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त्रिवेंदर रावत की योगी से तुलना क्यों

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में एक ही पार्टी की सरकार होने और दोनों मुख्यमंत्री मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले से ही होने के चलते आदित्यनाथ योगी और त्रिवेंद्र रावत में तुलनात्मक चर्चाओं ने जोर पकड़ा

राजीव थपलियाल

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को बुरा लग रहा होगा कि उनके प्रदेश में उनसे ज्यादा चर्चा अन्य राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हो रही है। त्रिवेंद्र को बुरा लगना भी चाहिए और उनके चाहने वाले अपनी नाराजगी जता भी रहे हैं। उनका तर्क है कि दोनों राज्यों के हालात भिन्न-भिन्न हैं। इसलिए यह तुलना उचित नहीं है। लेकिन, यह समझना होगा कि यह तुलना मात्र इसलिए नहीं है कि दोनों ही नेता एकसाथ मुख्यमंत्री बने हैं अथवा योगी का मूल भी उत्तराखंड है। बल्कि तुलना एक स्वाभाविक तौर पर उपजे उन एक्शन के कारण है, जिसमें मुख्यमंत्री बनते ही योगी अपने रोमियों पकड दस्ते और अवैध बूचडखानों पर रोक लगाने के फैसले के साथ आते दिखे। पुलिस प्रशासन के कान उमेठते दिखे। जबकि सबसे मामूली बात यह रही कि मंत्रालय बांटने में भी त्रिवेन्द्र अपने ‘सियासी सहोदर योगी से पिछड़ गए।

हालांकि त्रिवेद्र सिंह रावत ने भी ‘कुछ कर गुजरने की इच्छा दिखाने की कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने उधमसिंहनगर के एनएच-74 में भूमि अधिग्रहण में हुए करोड़ों के घपले की जांच सीबीआई से कराने के साथ जिम्मेदार अधिकारियों को कानूनी तौर पर नापने का आदेश देकर जनता को संदेश पहुंचाना चाहा कि वे भले ही धीमी गति से चल रहे हों, लेकिन किसी से भी कमतर साबित नहीं होंगे। वे योगी की तरह त्वरित गति से तो नहीं चलेंगे, बल्कि मंथर-मंथर चलते हुए पीछे भी नहीं रहेंगे। जनता भी यह भलीभांति समझती है कि दोनों राज्यों में परिस्थितियां अलग हैं और हालातों से निपटने की कसौटी भी अलग अलग है। इसलिए सीधे तुलना नहीं हो सकती। लेकिन पिछले सोलह साल में उत्तराखंड जिस माहौल में पला बढ़ा है, उसमें यह अपेक्षा सहज है कि क्या बदले हालात में नई सरकार अपने किसी एक्शन के साथ होगी। प्रकृति और शैली में योगी आदित्यनाथ से अलग त्रिवेंद्र राज्य की दशा बदलने का हौसला रखेंगे! रोमियो दस्ता हो या अवैध बूचडख़ाने पर रोक या लड़की के फोन पर पुलिस की मदद तीनों घटनाओं ने उत्तराखंड के लिए ये हालात बना दिए हैं कि उसे किसी न किसी तरह एक्शन मोड पर दिखना ही होगा, क्योंकि योगी आदित्यनाथ के किसी फैसले पर आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह तय है कि वह रुकने या धीमें चलने वाले नेता नहीं है। और जब-जब शासकीय स्तर पर कोई हलचल उप्र में होगी कोई बड़ा फैसला होगा उसे उत्तराखंड के लोग अपनी सरकार के कामकाज के दायरे में तोलेंगे।

योगी आदित्यनाथ की छवि मुखर राजनेता के तौर पर रही है। उनकी कार्यशैली और तत्परता उन्हें हमेशा सुर्खियों में रखती आई है। भले ही विवादों में भी रहे हैं। पौड़ी जिले के अन्जाने से गांव पंचूर से एक युवक निकला तो फिर गांव में अपनी याद ही छोड़ गया। तमाम जद्दोजहद और संघर्ष के साथ उसने गोरखनाथ की माटी में अपनी पदवी को पाया। गोरखपुर ने उन्हें इस तरह अपनाया कि उनका जीवन-संस्कृति-शैली सब वहींं की आबोहवा में रच बस गया। लोग भूल गए कि उसका नाम अजय मोहन सिंह बिष्ट है। उनके शपथ लेते ही उत्तराखंड में उसकी प्रतिध्वनि साफ देखी गई।
इसके विपरीत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की छवि मुखर नहीं रही है। पौड़ी जिले के ही खैरासैंण गांव में जन्मे 1979 में आरएसएस से जुड़े हैं। संगठन के विभिन्न पदों पर रहने के बाद वह नए राज्य में विधायक भी बने और अगली बार मंत्री भी। झारखंड के चुनाव में पार्टी प्रभारी रहते भाजपा को जीत दिलाने का श्रेय उन्हें भी मिला।

उत्तराखंड राज्य के बनते ही यहां दलालों माफियों ने यहां की सियासत और नौकरशाही को अपने प्रभाव में रखा। अब जब नरेंद्र मोदी ने अपनी सभाओं में इस राज्य की दशा बदलने का भरोसा दिलाया तो नए मुख्यमंत्री से अपेक्षा बढ़ी है। इसीलिए जैसे ही उप्र में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ताबडतोड़ फैसले लिए, उत्तराखंड के इलाकों में यह स्वर गूंजने लगा कि यहां अभी कोई एक्शन नहीं। यह एक सकारात्मक संकेत भी है कि लोग तेजी से बदलाव चाहते हैं और काम चाहते हैं। जब बदले हालात में उप्र में योगी को उप्र को मोदी कहा जाने लगा हो तब त्रिवेंद्र रावत के अगले कुछ कदम तय करेंगे कि उनकी छवि किस तरह गढ ऱही है। दोनों राज्यों को आगे बढ़ाने में इच्छाशक्ति ही अहम है। दोनों के विकास की अपनी कसौटियां हैं। ऐसे में अगर तुलना भी होने लगी है तो यह उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के हित में होगा। जिस अस्थिरता और लुंज-पुंज हालत में यह राज्य घिसटता रहा, उसे अब होड़ के चलते ही सही, वह दौडऩे की कोशिश कर सकता है।

कभी-कभी होड़ अच्छे नतीजे देती है। सोलह साल में पहली बार सत्ता संभालने के एक हफ्ते के अंदर ही होड़ एक्शन जैसे शब्द कुछ अपेक्षाएं जगाते हैं, बाकी आगे के वक्त पर। हां इतना जरूर है कि हिंदुत्व या भाजपा के राष्ट्रीयवाद का चेहरा योगी आदित्यनाथ ही बनेंगे। भाजपा के लिए त्रिवेंद्र रावत की सफलता और प्राथमिकता उनके विकास कामों और राज्य के अच्छे संचालन में ही अपना परिचय पेश करेंगी। खासकर ऐसे समय जब सत्ता संभालते ही योगी को उप्र का मोदी कहा जाने लगा हो, तब त्रिवेंद्र रावत अपना परिचय किस रूप में देते हैं, यह समय बताएगा।

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