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ट्रिपल तलाक: धर्म का मुद्दा या मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं के कानूनी अधिकार और ट्रिपल तलाक पर सबसे बड़ी सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं. शीर्ष अदालत की संवैधानिक बेंच इस मामले की समीक्षा करेगी. उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया है कि वह ट्रिपल तलाक की समीक्षा करेगी. हालांकि, धर्म के मूल में ये है क्या और किस हद तक इससे मौलिक अधिकारों का हनन होता है. इसपर भी कोर्ट सुनवाई करेगी. जरूरत पड़ने पर निकाह हलाला पर भी सुनवाई होगी. अदालत बहुविवाह से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई नहीं करेगी. केंद्र की ओर से इस मामले में तुषार मेहता ने कहा कि मुख्य मुद्दा ये है कि क्या धार्मिक का अधिकार मौलिक अधिकार से ऊपर है?

संवैधानिक पीठ में कौन-कौन
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस आर. एफ. नरीमन, जस्टिस यू. यू. ललित और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की संवैधानिक बेंच मामले में सुनवाई करेगी. खास बात ये है कि इस पीठ में पांच धर्मों के 5 अलग-अलग जज शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में तमाम पक्षकारों से भी राय मांगी थी.

केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से सवाल दिए थे-
1. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तलाके-बिद्दत (एक बार में तीन तलाक़ कहना), हलाला और बहुविवाह की इजाज़त दी जा सकती है या नहीं?
2. समानता का अधिकार, गरिमा के साथ जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्राथमिकता किसको दी जाए?
3. क्या पर्सनल लॉ को संविधान के अनुछेद 13 के तहत कानून माना जाएगा या नहीं?
4. क्या तलाके-बिद्दत, निकाह हलाला और बहुविवाह उन अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत सही है जिस पर भारत ने भी दस्तखत किये हैं? बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने तमाम पक्षकारों की ओर से लिखित दलील पेश की जा चुकी है.
केंद्र सरकार की ये है दलील-
केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि ट्रिपल तलाक के प्रावधान को संविधान के तहत दिए गए समानता के अधिकार और भेदभाव के खिलाफ अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. केंद्र ने कहा कि लैंगिक समानता और महिलाओं के मान सम्मान के साथ समझौता नहीं हो सकता. भारत जैसे सेक्युलर देश में महिला को जो संविधान में अधिकार दिया गया है उससे वंचित नहीं किया जा सकता. केंद्र ने कहा है कि मूल अधिकार के तहत संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत जेंडर समानता की बात है. महिला को सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक तरीके से हशिये पर रखना संविधान के अनुच्छेद-15 के तहत असंगत होगा. महिला को आत्मसम्मान और मान-सम्मान का जो अधिकार है वह राइट टु लाइफ के तहत दिए गए अधिकार का महत्वपूर्ण पहलू है. लैंगिक समानता और महिलाओं के मान-सम्मान के साथ समझौता नहीं हो सकता. ट्रिपल तलाक व बहुविवाह धार्मिक स्वतंत्रता के तहत संरक्षित नहीं हैं.

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