गांवों तक ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाला युवा

मोबाइल बेस्ड इस टेक प्लेटफॉर्म का लक्ष्य था कस्टमर एंगेजमेंट को जितना हो सके आसान बनाना। पिछले काफी समय से काम करते हुए मदन को यह अहसास हुआ कि बड़ी-बड़ी कंपनियां गांव के लोगों की जरूरतों को समझन नहीं पाई हैं।

 मदन का मानना है कि गांव का आदमी शोरूम जाने से हिचकिचाता है। गांव में जिनके पास पैसा होता है वे भी किसी बड़े शोरूम जाने से कतराते हैं और डरते भी हैं। इस डर को दूर करने का काम वन ब्रिज कर रहा है।

बेंगलुरु बेस्ड सोशल उद्यमी मदन पदकी भारत के छोटे-छोटे गांवों को शहरों से जोड़कर वहां विकास लाने के साथ-साथ ग्रामीण आबादी को सुलभ सुविधा मुहैया कराने के उद्देश्य पर काम कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए ‘1Bridge’ की स्थापना की है जो कर्नाटक के युवाओं के जुनून को परखकर उन्हें उद्यमिता का सही प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवा रहा है। मदन ने कार्यक्रम मोबाइल स्पार्क्स-2017 में बोलते हुए कहा कि हमें नहीं पता होता कि गांव के लोगों की जरूरत क्या है, हम तो ग्रामीण युवाओं को सुनना ही नहीं चाहते। ग्रामीण विकास की योजनाओं की सबसे बड़ी मुश्किल यही है।

मदन ने 2016 में वन ब्रिज की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण और कस्बाई जनता को सस्ते दामों पर सामान और सर्विस उपलब्ध करना था। मोबाइल बेस्ड इस टेक प्लेटफॉर्म का लक्ष्य था कस्टमर एंगेजमेंट को जितना हो सके आसान बनाना। पिछले काफी समय से काम करते हुए मदन को यह अहसास हुआ कि बड़ी-बड़ी कंपनियां गांव के लोगों की जरूरतों को समझन नहीं पाई हैं। जबकि देश की आधी से अधिक आबादी गांवों में रहती है। देश में शहर से ज्यादा गांव हैं। कस्बों के साथ-साथ गांव में भी नए-नए प्रॉडक्ट्स यूज करने का प्रचलन इन दिनों काफी बढ़ चुका है। लेकिन उन्हें सही सामान अब भी नहीं उपलब्ध कराया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि हमने Airbnb जैसे स्टार्टअप की तरफ देखा तो हमें लगा कि गांव में इसकी जरूरत नहीं है। लेकिन उसी समय हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि गांव का युवा वर्ग रोजगार की तलाश कर रहा है। उसी से वन ब्रिज का कॉन्सेप्ट सामने निकलकर आया। यह स्टार्टअप ग्रामीण उद्यमियों और व्यापारियों से संबंध बनाकर ग्रामीण मार्केट में एलजी, टाटा, बजाज और यामहा जैसे ब्रैंड्स को पहुंचा रहा है। इससे ऑनलाइन और ऑफलाइन दुनिया आपस में जुड़ रही है। गांव में लगभग हर घर में स्मार्टफोन आ जाने की वजह से लोग अब फोन पर ही सामान ऑर्डर करते हैं और घर बैठे उसकी डिलिवरी हो जाती है।

यह सारा काम वन ब्रिज के जरिए होता है। मदन का मानना है कि गांव का आदमी शोरूम जाने से हिचकिचाता है। गांव में जिनके पास पैसा होता है वे भी किसी बड़े शोरूम जाने से कतराते हैं और डरते भी हैं। इस डर को दूर करने का काम वन ब्रिज कर रहा है। इसके लिए कंपनी ने गांव के 200 पढ़े-लिखे शिक्षित युवाओं को अपने साथ लिया और उन्हें ट्रेनिंग देकर वन ब्रिज का एडवाइजर बना दिया। शुरू में सात जिलों के 1,000 गांवों को टार्गेट किया गया। ये युवा 12वीं पास से लेकर ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर चुके हैं। ये सभी स्मार्टफोन के जरिए ग्रामीण आबादी की जरूरत को समझते हुए सामान बेचते हैं।

इन युवाओं को वन ब्रिज डिलिवरी एसोसिएट्स की जिम्मेदारी दी गई है। आमतौर पर ये सामान की डिलिवरी का काम करते हैं। एक तरह से देखा जाए तो वन ब्रिज ने गांव के लोगों के लिए घर बैठे शॉपिंग मॉल की व्यवस्था कर दी है। वे लोग जितना भी अपने फोन के जरिए सर्विस को एक्सप्लोर करते हैं उसे कंपनी द्वारा विश्लेषित भी किया जाता है। इससे कंपनी को समझ आता है कि उन लोगों की जरूरतें क्या हैं। इस डेटा को मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां भी इस्तेमाल करके फायदा उठा सकती हैं। आने वाले नजदीकी सालों में कंपनी अपने 150,000 उपभोक्ताओं की तादाद बढ़ाना चाहती है। इससे लगभग 20,000 उद्यमियों का भी उदय होगा।

 

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