किम जोंग की ताकत और डोनाल्ड ट्रंप की सियासत

क्या किम जोंग उन ने ऐटमी परीक्षण न किए होते, तो डोनाल्ड ट्रंप उन्हें इतनी इज़्ज़त बख़्शते कि उनसे सिंगापुर जाकर मुलाकात करते…? अपने विरोधियों से अमेरिका इतने नेक व्यवहार के लिए नहीं जाना जाता. लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी ने अमेरिका पर भरोसा कर ऐटमी परीक्षण पर काम बंद कर दिया था. इसके बाद कर्नल गद्दाफ़ी का क्या हाल हुआ, यह सब जानते हैं. इराक ने भी ऐटमी कार्यक्रम शुरू नहीं किए थे, लेकिन डब्ल्यूएमडी – यानी सामूहिक विनाश के हथियारों – की तलाश के नाम पर अमेरिका ने इराक पर हमला कर उसे इस तरह तहस-नहस कर डाला कि वह अब तक इस हमले से उबर नहीं पाया है.

दूसरी तरफ़ ईरान ने अमेरिका की परवाह किए बिना ऐटमी प्रयोग और परीक्षण जारी रखे. इस्राइल के जासूसों ने बहुत कोशिश की कि ईरान यह काम न कर सके. उसके वैज्ञानिकों की हत्या की, नकली कंपनी बनाकर उसको घटिया सामान बेच दिया, लेकिन ईरान फिर भी छिपकर परीक्षण की तैयारी करता रहा. परीक्षण हुए और अमेरिका का रुख बदल गया. जबकि यह वह ईरान है, जिसने ओसामा बिन लादेन के परिवार को सबसे लंबी शरण दी. कैथी स्कॉट क्लार्क और ऐड्रियन लेवी की किताब ‘एक्साइल’ में इसका बहुत विस्तार से ब्योरा है. लेकिन अमेरिका ने इन सबको भुलाकर ईरान से ऐटमी क़रार का रास्ता अख़्तियार किया. बेशक, अभी वह इस क़रार से पीछे हट गया है, लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ किसी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई की उसकी हिम्मत नहीं है.

किम भी अमेरिका से डरकर अगर ऐटमी कार्यक्रम से पीछे हट जाते तो क्या होता…? अमेरिका एक ‘रोग नेशन’ को ख़त्म करने के जज़्बे के साथ उत्तर कोरिया पर टूट पड़ता और लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी सैन्य आधिपत्य का एक नंगा नाच चल रहा होता. तो जिस समय भारतीय मीडिया ऐटमी परीक्षण की कोशिश में लगे किम जोंग उन का मज़ाक बना रहा था और उन्हें कभी ‘तानाशाह’ और कभी ‘जोकर’ बता रहा था, तब वह चुपचाप दरअसल अपना वजूद बचाने का इंतज़ाम कर रहे थे. जब उन्होंने यह इंतज़ाम कर लिया और बताया कि उनकी बैलेस्टिक मिसाइलें कुछ अमेरिकी शहरों तक मार कर सकती हैं, तो अमेरिका को समझ में आया कि किम का कॉलर पकड़ने से अच्छा उनका हाथ थामना होगा.

इसलिए अब डोनाल्ड ट्रंप किम के सारे पाप भुलाकर उन्हें एक महान देशभक्त बता रहे हैं, उनके साथ अपनी मुलाकात को ऐतिहासिक और रचनात्मक बता रहे हैं, ऐटमी निरस्त्रीकरण का वादा कर रहे हैं और अपनी जनता की सुरक्षा और समृद्धि को लेकर किम को मिले अवसर का बखान कर रहे हैं. धीरे-धीरे लोग भूलते चले जाएंगे कि किम ने किस तरह अपने रिश्तेदारों की नृशंसता से हत्या करवाई है, अपने विरोधियों का कैसे सफ़ाया करवाया है, वह अपनी तानाशाही में कैसी क्रूरताएं करते रहे हैं.

निस्संदेह इस समझौते के अपने राजनीतिक फलितार्थ हैं. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच लगातार भड़क उठने वाली जंग शायद इससे कुछ कमज़ोर पड़े. ऐटमी हथियारों की होड़ भी कुछ मंद हो. लेकिन यह पूरी प्रक्रिया एक उदास करने वाले सवाल की ओर इशारा करती है – क्या दुनिया में सिर्फ़ ताक़त का तर्क चलता है…? अगर आप ताकतवर हैं, तो क्या आपके सारे पाप धुल जाते हैं…? अगर आपके पास ऐटम बम है और आप अमेरिका को नुकसान पहुंचा सकते हैं तो अमेरिका आपसे बात करने को तैयार है. लेकिन अगर आप नैतिकता की बात करते हैं, तो आपकी अनदेखी संभव है.

परमाणु निरस्त्रीकरण का यह पूरा मुद्दा दरअसल ताकत और नैतिकता के इसी द्वैत का प्रमाण है. दुनिया के सारे संप्रभु देशों में सिर्फ कुछ गिने-चुने परमाणुसंपन्न देशों को ही यह अधिकार क्यों हो कि वे ऐटमी हथियार रखें, बाकी क्यों न रखें – इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. बरसों तक भारत ने दृढ़तापूर्वक ख़ुद को सीटीबीटी – यानी समग्र परीक्षण प्रतिबंध समझौते – से अलग रखा. भारत का तर्क यही था कि दुनिया के कुछ देशों को ऐटमी विशेषाधिकार नहीं दिए जा सकते – और उनकी कीमत पर बाकी देशों को अपने नाभिकीय बंध्याकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. इसी तर्क को एक नैतिक विस्तार देते हुए भारत ने स्पष्ट किया था कि वह परमाणु परीक्षणों के पक्ष में नहीं है, लेकिन यह अधिकार उसके पास है कि वह जब चाहे, ऐटमी परीक्षण कर ले.

1998 के ऐटमी परीक्षणों के साथ भारत की यह समझ पीछे छूट गई. अब वह परमाणु सौदेबाज़ देशों में शामिल हो गया और उनके क्लब में शामिल होने के लिए जोड़तोड़ करने लगा. ठीक अगले दिन पाकिस्तान ने भी ऐटमी परीक्षण कर भारत की बराबरी कर ली. तब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के इस पराक्रम से अभिभूत देश ने यह नहीं देखा कि दरअसल यह ऐटमी परीक्षण भारत को मज़बूत नहीं, कमज़ोर करता है. इसकी कई वजहें थीं.

जो पाकिस्तान पारम्परिक हथियारों में हमसे कोसों पीछे था, वह ऐटमी हथियारों में हमारी बराबरी पर आ गया.

ऐटमी हथियार लंबी दूरी के और बड़ी लड़ाइयों के उपकरण तो हो सकते हैं, लेकिन लोअर ट्रेजेक्ट्री के युद्धों में उनका कोई काम नहीं हो सकता. पोखरन के फौरन बाद हुआ करगिल इसकी मिसाल साबित हुआ. करगिल में भारत ने बड़ी तादाद में अपने अफ़सर खोए, जिस ज़मीन को 48 घंटे में ख़ाली कराने की बात थी, उसे छुड़ाने में 48 दिन लग गए, और ऐटमी हथियार ज़खीरों में पड़े रहे.

दरअसल ऐटमी हथियार ज़ख़ीरों में पड़े रहने के लिए होते हैं. वे तबाही का वह सामान हैं, जिन्हें कोई भी देश बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर सकता. 1945 के बाद ऐटमी हथियार बस एक-दूसरे को दिखाने के काम ही आए हैं. अमेरिका वियतनाम का युद्ध हार गया, लेकिन ऐटमी हथियार इस्तेमाल नहीं कर सका. सोवियत संघ टूट-फूट गया, उसका ऐटमी ज़ख़ीरा पड़ा रहा. दूसरी तरफ़ जापान और जर्मनी जैसे देश बिना ऐटमी हथियारों के दुनिया पर अपना दबदबा बनाए रखने में कामयाब रहे. चीन का दबदबा भी उसकी आर्थिक हैसियत भी वजह से है, उसके ऐटमी हथियारों की वजह से नहीं.

तो दरअसल ऐटमी हथियार कूटनीति और ताकत के खेल में ब्लैकमेलिंग का सामान रह गए हैं. किम इस ब्लैकमेलिंग में कामयाब रहे. अब शांति की राह इसी से निकलनी हो, तो निकले. लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि ऐसी शांति अमूमन छलावा होती है. एशिया के कई हिस्सों में अमेरिका के शांति-प्रयासों ने दरअसल कितना ख़ून-ख़राबा कराया है, यह भूलने की बात नहीं है.

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