शिक्षकों ने किया दुर्गम इलाकों के बच्चों का भविष्य चौपट

सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को शिक्षा देने का सरकार का लक्ष्य है. जिसके लिए करोड़ों रुपये बच्चों के खाने-पीने, रहने और पढ़ने के लिए सरकार दूरस्थ इलाकों में खर्च कर रही है. किफायती और गुणवत्तापरक शिक्षा मुहैया कराने के लिए शिक्षकों को मोटी सैलरी दी जा रही है. लेकिन कुछ शिक्षक दुर्गम और सुगम के फेर के चक्कर में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. देहरादून से 128 किमी दूर लाखामंडल का राजकीय प्राथमिक आवासीय बालिका विद्यालय जहां 185 बच्चियां शिक्षा ग्रहण करने दूरस्थ इलाकों से आई हैं. मगर शिक्षक इन बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.

दुरस्थ स्कूलों में शिक्षकों को लगता है कि यहां कोई देखने वाला नहीं है. जब मन करो स्कूल आओ और जब मन करे न आओं. 11 शिक्षकों में से यहां 6 शिक्षक तैनात हैं, जिनमें से 1 या 2 ही स्कूल में मौजूद रहें. जो कभी एक क्लास लेते तो कभी दूसरी और इसी तरह से पूरा दिन कटता है. प्रभारी प्रधानाचार्य भी स्कूल से नदारद दिखे. फिर एक शिक्षक ने जानकारी दी तो  15 मिनट के अंदर प्रिंसिपल साहब स्कूल में हाजिरी लगाने आये और सरकार पर ही दोष मढ़ते लगे.

स्कूल के किचन का हॉल और स्टोर रूम में  अव्यवस्थाएं देखने को मिली. फल से लेकर सब्जियां सड़ी हुई मिली. ये फल बच्चों को बांटने के बजाये कूड़े के ढ़ेर में फेंके जा रहे हैं. मिडे डे मील जब मामले में पूछा गया, तो प्रभारी प्रधानाचार्य ठेकेदार से स्पष्टीकरण मांगकर व्यवस्था ठीक करने का हवाला दे रहे थे.

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