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देश में हिंसक विरोध में बदल रही वैचारिक असहमति

(मोहन भुलानी, NTI  न्यूज़ ब्यूरो, नेशनल )

जब लोकतंत्र की उम्मीदें उदासीनता में तब्दील हो जाए। देश के लोगों की ख़ुशी गरीबी में डूब जाए। वैचारिक असहमति हिंसक विरोध के मार्फ़त जताई जाए। संस्थानिक स्वायत्तता सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाए। आयोग के चुनावी एलान पर राजनीतिक दल सक्रिय हो जाएं और हर विचार को राष्ट्रवाद की कसौटी पर मापा जाए तो समझिये कि सब कुछ ठीक नहीं है।

जहां अस्पताल में दम तोड़ने पर एक स्त्री को पति अपने कांधे पर शिथिल ठंडे लोथड़े के सामान लिए पैसे के आभाव में आठ किलोमीटर पैदल चले। जहां सरकारी हड़ताल के तले एक बहु अपने ससुर के कांधे पर दम तोड़ दे। अस्पताल की लंबी कतारों में पर्ची लेते समय एक दस साल की बच्ची अपने बाप की गोद में दम तोड़ दे। जहां हर पांच घंटे में एक किसान आत्महत्या करे। जहां एक चौथाई आबादी रात को भूखा सोने पर मजबूर हो जाए। वहां यदि हज़ारो करोड़ रुपये इतिहास के नायकों की ठोस भौतिक प्रतिमा के अमरत्व से जड़ने में खर्च किया जाए तो एकबार फिर से सोचिये की देश में सब कुछ ठीक नहीं है।

जब सरकार की किसी नीति के तर्कसंगत समीक्षक की आलोचनात्मक समीक्षा पर उसको कुछ सोशली अराजक तत्वों के द्वारा अश्लील शब्दों से श्रद्धा अर्पित की जाने लगे। उसकी जाति, धर्म, परिवार, खानदान आदि पर अश्लील छींटाकशी कर उसकी आकादमिक योग्यता को कोसा जाने लगे तो इस बार ठंडे दिमाग से सोचिए कि लोकतांत्रिक रूप से सब कुछ ठीक नहीं है।

जब बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बिजली, पानी, किसानों की कयामत आदि जैसे देश के मूल गूढ़ प्रश्न पर बहस न होकर सेना, पाकिस्तान, गाय, राष्ट्रद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट आदि जैसे सामान्य विषयों पर समाज में तनावग्रस्त विमर्श विचरण करने लगें। तब केवल यह मत समझिये कि सब कुछ ठीक नहीं है, बल्कि यह समझिये कि अब निजी रूप से आप और आपके परिवार का तेज़ गति के साथ आरामदायक क्षेत्र से विस्थापन होने जा रहा है। एक विनाशकारी क्षण आपके लिए हिंसा की कोख में जन्म लेने को छटपटा रहा है।

क्या इतना पढ़कर समझने के बाद भी आपके चेहरे पर शिकन और तनाव नहीं है? अगर नहीं तो आप मान के चलिए कि या तो आप बौद्धिक रूप से गुलाम रोबोट हैं जिसे केवल वही दिखता है जो व्हाटसअप, फेसबुक के माध्यम से देश, धर्म की शह देने वाले लोग प्रेषित करते हैं। अन्यथा आप यह स्वीकार कर चुके हैं कि सरकार किसी की हो, चुनौतियां कितनी भी हो, संघर्ष के आयाम कुछ भी हो किन्तु आप अपने आरामदायक जीवन को और सहज बनाने पर ही विचार करेंगे। आप उसे फालतू समझ अपना समय उन विषयों पर बर्बाद नहीं करेंगे। क्योंकि आपने उन सबका ठेका लाइसेंसी राज के तहत नेताओं को सौंप दिया है। लेकिन याद रहे कि मानवीय या प्राकृतिक आपदा सामान्य चयन प्रक्रिया के तहत लोगों का चुनाव नहीं करती है, बल्कि सबको अपनी जद में शामिल करती है।

भौगोलिक बंटवारे की विभीषिका को याद करने की कोशिश करिए। 1947 का बंटवारा किसी की भी ज़िद या महत्वकांक्षा का नतीजा रहा हो, लेकिन उस भौगोलिक आपदा ने लाखों लोगों के खून से स्वयं को रक्तरंजित किया था। एक क्षण में लोगों को अपना घर, जिला, राज्य आदि छोड़ कर चले जाने को कहा गया। खून से सनी लाशें एक-दूसरे मुल्क से आ रही थी। जिसका दुष्परिणाम आज भी दिखाई देता है।

आपको पता है कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस वक़्त आम जनता कुछ विशेष नेताओं को अपना पालनहार और नुमाइंदा समझती थी। अब उस वक़्त की विडंबना देखिए कि जिन लोगों ने साथ लड़कर देश की आज़ादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया, वही लड़ाई के आखरी पड़ाव पर आते-आते मजहब के आधार पर बंटकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

आज़ादी के औपचारिक रूप से दोनों मुल्कों ने 70 झंडे भले ही फहरा दिए हो, लेकिन दोनों ही मुल्क शासन तले आगे बढ़ रहे हैं। याद रखें शासन और लोकतंत्र एक दूसरे के घोर विपरीत है। मसलन शासन की बुनियादी सामग्री है राजनीति। और जब शासकीय महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए हर विषय, क्षेत्र में राजनीति के प्रेत का समावेश होता है तो सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं ध्वस्त होती हैं। और किसी भी क्षेत्र में शिष्टाचार को बनाए रखने के लिए मर्यादा बहुत ज़रूरी है।

लिहाज़ा दोनों मुल्कों की आज़ादी के 70 वर्षों को पढ़िए और पड़ताल कीजिये कि 1947 से पहले वाली लोकतांत्रिक परिकल्पना आज उस कल्पना की कितनी हक़ीक़त को फर्श पर सजा पाई है। जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान और गांधी, नेहरू के आधुनिक भारत की कल्पना कितनी धरातल पर भौतिक रूप धारण कर पाई। आप इस बात का आसानी से अंदाज़ा लगा सकते है। इसलिए देश के राजनीति में गंभीरतापूर्वक अपनी वैचारिक व बौद्धिक उपस्थिति दर्ज़ कराएं। अन्यथा इतिहास में केवल एक आंकड़ा बनकर ही रह जाएंगे। जिनकी गणना केवल दंश को याद करने में की जाती है। बहरहाल, आज मैं यह सब दिल में एक व्यथित बोझ के साथ लिख रहा हूं जो शायद आप लोगों तक पहुंचकर कुछ फीसद कम हो सके। क्योंकि मुझे पता चला है कि मायूसी बांटने से घटती है।

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