जिंदल ग्‍लोबल यूनिवर्सिटी गैंगरेप: SC ने क्या कहा

जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में छात्रा से गैंगरेप करने वाले दो मुख्‍य दोषियों के हाईकोर्ट के आदेश के बाद रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है. कोर्ट ने कहा कि कानून हमें रोजाना नई चीजें सीखने को देता है. ये दुर्लभ केस है जहां ट्रायल के दौरान आरोपी जेल में रहे लेकिन सजा के बाद जमानत मिल गई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट इस तरह नहीं चलने देंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के तीसरे दोषी विकास गर्ग के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट पर रोक लगा दी है और 18 जनवरी को इस मामले की सुनवाई करेगा. 6 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की अर्जी पर आरोपी छात्रों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. इसके मुताबिक, तीनों को सरेंडर करना था लेकिन वो भी तक गिरफ्तार नहीं हुए हैं.

पिछले साल सितंबर में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के तीन लॉ छात्रों की सजा को निलंबित कर दिया था. उन्हें दो साल पहले यूनिवर्सिटी में ही पढ़ने वाली छात्रा को ब्लैकमेल करने और गैंगरेप रेप करने के मामले में दोषी ठहराया गया था.

निचली अदालत ने दो आरोपियों को 20 साल की सजा सुनाई थी
अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने मुख्य आरोपी हार्दिक सिकरी और उसके दोस्त करण छाबरा को 20 साल की सज़ा सुनाई थी जबकि विकास गर्ग को सात साल की सज़ा सुनाई गई थी. तीनों ने हाईकोर्ट से अपील लंबित होने की वजह से जमानत पर रिहा करने की मांग की थी. उनकी अर्जी को मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने उनकी सज़ा निलंबित कर दी ओर शर्ते लगा दी कि इस दौरान तीनों देश छोडकर नहीं जाएंगे.

छात्रा से किसी भी तरह संपर्क करने की कोशिश नहीं करेंगे और अपना दृश्यरतिक प्रवृतियों के बने रहने तक मनोचिकित्सक से काउंसलिंग कराएंगे. तीनों के अभिभावकों को निर्देश दिया गया है कि इस मुद्दे पर वो छह महीने बाद कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करेंगे.

ये एक मजाक होगा कि युवा मन को लंबे वक्‍त तक जेल में कैद रखा जाए : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वो पीडिता की चिंता, समाज की मांग और कानून और सुधारात्मक एवं पुर्नावास न्याय के बीच बैलेंस बनाना चाहते हैं. युवा मन को लंबे वक्‍त तक कैद रखना मजाक होगा.ये एक मजाक होगा कि युवा मन को लंबे वक्त तक जेल में कैद रखा जाए जो उन्हें शिक्षा, खुद के मुक्त होने के मौके और सामान्य तरीके से समाज हिस्सा बनने से वंचित करेगा. बेंच ने कहा कि लंबे वक्त तक कैद में रखना उनके लिए अपूर्णीय क्षति हो सकती है क्योंकि अपील कुछ समय तक लंबित रहेगी. हमारी राय में जब तक ये अपील लंबित रहेगी, दूसरे अपराध की संभावना में उनके मन में डर रहेगा कि अगर अपील फेल हो गई तो उन्हें लंबी कैद होगी. इतना ही नहीं बेंच ने  ये तक कहा कि ये पीडित का हिंसा के प्रति ‘ कैजुअल’ व्यवहार है जो सजा निलंबन के बाध्यकारी कारण हैं.

पीड़िता के बयानों में कहीं भी यौन अपराधों में परिचितों के साथ सामान्य व्यवहार, दुस्साहस और प्रयोग कोई अन्य पहलू नहीं आया और इसी कारण ये तथ्य सजा को निलंबित करने के बाध्यकारी कारण हैं वो भी तब आरोपी युवा हैं और पीड़िता ने हिंसा के प्रति अप्रिय व्यवहार नहीं दिखाया और वो सामान्य तरीके से घटनाओं के साथ चलती रही.

बेंच ने ये भी कहा कि ये घटना युवा मन की ड्रग्स, शराब और सामान्य यौन दुस्साहस के खतरनाक सोच की प्रतिबिंब है और ये एक भ्रमित व दृश्यरतिक दुनिया है. आदेश में पीड़िता के बयानों के आधार पर कहा गया है कि युवाओं की अपरिपक्व लेकिन नापाक दुनिया में जाने और झांकने की जरूरत है. जहां युवाओं को सम्मान और आपसी समझ पर आधारित रिश्तें की कीमत का अहसास नहीं है.

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