृत्य से कार्यक्रम की शुरुआत हुई. धर्म, संस्कृति, रहस्य, रोमांच और ट्रैकिंग की बात उत्तराखंड की इस देवभूमि में बेहद अनूठी है. आज हम वहां जा रहे हैं जहां त्रेता में भगवान राम के दूत हनुमान के कदम पड़े थे और वह उस अमूल्य वस्तु को उठाकर उत्तराखंड से श्रीलंका ले गए, जिसे संजीवनी कहते हैं. इस मौके पर बड़ी संख्या में स्थानीय और देशभर आये लोग मैजूद रहे. स्थानीय विधायक ने द्रोणागिरी ट्रैक कोई हरी झंडी दिखाई.

जुमा से शुरू होती है पैदल यात्रा
जोशीमठ से आगे बढ़ने पर रास्ते में कई जगह गर्म पानी के स्रोत मिलते हैं जिनके बारे में मान्यता है कि देवी पार्वती के बालों से निकली पानी की बूंदों से इनकी उत्पत्ति हुई. आगे रास्ते में हमारी मुलाकात भोटिया जनजाति के लोगों से होती है. खास बात ये है कि छह महीने ये लोग अपनी भेड़-बकरियों के साथ बद्रीनाथ के पहाड़ों पर रहते हैं और छह महीने मैदानों में रहते हैं. थोड़ा आगे जाने पर जुमा गांव आता है, जहां से द्रोणागिरी की पैदल यात्रा शुरू होती है. धौलीगंगा को पार करने के बाद पैदल रास्ता शुरू हो जाता है.

इस सफर में बच्चे, बूढ़े जवान और महिलायें सभी शामिल थीं. हर कोई इस अदभुत यात्रा को लेकर रोमांचित था. रास्ता सीधी चढ़ाई और बारीक पगडंडी से होकर जाता है. हमारी सांस तो खाली हाथ ही फूल रही थी, जबकि द्रोणागिरी जाने वाले लोग कंधे पर भारी बोझा लेकर जा रहे थे. मुंबई से आए स्कूली बच्चों की टीम द्रोणागिरी ट्रैक को लेकर खासी उत्साहित थी.

करीब तीन किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद हमारी पहली मंजिल यानी रुइन्ग गांव आ गया. रूइंग गांव पहुंचने पर गांव की महिलाओं ने पारम्परिक तौर-तरीकों से लोगों का स्वागत किया. भोजपत्र और स्थानीय जड़ी-बूटियों से बनी माला से हमारा स्वागत किया. इसके साथ ही स्थानीय नृत्य और गायन ने सबका मन मोह लिया.

भारत का अंतिम गांव
द्रोणागिरी पर्वत के उस पार तिब्बत है, इसलिए इस गांव को इस छोर से भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है. रुइन्ग गांव में पहली रात हमनें टेंट में गुजारी. यहां रात का तापमान काफी गिर जाता है. सोने के लिए स्लीपिंग बैग की जरूरत पड़ती है. अगले दिन सुबह 6 बजे हमने द्रोणागिरी के लिए अपना सफर शुरू किया. रास्ते में लगभग 13000 फुट की ऊंचाई पर स्थित भोजपत्र के जंगल से होकर हम गुजर रहे थे. बेहद मनमोहक द्रोणागिरी घाटी में कई रहस्य और रोमांच आज भी प्रकृति की गोद में कलरव करते नजर आते हैं. हर तरफ कीमती जड़ी-बूटियां बिखरी पड़ी हैं. आसपास के मनमोहक माहौल को देखकर थकान मिट जाती है.

बाएं हाथ से होती है द्रोणागिरी की पूजा
द्रोणागिरी के लोग पर्वत देवता यानि द्रोणागिरी की पूजा बाएं हाथ से करते हैं, क्योंकि पवनपुत्र हनुमान दाएं हाथ से पर्वत उठा कर ले गए थे. यहां एक और रोचक बात देखने को मिलती है. यहां पर्वत देवता की पूजा के लिए कोई मंदिर नहीं है बल्कि द्रोणागिरी पर्वत को ही देवता माना जाता है. सबसे पहले पारम्परिक रीति-रिवाज से द्रोणागिरी पर्वत की पूजा की जाती है. उन्हें ख़ास प्रसाद और मदिरा का भोग लगाया गया. इसीलिए द्रोणागिरी पर पर्वतारोहण की मनाही है. लोकमान्यता है कि जो लोग इसकी कोशिश करते हैं वो मौत के मुंह में समा जाते हैं. इतना ही नहीं गांव में किसी की मौत होने पर उसे जलाने की बजाय दफनाया जाता है, इस डर से कि जलाने से जो धुआं उठेगा, उससे संजीवनी बूटी नष्ट हो सकती है.

द्रोणागिरी गांव पहुंचकर हमने देखा कि यहां न तो कोई जवान लड़का दिखा, न लड़की या कोई बच्चा. महिलाएं जरूर एक-दो दिखीं जो शायद जड़ी-बूटी की तलाश में यहां आई थीं. असल में बाकी लोग गांव छोड़कर निचले स्थलों के गांव में जा बसे हैं ताकि शिक्षा ले सकें और वक्त के साथ कदमताल भी कर सके.

एक करोड़ रुपये किलो वाली जड़ी की तलाश
यहां के ग्रामीण सिर्फ बर्फ पिघलने का इंतजार करते हैं ताकि घाटी पर रात को चमचमाने वाली दिव्य औषधियों के उन्हें दर्शन हों. वे दूसरे दिन उठकर उन औषधियों की तलाश में द्रोणागिरी पर्वत की बर्फीली वादियों के नीचे बसे लगभग 500 ग्लेशियरों के 5.5 किमी के दायरे में फैले उस क्षेत्र का भ्रमण करते हैं ताकि मुख्यतः कीड़ा जड़ी ढूंढ पाएं. कीड़ा जड़ी की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रति किलो थोक कीमत 1 करोड़ है जिसे खरीदने लोग द्रोणागिरी जैसे गांव तक पहुंच जाते हैं. इन्हीं ग्लेशियरों से धौली गंगा का उद्गम है. यहीं बागिनी ग्लेशियर, गिर्थी ग्लेशियर, चंगबांग ग्लेशियर, नीति ग्लेशियर निकलते हैं.

खास बात ये है कि पूजा में लड़कियां या औरतें हिस्सा नहीं लेतीं, क्योंकि मान्यता है कि भक्त हनुमान को एक बूढ़ी औरत ने संजीवनी का पता बताया था. सदियों सालों बाद भी द्रोणागिरी के लोगों का अटूट विश्वास है कि यहां पहाड़ों पर संजीवनी बूटी मौजूद है. द्रोणागिरी के पहाड़ों पर कई तरह की जड़ी-बूटियां मौजूद हैं. कई जड़ी-बूटियों को यहां के लोग संजीवनी का प्रतीक मानकर अपने घर की चौखटों पर लगाते हैं. संजीवनी द्रोणागिरी पर मौजूद है. जो बर्फ पड़ने पर सूख जाती है, लेकिन पहाड़ पर चिपकी हुई हालत में रहती है. बर्फ पिघलने पर इसको देखा जा सकता है. इनमें जड़ी-बूटियां में ही संजीवनी है. हालांकि वैज्ञानिक आधार पर उसकी पहचान होना बाकी है. द्रोणागिरी ट्रैक के दौरान संजीवनी बूटी ढूंढने की इस रोमांचक यात्रा में हम कभी न भूलने वाले अनुभव से रूबरू हुए.

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