यूपी और बिहार में दरिंदगी की घटनाओं ने देश को किया शर्मसार

बिहार में मुजफ्फरपुर, उसके बाद उत्तर प्रदेश में देवरिया बालिका-गृह की जो एक ही तरह की सच्चाई सामने आई है, उसने देश भर के उन तमाम ठिकानों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जहां सहारा-बेसहारा लड़कियां दिन गुजार रही हैं। इसे देखते हुए दिल्ली महिला आयोग ने राजधानी में महिलाओं और लड़कियों के सभी शेल्टर होम्स के सोशल ऑडिट का आदेश दिया है। सवाल उठता है कि मुजफ्फरपुर और देवरिया के बालिका गृहों ने दर्जनों लड़कियों के जीवन को जो घाव दिए हैं अथवा ऐसे यातना गृहों में बसर हो रहीं जिन लड़कियों की आपबीती आज भी ढकी रह गई है, सबसे पहले उनको सामने लाए जाने की कोशिशें क्यों नहीं होनी चाहिए, जिन्होंने उनके साथ मुंह काले किए हैं। जाहिर है, वे समाज के सत्ता-शासन और पैसे से सम्पन्न लोग हैं।

वे लोग, जिनके जीवन के उजाले और अंधेरे में कोई फर्क नहीं है। देश के तमाम नारी संरक्षण गृहों के काले कारनामे भी प्रकाश में आते रहे है। आगरा (उ.प्र.) के संरक्षण गृह में बिताए एक साल के दौरान 45 में से सात संवासनियां मां बनीं। ज़िन्दगी में हर किसी से कभी ना कभी कोई गलती है, मगर कभी-कभी उस गलती की सजा कैद झेलकर भुगतनी पड़ती है। वाराणसी के संवासिनी गृह (नारी संरक्षण गृह) में भी ऐसी तमाम लड़कियां अपनी किसी गलती की सजा काट रही हैं। देश में यह बात तो सिर्फ कहने भर की रह गई है कि ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो’।

वर्ष 2014 में ऐसे ही हालात से आजिज आकर अहमदाबाद (गुजरात) के नारी संरक्षण केंद्र से 13 लड़कियां खिड़की की ग्रिल तोड़कर भाग निकली थीं। ऐसी घटनाओं को लेकर बेशर्म नेता अक्सर पक्ष-विपक्ष खेलते नजर आते हैं। वजह है, रात के अंधेरे में उनके भी तमाम शागिर्द मौके-दर-मौके देह नोच रहे होते हैं। अफसरों के तो कुनबा-कुनबा ये महामारी फैली रहती है। बड़ों से काम निकालने के लिए ठेकेदार, दलाल भी इन संरक्षण गृहों में रह रही लड़कियों का इस्तेमाल करते रहते हैं।

समय-समय पर ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं कि इन सुधार घर, संरक्षण गृह, बालिका गृह, बालिका आश्रम नामधारी ठिकानों पर नेता और बड़े-बड़े अधिकारी मुआयने के बहाने पहुँचते रहते हैं। शाबाशी और कमाई जारी रखने के लिए उन्हें लड़कियां परोसी जाती हैं। सूत्रों के अनुसार मथुरा, वृंदावन में यह काम दशकों से जारी है। मथुरा की लड़कियों को अलीगढ़ और आसपास के शहरों में भी गुपचुप तरीके से ले जाया जाता है। जब नेता और अधिकारी, कर्मचारी यह कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, वे सफेद झूठ बोलते हैं। जब मामला मीडिया की सुर्खियों में पहुंचता है, तब शासन, सरकारें हरकत में आती हैं। इससे पहले वे आखिरी दम तक चुप्पी साधे रहते हैं। मुजफ्फरपुर में अनाथ बच्चियों के शोषण की ऐसी चीख उठी कि देश की संसद और राजनीति में भूचाल आ गया है। मामला इस कदर संगीन हो चुका है कि इसकी जांच सीबीआई को करनी पड़ रही है। खुद बिहार के मुख्यमंत्री भी इस मामले पर अफसोस जता चुके हैं लेकिन मुजफ्फरपुर, देवरिया की घटनाएं कोई एक-दो ऐसे मामले नहीं है।

रोजाना ही मीडिया की सुर्ख़ियों में सामूहिक दुष्कर्म के न जाने कितने मामले आते रहते हैं और सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं। इसके लिए कोई भी क़ानून काम नहीं करता है। जनता की सुरक्षा के लिए नियुक्त पुलिस खुद अपराध में लिप्त होकर अपना विश्वास खोती चली जा रही है। छेड़छाड़ या अपहरण के मामलों को पुलिस सिरे से नकार देती है। उन मामलों को संज्ञान में लेती ही नहीं है। कह देती है कि हमारे यहाँ ऐसी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गयी है, जबकि हकीकत ये होती है कि थाने में जाने पर पीड़ित को डरा धमाका कर वे भगा देते हैं।

अगर उसमें ताकत है या फिर उसका कोई जैक है तो वह उच्च अधिकारीयों के पास जाकर गुहार लगाती है। तब कहीं मामला दर्ज हो पाता है। सामान्य तौर पर देखा जाय तो अकेले दिल्ली में ही प्रतिदिन बलात्कार या यौन उत्पीड़न का एक मामला दर्ज होता है। कितने दर्ज हो ही नहीं पाते हैं, इसकी कोई जानकारी नहीं होती है। इसमें से 2008-10 के बीच में 99.44 प्रतिशत घटनाओं को उन अपराधियों ने अंजाम दिया था, जो पहले भी उसी तरह के दुष्कृत्य के लिए दोषी करार दिए जा चुके थे। वे ऐसे अपराधों के आदी थे और खुलेआम घूम रहे थे। उनके लिए उपयुक्त सजा निर्धारित ही नहीं की गई।

इलाहाबाद संरक्षण गृह की घटना ने इसी तरह रोंगटे खड़े कर दिए थे। बच्चियों के शोषण से निरीक्षिका जानबूझकर अनभिज्ञ बनी रहती थी। कानपुर में एक निजी नर्सिंग होम में आईसीयू में एक लड़की की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। आरोपी गिरफ्तार हुए और कुछ ही दिन में कैद से स्वतंत्र। आईसीयू में लगे कैमरों में छेड़छाड़ कर रिकार्डिंग नष्ट कर दी गई। राष्ट्रीय अपराध लेखा संगठन के आंकड़ों पर ध्यान दें तो उसकी हकीकत कुछ ऐसी है।

वे आंकड़े तो बताते हैं कि हमारे यहाँ इस तरह के अपराधों में निरंतर कमी आ रही है लेकिन वास्तविकता क्या है? इसे सिर्फ एक सप्ताह तक अखबारों पर नजर गड़ाकर जाना जा सकता है। सच इससे भी ज्यादा घिनौना है। अखबारों तक भी वही सूचनाएं पहुंच पाती हैं, जो छिपाए नहीं छिपी होती हैं। बात साफ है कि सारे सरकारी दस्तावेज झूठ बोलते हैं। सवाल वाजिब है कि वे आकड़े किसको दिखाने के लिए इकट्ठे किए जाते हैं? क्या सिर्फ संसद में रखने के लिए या फिर जानबूझ कर गुमराह करने के लिए? हमारी न्याय प्रणाली कितनी त्वरित है, ये बात भी किसी से छिपी नहीं है। फिलहाल, तो यूपी और बिहार की ताजा दो घटनाओं से पूरा देश शर्मिंदित हो रहा है। लोगों में भारी गुस्सा है।

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