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यूपी में लड़खड़ाती कानून व्यवस्था क्यों ?

उत्तर प्रदेश की केसरिया सरकार के लगभग 70 दिन गुजरने के बाद सूबे में कानून, गुनहगारों के सामने हांफता नजर आ रहा है। व्यवस्था अपनी लुटी हुई अस्मत के साथ दूर खड़ी इस खौफनाक दौर के गुजरने का इंतज़ार कर रही है और जनता, बड़ी हसरतों के साथ अपना जनादेश देने के बाद, अपनी उम्मीदों को बड़ी विवशता के साथ जार-जार होते देखने को मजबूर है। गुजरे दो माह के वक्त में सूबे की आवाम ने कभी कानून के मुहाफिजों को बलवाइयों के सामने अपनी हिफाजत के लिए भागते देखा, तो कभी पीड़ित को विरोध करने की सजा के तौर पर अपराधियों की गोली का शिकार बनते देखा। अपराधी बारी-बारी से अस्मतरेजी करते रहे और सरकार ‘प्रजेंटेशन’ देखने में मशगूल रही। 15 मिनट के फासले पर खड़ी पुलिस दो घंटे में पहुंचती है और पुलिस जाती भी है तो कुछ कर नहीं पाती। ऐसी ‘तेज और समर्थ’ पुलिस के कंधों पर ही है उ.प्र. जैसे बड़े प्रदेश की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी। क्या यह मान लिया जाए कि उ.प्र. पुलिस अक्षम, असमर्थ, गैर-पेशेवर है, जो अपराधियों के सामने प्रत्येक मोर्चा दशकों से हारती चली आ रही है? या यह मान लिया जाए कि उ.प्र. में पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का इस कदर राजनीतीकरण हो चुका है कि सरकार में तब्दीली होने के साथ ही पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी में भी तुरंत बदलाव होना चाहिए अन्यथा उनकी पूर्व राजनीतिक निष्ठाएं नयी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी बताते हैं कि सपा सरकार के खासमखास अफसर अभी भी प्रदेश और जिले को चला रहे हैं। सपा निज़ाम में सरकार की ओर से नियुक्त वकील, जिसमें कई बकायदा सपा कार्यकर्ता हैं, अब भी अपने पदों पर जमे हुए हैं। इस पर भी प्रदेश सरकार को गौर करने की जरूरत है। राज्य सरकार ने हालात पर काबू पाने के लिए बीते दो महीनों में 200 आईपीएस अफसरों के तबादले किए तो हैं, लेकिन फिलहाल राहत मिलती दिख नहीं रही है।

परमात्मा के बाद सबसे अधिक पुलिस नाम को सुमिरने वाली उ.प्र. की जनता अब किस आस-विश्वास के सहारे अपने दिन गुजारे, जब पुलिस ही अपराधियों के हमलों का शिकार बन रही हो? कभी थाने के अंदर दरोगा को झन्नाटेदार तमाचा मारा जाता है, तो कहीं एसएसपी का आवास तोडफ़ोड़ का शिकार हो जाता है। योगी आदित्यनाथ के राज में भी खाकी पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

प्रदेश में अपराध का ग्राफ चढ़ने से चिंतित मुख्यमंत्री योगी ने एक विशेष प्रकोष्ठ गठित करने का फैसला किया है। योगी खुद इसकी निगरानी करेंगे। जनमानस के मन में सीएम योगी आदित्यनाथ की नीयत को लेकर पूरा भरोसा है लेकिन सिस्टम की शरारत से पैदा हुई हरारत ने सभी को बेचैन कर दिया है। योगी आदित्यनाथ ने राज्य में कानून का राज होगा, का वचन विधानसभा में जनता को दिया है। अब अपने वचन को पूरा करना सीएम योगी की जिम्मेदारी है क्योंकि सीएम का वचन ही होता है शासन।

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