पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया संस्थान ही ज़िम्मेदार

लोकतंत्र में मीडिया का काम लोगों को जागरूक एवं शिक्षित करना होता है, लेकिन वर्तमान में मीडिया स्वंय ही जागरूकता एवं शिक्षा के अभाव से जूझ रही है। हाल ही में आयी ‘रिपोटर्स बिदाउट बॉर्डस’ नामक अन्तरराष्ट्रीय संस्था ने 180 देशों की सूची में भारतीय मीडिया को 138वां स्थान दिया। यह पिछले वर्ष के आंकड़ें से 2 स्तर घटा है साथ ही 2016 की तुलना में हम 5 स्तर नीचे आ गये हैं।

दरअसल, मीडिया के इस स्तर की ज़िम्मेदार वह स्वंय है, क्योंकि विज्ञापनों या टीआरपी उदाहरण है। जहां चैनलों ने माननीय सवेदनाओं को कुचलने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी।

इसी तरह बीते दिनों दैनिक जागरण अखबार ने भी कठुआ बलात्कार मामले में गलत खबर छापी थी, जिसे बाद में उसे अपनी बेबसाइट से हटाना पड़ा। बीते वर्ष नोटबंदी के बाद नोटों में जीपीएस चिप के दावे करना, हर रोज़ आईएसआई के सरगना बगदादी को मारना, उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन को टीवी पर रोज़ मारना एवं 2012 में दुनिया खत्म करने के दावे करना, यह सभी पत्रकारिता के स्तर को गिरा रहे हैं।

आज कल कुछ टीवी चैनल के एंकर चर्चा कम करते हैं, चींखते चिल्लातें ज़्यादा हैं ताकि लोगों का ध्यान आकर्षिक किया जा सके और अगर बात सेना से जुड़ी हो तो वह स्टूडियों को युद्ध-स्थल बनाने भी गुरेज नहीं करते हैं। आज तो स्थिति यह भी आ गयी है कि एंकर स्वयं पार्टी प्रवक्ता बन गये हैं। आप स्वंय उनके कार्यक्रम को देखने के बाद यह निर्णय कर सकते हैं कि किस एंकर का राजनीतिक झुकाव किस पार्टी की तरफ है।

गौरतलब है कि अधिकांश टीवी चैनल टीआरपी की दौड़ जीतने के लिए जंगल में जानवर, पाताल में भगवान की खोज, सास-बहू के नाटक तक दिखाने लगे हैं जो मीडिया की विषय-वस्तु पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं।

दरअसल, मीडिया की गिरती गुणवत्ता के लिए केवल मीडिया समूह को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा, क्योंकि देश की अधिकांश मीडिया समूह प्राइवेट है इसलिये उनका पहला काम तो व्यापार करना है। लेकिन पाठक और दर्शक ने सोचा है कि हमने निष्पक्ष एवं ज़िम्मेदार मीडिया बनाने के लिए कितना भुगतान किया है क्या 200 रूपये के केवल पैक एवं 3 रूपये के अखबार खरीदने भर से हमारी ज़िम्मेदारी खत्म हो गयी है ?

कभी सोचा है कि एक न्यूज़ पेपर को जिसे हम 2 या 3 रूपये में खरीदते हैं उसे बनाने का ही खर्चा 40-50 रूपये आता है तो फिर वह हमें 3 रूपये में पेपर कैसे मिल  रहा है। कोई तो है जो विज्ञापन के तौर पर उसे उस पेपर की पूरी रकम देता है ताकि बाद में अपने हित साध सके। अगर आवाम यह चाहती है कि मीडिया समूह अपनी नैतिकता समझे तो थोड़ी नैतिकता आवाम को भी दिखानी होगी और अच्छा ज्ञान पाने के लिए सही भुगतान भी करना सीखना होगा।

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