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तीन तलाक: धर्म के नाम पर ‘कुरीति’

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

भारत में नारियों से संबंधित सामाजिक मुद्दों की जीत हमेशा धार्मिक कुरितियों पर भारी पड़ती आई है। भारत के इतिहास ने ऐसे बहुत से सामाजिक मुद्दों को विजयी होते देखा है, फिर चाहे वह सती प्रथा रही हो, बाल विवाह रहा हो, हिन्दु विधवाओं की मुण्डन प्रक्रिया रही हो या फिर स्त्री शिक्षा की बंदिशें रही हों। प्रायः ये सभी सामाजिक मुद्दे धर्म से जोड़कर जबरन स्त्रियों पर थोपे गए थे। स्त्रियों ने सहनशीलता की पराकाष्ठा तक इनकी पीड़ाओं को सहा, लेकिन जब दर्द नासूर बनने लगे, तो धर्म के नाम पर चलाई जा रहीं इन कुरीतियों को दूर करने के सफल प्रयास हुए और आज भारत लगभग 99 प्रतिशत इन सामाजिक कुरीतियों से मुक्त हो चुका है।

यह सच है कि इन धार्मिकताओं के लिबास में लिपटीं सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में समाज के पुरुषों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं और स्त्रियों के साथ मिलकर इन सामाजिक कुरीतियों को धूल धूसरित किया। ऐसा ही कुछ माहौल अब तीन तलाक के सामाजिक मुद्दे को लेकर पिछले कुछ दिनों से अत्यधिक जोर पकड़ता जा रहा है। वास्तव में तीन तलाक भी इस्लामिक धार्मिकता के नाम पर नारियों के साथ हो रही एक सामाजिक कुरीति का रुप ले चुका है। सम्भवतः मुस्लिम महिलाएं इस समय इस सामाजिक कुरीति की सहनशीलता की परिधि पर पहुंच चुकी हैं। और निश्चित ही वे इस घेरे को तोड़कर तीनतलाक जैसी नारीविरोधी सामाजिक कुरीति के लिए न्याय पा सकेंगी।

आज हर मुस्लिम महिला जागरुक हो रही है। धर्म की सीमाएं वे भी जानती हैं। लेकिन धर्म के नाम पर जो अधर्म आजतक उनके साथ होता आया है, अब उसे माकूल जबाब देने का समय आ गया है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नामक जिस संगठन ने तीन तलाक की सामाजिक कुरीति को ध्वस्त करने का बीड़ा उठाया है। आज उसके साथ दस लाख से अधिक भारतीय मुस्लिम महिलाओं का होना इस बात का सबूत है कि राजाराममोहन राय और विद्यासागर, ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के नारी आंदोलनों की तर्ज पर अब मुस्लिम राष्ट्रीय मंच सहित अन्य संगठनों के प्रयासों से मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक जैसी सामाजिक कुरीति से शीघ्र मुक्त हो पाएंगी। कट्टर धार्मिकता सिर्फ लोगों की बनाई और मनगढ़ंत मान्यताओं के अलावा और कुछ नहीं होतीं। जब कट्टरता टकराव पर पहुंचती है, तो उसका कटकर गिरना सुनिश्चित है।

तीन तलाक अब भारत की धार्मिक कुरीति ही नहीं बल्कि एक सामाजिक विरोध के रुप में पूरे देश की मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के लिए एक अभियान और एक आंदोलन का रुप लेती जा रही है। भारत की धर्मनिरपेक्षता को धार्मिक कट्टरता कभी भी ग्राह्य नहीं हो सकती। तीन तलाक के सामाजिक मुद्दे को लेकर बने वर्तमान बदलते सामाजिक परिवेश ने इस बात को स्वीकार किया है कि धर्म तब तक ही समाज में अपनी साख बनाए रख सकता है, जब तक वह अपनी धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन न कर रहा हो। क्योंकि मनुष्यता ही सबसे बड़ा धर्म है, जिसमें स्त्री और पुरुष सामाजिक स्वस्थ नीतियों के बराबर के अधिकारी हैं। तीन तलाक का विरोध करते हुए धार्मिक दीवारों को तोड़कर आगे आ रहीं मुस्लिम महिलाओं की बढ़ रही संख्या इसका सबसे बड़ा प्रामाणिक संकेत है।

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