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जन ‘आक्रोश’ से बनेगी ‘साख’

भूपेश पंत

पिछले विधानसभा चुनावों में राज्य की सियासत के तहखाने में धकेल दी गयी यूकेडी के सभी धड़े अब एकजुट हो कर राज्य में अपनी खोई प्रसन्गिकता की तलाश में जुट गए हैं. इस एकता से उत्साहित यूकेडी नेता पूरे जोरशोर से पार्टी को आन्दोलनों के जरिये पुनर्जीवित करने की रणनीति बना रहे हैं. सत्तारूढ़ रावत सरकार पर हमलावर यूकेडी अपने स्थापना दिवस को ‘आक्रोश’ दिवस के रूप में मना रही है. सरकार के चार महीने के कार्यकाल को खारिज करते हुए यूकेडी ने आक्रोश दिवस के आयोजन में किसानों के मुद्दे पर कॉंग्रेस और बीजेपी के आरोप-प्रत्यारोप पर भी सवाल उठाए.  लेकिन सड़क से सत्ता तक का सफर तय करने में अभी इस क्षेत्रीय पार्टी को कई चुनौतियों से गुजरना पड़ेगा.

अलग पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की मांग को लेकर अस्सी के दशक में बनी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल का शुरुआती दिनों में पहाड़ के युवाओं में जबर्दस्त क्रेज देखने को मिला था. पार्टी ने इस इलाके से विधानसभा चुनावों में लगातार अपनी उपस्थिति भी दर्ज करायी. लेकिन राज्य गठन के समय तक दूरदृष्टि के अभाव, अहम के टकराव, अस्पष्ट रणनीति और भ्रमित सोच ने इस क्षेत्रीय दल को अपनी ही ज़मीन पर बेगाना बना दिया. कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस के साथ सत्ता का स्वाद चखने और नेताओं की अति महत्वाकांक्षाओं ने मतदाताओं के भरोसे को तो तोड़ा ही, उत्तराखंड राज्य को लेकर देखे गये सपने को भी स्वाहा कर दिया. आपसी गुटबाजी से जूझते दल को पर्वतीय राज्य की बुनियादी समस्याओं पर आक्रामक तेवर अपनाते हुए शायद ही कभी देखा गया हो. लिहाजा राज्य के मतदाता विकल्पहीनता की स्थिति में कांग्रेस या फिर बीजेपी की शरण में जाने को मजबूर रहे. यहां तक कि मैदानी इलाकों में आज बीएसपी तक यूकेडी से बेहतर स्थिति में दिखायी दे रही है.

पर्वतीय सूबे में तीसरा विकल्प बनने की इस कवायद में यूकेडी को ना सिर्फ सियासी ज़मीन पर मजबूती से खड़ा होना है बल्कि तीसरे नंबर की लड़ाई में उसके सामने दूसरे विकल्पों के आगे खुद को साबित करने की चुनौती भी है. यूकेडी का क्षेत्रीय अस्तित्व पर्वतीय मतदाताओं को तभी आकर्षित कर पायेगा जबकि वो नयी ऊर्जा, नये संकल्प और नयी रणनीति के साथ सियासत के मैदान में उतरे. उसे ये साबित करना होगा कि पर्वतीय राज्य की मूलभूत समस्याओं को लेकर उसकी समझ औरों से बेहतर है और उनके हल के लिये अपनाये गये आंदोलनकारी तेवर सियासी हार जीत तक सीमित नहीं हैं. पार्टी के सामने संगठन के स्तर पर खुद को मजबूत करना बड़ी चुनौती है और युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने के लिये उसे वैचारिक और तकनीक के स्तर पर नयी पहल करनी होगी. कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ यूकेडी को दूसरे क्षेत्रीय दलों को साझा कार्यक्रम के तहत एकजुट करना होगा लेकिन ये कोशिश तभी कामयाब होगी जब समान विचारों वाले सभी छोटे बड़े दल राजनीति से ऊपर उठकर क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल पर एकजुट हो पाएं.
पिछले सोलह सालों में सूबे के लोगों ने बारी बारी से बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों को देखा है और घोटालों, आपदाओं, निरंकुश नौकरशाहों और भ्रष्ट तंत्र के हाथें लुटते अलग राज्य के उनके सपनों को भी. पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी, सड़क जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही पहाड़ की जनता इन दो राष्ट्रीय दलों के बीच पिसने को मजबूर है. गैरसैंण को राजधानी बनाने के मुद्दे पर इन दोनों सियासी दलों की संजीदगी की पोल उनके अंतर्विरोध खुद खोल रहे हैं. ऐसे में सूबे की जनता एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प चाहती है और हो सकता है कि आने वाले समय में यूकेडी अपने तेवरों से मतदाताओं में अपनी खोयी साख लौटाने में कामयाब हो भी जाये, लेकिन इसके लिए उसे पर्वतीय राज्य के जन आक्रोश को एक दिन नहीं बल्कि बार-बार अभिव्यक्ति देनी होगी. अगर ऐसा नहीं होता तो ये राज्य की क्षेत्रीय अस्मिता और लोकतंत्र दोनों के लिए नुकसानदेह होगा.

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