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उत्तराखंड की नौकरशाही -सरकार पर पड़ी भारी

किसी भी राज्य और देश की सरकार के फ़ैसलों को लागू करने का काम राज्य की अफ़सरशाही का होता है और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपनी ब्यूरोक्रेसी की खुलकर तारीफ़ करते हैं. लेकिन यह एक पक्ष है. दूसरा पक्ष शिक्षक भूपेंद्र सिंह रावत और भरत मिश्रा का है जो अपने अधिकार के लिए 17 साल से ज़्यादा समय से अधिकारियों के पास धक्के खा रहे हैं.

देहरादून के शहंशाही इंटर कॉलेज में तैनात शिक्षक भूपेन्द्र सिंह रावत और देहरादून के ही माल देवता के जीआईसी में लेक्चरर के पद पर तैनात भरत मिश्रा का चयन राज्य बनने से ठीक पहले साल 2000 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से पीईएस (प्रोवेंशियर एजुकेशन सर्विस) की परीक्षा पास की थी और उनका प्रधानाचार्य के लिए चयन हुआ था.

ये लोग अपनी तरक्की का जश्न मनाते इससे पहले ही उत्तराखंड नया राज्य बन गया और लंबे संघर्ष के बाद मिली जीत में उत्तराखंडी डूब गए.

उत्तराखंड बनने के बाद केंद्र सरकार ने यूपी और उत्तराखंड दोनों में नियुक्तियों पर रोक लगा दी. उधर यूपी सरकार ने मैदानी कैडर के अपने अध्यापकों को नौकरी दे दी और पहाड़ी कैडर के 15 अध्यापकों की फ़ाइल उत्तराखंड भेज दी.

रावत बताते हैं कि तब यूपी सरकार ने उत्तराखंड से पूछा था कि क्या उन्हें इन लोगों की ज़रूरत है तब तत्कालीन मुख्य सचिव ने कहा था कि राज्य में प्रधानाध्यापकों की भारी कमी है और इसलिए वह उन्हें रखना चाहेंगे.

लेकिन इन लोगों को नियुक्ति नहीं दी गई और यह अपनी-अपनी जगहों पर पुराने पदों पर ही काम करते रहे. प्रधानाचार्य पद पर नियुक्ति को लेकर यह 15 लोग नैनीताल हाईकोर्ट चले गए और वहां से 2001 में इनके पक्ष में फ़ैसला आ गया. कुछ समय तक नियुक्ति देने की बात कहकर टालने के बाद राज्य सरकार ने नैनीताल हाईकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फ़ैसला करते हुए कहा कि ‘सरकार चाहे तो इन्हें नियुक्ति दे सकती है’. अब एक और संघर्ष शुरू हुआ और यह शिक्षक अधिकारियों के, मुख्यमंत्रियों के चक्कर काटने लगे कि नियुक्ति पर रोक की बात अदालत ने नहीं कही है, इसलिए कृपा करके प्रधानाचार्य पद पर नियुक्त कर दिया जाए.

रावत कहते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी इनकी बात से सहमत हो भी गए थे लेकिन अधिकारियों की मंशा उन्हें नियुक्ति देने की नहीं थी.

अब शिक्षा विभाग ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या करें? केंद्र ने भी गेंद वापस राज्य के पाले में डाल दी तो अधिकारियों ने ‘देखते हैं’ के पुराने हथियार का इस्तेमाल कर इन लोगों को लटकाना जारी रखा.

2014 में यह शिक्षक फिर नैनीताल हाईकोर्ट की शरण में पहुंचे जहां से उन्हें फिर जीत हासिल हुई और फरवरी 2017 में इनके पक्ष में फ़ैसला आया. अब एक बार फिर यह लोग अधिकारियों के पास धक्के खा रहे हैं और वही देख-सुन रहे हैं जो पिछले 17 साल से जारी है, एक ही जवाब- देखते हैं.

इस मामले पर पूछे जाने पर शासन में प्रमुख सचिव आनंद वर्द्धन कहते हैं कि शासन, प्रशासन की जो कार्यप्रणाली है उसमें कई तरह के एजेंडा और डायरेक्शन पर काम करना पड़ता है. उनका कहना है कि जहां भी ह्यूमन इंटरफेस है उसको कम करने और ज़्यादा से ज़्यादा डिजिटाइज़ेशन करने पर ऑनलाइन किए जाने पर काम हो रहा है.

क्या इसका अर्थ यह नहीं कि अधिकारी जानबूझकर काम अटका रहे हैं? क्या इसका यह अर्थ नहीं कि जिन अधिकारियों की तारीफ़ करते मुख्यमंत्री थकते नहीं हैं वह उसी जनता को परेशान करने पर सालों से लगे हुए हैं? वरना आखिर क्यों एक के बाद एक अधिकारी की कोशिश यही रही कि इन शिक्षकों को इनका वाजिब हक़ न मिल पाए?

शायद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और बीजेपी यह बात जानते भी हैं चाहे वह कहते कुछ भी हों. इसीलिए मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल उन शिकायतों के निवारण के लिए बीजेपी ऑफ़िस में बैठता है जिन्हें आसानी से छोटे-बड़े सरकारी ऑफ़िस में दूर हो जाना चाहिए.

दिल्ली में चलने वाली बसों के पीछे आपको लिखा दिख जाएगा, ‘या तो न्यों ही चालैगी’. अर्थात यह तो ऐसे ही चलेगी (यानि- चाहे कुछ भी कर लो). उत्तराखंड की अफ़सरशाही और ब्यूरोक्रैसी के लिए भी यही बात लागू होती है.

भूपेंद्र सिंह रावत समेत 15 शिक्षकों को किस्मत से या बैक डोर (बीजेपी ऑफ़िस में लगने वाले मंत्रियों के जनता दरबार) से अपना हक़ मिल गया तो ठीक वरना उन्हें लेक्चरर के पद से ही रिटायर होना पड़ेगा. आखिर क्या वजह है कि कायदे से सब कुछ करने के बाद जो काम 17 साल में नहीं हुआ वह 7 साल में हो जाएगा.

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