इस गांव के साथ सरकारी सिस्टम का क्रूर मजाक

देहरादून : तीन बार आपदा का दंश झेल चुके भिलंगना ब्लॉक के कोट गांव का साथ सिस्टम ने बड़ा क्रूर मजाक किया है। जिले में आपदा की दृष्टि से 58 गांव वर्ष 2002 में चिन्हित किए गए थे, लेकिन कोट गांव को आज तक आपदा से प्रभावित विस्थापित गांवों की सूची में शामिल नहीं किया गया है। अब मामले की जानकारी मिलने के बाद प्रशासन इस मामले में कोट गांव को आपदा प्रभावित गांव घोषित करने की तैयारी कर रहा है।

बेपरवाह सिस्टम की चाल आम आदमी बेहतर तरीके से जानता है, लेकिन कभी – कभी सिस्टम की लापरवाही ग्रामीणों पर भारी पड़ जाती है। आपदा की दृष्टि से जिले में 58 गांव चिन्हित किए गए हैं। जिन्हें प्रशासन ने आपदा के खतरे के चलते विस्थापन की श्रेणी में रखा है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि कोट गांव में तीन बार आपदा आ चुकी है और लगभग 16 लोग काल के ग्रास में समा चुके हैं लेकिन इस गांव को विस्थापन की श्रेणी में नहीं रखा गया है। जबिक ग्रामीणों से लेकर आम आदमी तक को यह जानकारी है कि कोट गांव को विस्थापन की श्रेणी में रखा गया है।

बीती रोज कोट गांव में आई आपदा के बाद जब प्रशासन ने दस्तावेज खंगाले तो सच्चाई सामने आई। सच्चाई सामने आने के बाद अब प्रशासन इस गांव को आपदा प्रभावित गांवों की सूची में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। लेकिन हैरानी इस बात कि है कि तीन बार आपदा आने के बाद भी कोट गांव को क्यों आपदा प्रभावित गांवों में शामिल नहीं किया गया। अगर कोट गांव को आपदा प्रभावित गांवों की सूची में शामिल कर लिया जाता तो हो सकता भा कि प्रशासन पर वहां पर सुरक्षा के लिए ग्रामीणों को जागरुक करता।

सोनिका (डीएम टिहरी गढ़वाल) का कहना है कि जिले में आपदा की दृष्टि से चिन्हित 58 गांवों में से कोट गांव शामिल नहीं है। सूची को देख लिया गया है। अब कोट गांव को विस्थापन की सूची में शामिल करने की तैयारी की जा रही है। ग्रामीणों को पूरी मदद की जा रही है।

खतरे की जद में आए 22 परिवारों ने खाली किए घर

मंगलवार की रात हुए हादसे के बाद प्रशासन के आसपास के 22 परिवारों से भी घर खाली करा दिए हैं। इन लोगों ने गांव के ही दूसरे घरों में शरण ली है। घनसाली के एसडीएम पीआर चौहान ने बताया कि इन परिवारों के मकान भी खतरे की जद में हैं। प्रभावित के भोजन की व्यवस्था गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में की गई है।

दरअसल टिहरी जिले के भिलंगना ब्लाक के इस गांव में एक ओर खड़ी पहाड़ी से अब भी मलबा गिर रहा है, ऐसे में प्रशासन कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं है। बुधवार रात ही प्रशासन ने इन 22 परिवारों को घर खाली करने को कह दिया था। इसके लिए इंटर कॉलेज में कैंप लगाया गया, लेकिन प्रभावित परिवारों ने कैंप की बजाए गांव के दूसरे घरों में शरण लेना उचित समझा। एसडीएम के अनुसार गांव में बिजली और पानी की आपूर्ति सुचारु कर दी गई है।

इसी गांव के रहने वाले धर्म सिंह जखेड़ी बताते हैं कि गांव पर पहली बार आपदा नहीं आई है। इससे पहले वर्ष 2002, 2008 और 2013 में बादल फटने से भूस्खलन से 26 लोग जान गंवा चुके हैं। वह बताते हैं कि गांव विस्थापित श्रेणी में भी है, लेकिन सरकार ने अब तक इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में इस इलाके के गांवों में दहशत तारी रहती है कि न जाने कब कहां क्या हो जाए। कहा कि लोग तभी खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे जब विस्थापन हो जाए।

सात मौतों के बाद सदमे में कोट गांव

डेढ़ सौ परिवारों वाले कोट गांव में बुधवार का दिन गांव की हंसी-खुशी को लील गया। प्राकृतिक आपदा के चलते उमा सिंह का परिवार ही उजड़ गया। सात लोगों के जिंदा दफन होने के बाद गांव में गुरुवार को भी सन्नाटा पसरा रहा। शाम को ही मृतकों का सामूहिक दाह संस्कार कर दिया गया।

विकास खंड भिलंगना का दूरस्थ कोट गांव अभी भी सहमा हुआ है। एक ही परिवार के सात लोगों के जिंदा दफन होने का खौफ अब भी ग्रामीणों के चेहरे पर है। उमा सिंह और उनकी पत्नी डबली देवी बीती रात ही गांव में आ गए थे। हर कोई उन्हें ढांढ़स बंधाने में लगा था, लेकिन उनकी हालत बदहवास जैसी थी। गुरुवार शाम मृतकों का सामूहिक दाह संस्कार भी कर दिया गया। गांव में हादसे के बाद अब नए सिरे से गांव के विस्थापन की मांग उठी है। ग्रामीण सवान सिंह का कहना है कि वह पिछले कई साल से प्रशासन से विस्थापन की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से सकारात्मक पहल नहीं हो रही है। शकुंतला देवी का कहना है कि हमारे गांव में कई बार आपदा के कारण कोई न कोई घटना होती है लेकिन उसके बाद भी गांव का विस्थापन नहीं किया गया। कुछ दिन प्रशासन विस्थापन की बात करता है, लेकिन फिर भूल जाता है।

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