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उत्तराखंड के इस कवि की कविताओं से रंगीं जेल की दीवारें

श्रीमन’ ऐसे यशस्वी कवि और स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, जिनके मातृगांव पर अंग्रेजों ही नहीं, राजशाही ने भी सबसे ज्यादा जुल्म ढाया था। उनका जन्म 17 जुलाई 1919 को टिहरी गढ़वाल में पट्टी सकलाना के गांव उनियाल में हुआ था।

 वह छात्र जीवन से ही कविताएं लिखने लगे थे। उन्हें प्रथमतः सुमित्रा नंदन पंत और डॉ. हरिवंश राय बच्चन से सृजन की प्रेरणा मिली। आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही और कृष्ण कुमार कौशिक के सान्निध्य में उनका नाम ‘श्रीमन’ पड़ा।

पर्वत प्रदेश उत्तराखंड के कवि मनोहरलाल उनियाल श्रीमन आग और पराग के कवि थे। जैसा लिखते, वैसा दिखते थे। उनकी वाणी में आग्नेय स्वर और हृदय में करुणा का सागर हिलोरें लेता था। उन्हें सुमित्रा नंदन पंत और डॉ. हरिवंश राय बच्चन से सृजन की प्राथमिक प्रेरणा मिली। दुखद है कि उनके सृजन-समर्पण को हिंदी साहित्य में आज तक अपेक्षित सम्मान नहीं मिला है। उन्नीस सौ साठ-सत्तर के दशक की पूरी पीढ़ी श्रीमन की ओजस्वी कविताओं से सुपरिचित और अभिभूत रही है। बलिदानी श्रीदेव सुमन के साथ प्रारंभ हुई उनकी संघर्षशील जीवन-यात्रा के गीतों ने एक पूरे काल-खंड पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ा।

कवि लीलाधर जगूड़ी लिखते हैं कि राजशाही और सामाजिक विद्रूपों के खिलाफ लड़ते हुए श्रीमन ने जैसा प्रतिरोधी आह्वान किया था, वह जैसे आज भी हमारे मन में गूंजता रहता है क्योंकि आज भी हमारा वैचारिक परिवेश पूरी तरह आजाद नहीं है। कहीं न कहीं गुलाम हैं और कई असमानताओं से हमारा समाज घिरा हुआ है पर आगे ऐसा विप्लवकारी समय आने वाला है, जब एक महान परिवर्तन होगा। तब शायद एक बार फिर श्रीमन जैसी समतावाही मशाल जलेगी। इस दृष्टि से गौर करें तो आज इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत है। ऐसा इतिहास, जिसमें आम आदमी की भागीदारी रेखांकित होनी चाहिए।

विद्यासागर नौटियाल के शब्दों में श्रीमन जी ने अपनी कविता की धार उस क्रांति की ओर मोड़ दी थी, जिसकी चिंगारियां पूरी रियासत के अंदर फैलने लगीं। …औपचारिक होकर रहना उनके स्वभाव के खिलाफ था। वे सही मायनो में एक क्रांतिकारी जनकवि और जनसेवक थे। उन्हें अपनी मंजिल का हरदम ख्याल रहता था और यह भी याद रखा जाना चाहिए कि वह एक स्पष्ट वक्ता थे। किसी के नाराज हो जाने के डर से उन्होंने अपने विचारों को कभी छिपाया नहीं और न किसी को खुश करने के लिए झूठी प्रशंसा की। वे किसी को डांटने लगते तो उस व्यक्ति को उनके सामने से भाग जाने के अलावा कोई विकल्प बाकी न रहता। वे एक स्वाभिमानी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपनी कविता में शहीद सुमन के अलावा किसी को इस योग्य नहीं समझा कि उसे श्रद्धांजलि दी जा सके।

‘श्रीमन’ ऐसे यशस्वी कवि और स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, जिनके मातृगांव पर अंग्रेजों ही नहीं, राजशाही ने भी सबसे ज्यादा जुल्म ढाया था। उनका जन्म 17 जुलाई 1919 को टिहरी गढ़वाल में पट्टी सकलाना के गांव उनियाल में हुआ था। बचपन से ही उनका जीवन संघर्षमय रहा। उन्नीस सौ साठ-सत्तर के दशक की पूरी पीढ़ी श्रीमन की ओजस्वी, क्रांतिचेता कविताओं से सुपरिचित और अभिभूत रही है। बलिदानी श्रीदेव सुमन के साथ प्रारंभ हुई उनकी संघर्षशील जीवन-यात्रा के गीतों ने एक पूरे काल-खंड पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा है।

जाने-माने कवि-कथाकार सूरज प्रकाश कहते हैं- ‘मेरे लेखन की तो शुरुआत ही श्रीमन जी द्वारा 1972 में संपादित कविता संग्रह ‘दहकते स्वर’ में शामिल कविता से हुई थी।’ वह छात्र जीवन से ही कविताएं लिखने लगे थे। उन्हें प्रथमतः सुमित्रा नंदन पंत और डॉ. हरिवंश राय बच्चन से सृजन की प्रेरणा मिली। आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही और कृष्ण कुमार कौशिक के सान्निध्य में उनका नाम ‘श्रीमन’ पड़ा। हाईस्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वह सुमित्रानंदन पंत, बद्रीदत्त पांडेय और देवकीनंदन पांडेय की संगत में पहुंच गए। बाद में उनके गांव उनियाल में अग्रज चंद्रमणि और सुखदेव ने उनके स्वाध्याय और साहित्य साधना के लिए अलग से कुटिया बनवा दी थी। उस कुटिया की दीवार पर लिखा था – ‘इस कुटिया का आवुल अतर, रहने दो मत खोलो द्वार। बाहर से ही सुन लो भीतर, क्या होता है मधु गुंजार।’

डॉ.पार्थ सारथी डबराल के शब्दों में ‘टिहरी कारागार की काली दीवारों पर यशोधवल आजादी की कविता लिखने वाले मनोहर लाल श्रीमन कारागार अधीक्षक के नृशंस काशाघातों से उत्पन्न कराह में कविता की राह ढूंढ सकते थे तो अब उन्मुक्त लहरित तिरंगे के तले वे अपनी प्रतिभा का सतरंगी निदान क्यों नहीं जानते। स्वतंत्रता की प्राप्ति पर पूरा विश्वास हो जाए पर श्रीमन सामाजिक जीवन पर भी कविता की कलम चलाने लगे। फिर भी आजादी के अवशिष्ट उत्साह में वे नागेंद्र सकलानी, श्रीदेव सुमन, भोलू आदि शहीदों पर भी श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे हैं।’ देहरादून में वह छात्र जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। यहीं से उन्होंने हस्तलिखित ‘उत्थान’ पत्रिका निकाली। सन् 1939 में उन्होंने अपने गांव उनियाल में बालसभा का गठन और आसपास के गांवों में विस्तार किया। उन्होंने अंग्रेजों को ललकारते हुए लिखा – ‘निर्माण, सृजन के प्रहरों में अब देश हमारा जाग उठा।’ उसी सक्रियता के दौरान सन 1942 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

राहुल सांकृत्यायन ने कभी कहा था कि कवि जिस हिमवंत खंड की संतान है, जिसे उसने अपनी शिशु आंखों से अब तक देखा, उसने उन्हें बहुत आकृष्ट किया है। उसका सुंदर चित्रण उन्होंने अपनी ‘तिलाड़ी का मैदान’, ‘शैल श्रेणियां’, ‘मेरा गांव’, ‘हिमवंत से हेमंत’ आदि कविताओं में किया है। श्रीमन को मैं हिमालय का सफल कवि देखना चाहता हूं। सबसे अधिक मुझे जिस चीज ने आकृष्ट किया है, वह है इनकी कविता में स्थानीयता का पुट। श्रीमन की एक रचना के ये तीखे तेवर तो देखिए-

रक्त रंजित पथ हमारा, हम पथिक हैं आग वाले।

आग का हम राग गाते, पाप की दुनिया जलाते,

लक्ष्य पर निज चल पड़े हैं, मृत्यु से कंधा मिलाते,

कौन-सा है भय हमे, जो पंथ से पीछे हटा ले।

आज सपना भंग होगा, झोलियों में रंग होगा,

लूट होगी आज, समझो विश्वव्यापी जंग होगा,

राजमहलों के खुलेंगे मुष्टिकों से आज ताले।

कब रुकाये रुक सकेंगे, जब चले तो बढ़ चलेंगे,

वे थकेंगे हार खाकर, हम विजय पाकर रुकेंगे,

इधर ज्वाला जल रही है, उधर छाये मेघ काले।

जब भुजाएं तनिक फड़कीं, श्रृंखलाएं तड़क तड़कीं,

पग उठे तो धरा कांपी, बिजलियां नभ-कड़क कड़कीं,

हम वही हैं बज्र भू के, ढल जिन्होंने शैल ढाले।

करुण क्रंदन अब न होगा, अनय नर्तन अब न होगा,

मुक्त मानव पर किसी का क्रूर बंधन अब न होगा,

पड़ चुके हैं, अब न आगे पड़ सकेंगे पेट लाले।

रक्त-रंजित पथ हमारा, हम पथिक हैं आग वाले।।

टिहरी की रियासत में छिड़े जनआंदोलन के उन दिनों में ‘श्रीमन’ के शब्दों से सचमुच मानो अनल की बारिश होती थी। उन्होंने तिलाड़ी के मैदान को जलियां वाला बाग की संज्ञा देते हुए लिखा –

अरे ओ जलियांवाले बाग, रियासत टिहरी के अभिमान।

रवांई के सोने के दास, तिलाड़ी के खूनी मैदान।

जगाई जब तूने विकराल, बगावत के प्राणों की ज्वाल,

उठा तब विप्लव का भूचाल, झुका आकाश, हिला पाताल,

मचा तब शोर, भयानक शोर, हिली सब ओर, हिले सब छोर,

तड़ातड़ गोली की आवाज, वनों में गूंजी भीषण गाज,

रुधिर की गंगा में अवगाह, लगे करने भूधर हिमचाल,

निशा की ओट हुई जिस ओर, प्रलय की चोट हुई उस ओर,

निशाचर बढ़ आते जिस ओर, उधर तम छा जाता घनघोर,

कहीं से आती थी चीत्कार, सुकोमल बच्चों की सुकुमार,

बिलखती अबलाएं भी हाय, भटकती फिरती थीं निरुपाय,

लुटी कुछ माताओं की गोद, लुटी कुछ बहनों की भी लाज,

पुंछा कुछ सतियों का सिंदूर, गया था कुछ का उजड़ सुहाग।

अरे ओ जलियांवाले बाग।

मगर थी फिर भी अपनी आन, मगर थी फिर भी अपनी शान,

निरंकुश सत्ता का स्वीकार, नहीं था उनको अत्याचार,

बुझा कब मेघों की बौछार सकी है धरती मां की आग।

अरे ओ जलियांवाले बाग।

शहीदों के उज्ज्वल बलिदान, बनेंगे तेरी पावन याद,

रहेगा जब तक तू आजाद, जलेंगे शत-शत क्रांति चिराग।

अरे ओ जलियांवाले बाग।

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