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तस्करों की मुट्ठी में हिमालय की संजीवनी बूटी

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया)

हिमालय के दुर्गम इलाकों में मिलने वाले इस करामाती फंगस का असली नाम वैसे तो कॉर्डिसेप्स साइनेसिस है लेकिन अपने अस्तित्व में आधा कीड़ा, आधा जड़ी होने के नाते इसे स्थानीय लोग कीड़ा जड़ी कहते हैं। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ ये फंगस चार लाख रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता था, वही अब इसकी क़ीमत आठ से 10 लाख रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में सूखी हुए इस बूटी की कीमत करीब 60 लाख रुपए तक है। यह दुर्लभ औषधि वर्षों से देश-दुनिया के तस्करों की मुट्ठी में है। वह इसे मनमाना कीमत पर बेंच रहे हैं। सरकारी तंत्र भी उनसे निपटने में विफल रहा है।

‘यारशागुंबा’ का उपयोग भारत में तो नहीं होता लेकिन चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है। शक्ति बढ़ाने में इसकी करामाती क्षमता के कारण चीन में ये जड़ी खिलाड़ियों ख़ासकर एथलीटों को दी जाती है। इस जड़ी की यह उपयोगिता देखकर पहाड़ी राज्यों में बड़े पैमाने पर स्थानीय लोग इसका दोहन और तस्करी कर रहे हैं क्योंकि चीन में इसकी मुँहमाँगी क़ीमत मिलती है।

कुछ वर्ष पहले तक जहाँ ये फंगस चार लाख रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता था, वही अब इसकी क़ीमत आठ से 10 लाख रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में सूखी हुए इस बूटी की कीमत करीब 60 लाख रुपए है।

सामान्य रूप से ‘यारशागुंबा’ एक तरह का जंगली मशरूम है, जो एक ख़ास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उसपर पनपता है। इस जड़ी का वैज्ञानिक नाम है कॉर्डिसेप्स साइनेसिस और जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर ये उगता है, उसका नाम है हैपिलस फैब्रिकस। स्थानीय लोग इसे कीड़ा-जड़ी कहते हैं, क्योंकि ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी है और चीन-तिब्बत में इसे यारशागुंबा कहा जाता है। कीड़ा जड़ी एक तरह की फफूंद है, जो हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में पाई जाती है। यह एक कीड़े पर हमला करती है, और उसे चारों तरफ से अपने आप में लपेट लेती है। ये जड़ी पहाड़ों के लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती है, जहां ट्रीलाइन ख़त्म हो जाती है यानी जहां के बाद पेड़ उगने बंद हो जाते हैं। मई से जुलाई तक, जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू जाता है।

‘यारशागुंबा’ का उपयोग भारत में तो नहीं होता लेकिन चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है। शक्ति बढ़ाने में इसकी करामाती क्षमता के कारण चीन में ये जड़ी खिलाड़ियों ख़ासकर एथलीटों को दी जाती है। इस जड़ी की यह उपयोगिता देखकर पहाड़ी राज्यों में बड़े पैमाने पर स्थानीय लोग इसका दोहन और तस्करी कर रहे हैं, क्योंकि चीन में इसकी मुँहमाँगी क़ीमत मिलती है। यहाँ तक कि इसके संग्रह और व्यापार में शामिल लोगों में इसके लिए ख़ूनी संघर्ष होने की घटनाएं देखने में आई हैं। यह एक नरम घास के बिल्कुल अंदर छिपी होती है और बड़ी कठिनाई से ही इसे पहचाना जा सकता है।

ये करामाती जड़ी सुर्खियों में नहीं आती, अगर इसकी तलाश को लेकर मारामारी न मचती और ये सबसे पहले हुआ स्टुअटगार्ड विश्व चैंपियनशिप में 1500 मीटर, तीन हज़ार मीटर और दस हज़ार मीटर वर्ग में चीन की महिला एथलीटों के रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद। उनकी ट्रेनर मा जुनरेन ने पत्रकारों को बयान दिया था कि उन्हें यारशागुंबा का नियमित रूप से सेवन कराया गया। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ ये फंगस चार लाख रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता था, वही अब इसकी क़ीमत आठ से 10 लाख रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में सूखी हुए इस बूटी की कीमत करीब 60 लाख रुपए है।

इस फंगस में प्रोटीन, पेपटाइड्स, अमीनो एसिड, विटामिन बी-1, बी-2 और बी-12 जैसे पोषक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं। ये तत्काल रूप में ताक़त देते हैं और खिलाड़ियों का जो डोपिंग टेस्ट किया जाता है, उसमें ये पकड़ा नहीं जाता। चीनी –तिब्बती परंपरागत चिकित्सा पद्धति में इसके और भी उपयोग हैं। फेफड़ों और किडनी के इलाज में इसे जीवन रक्षक दवा माना गया है।

हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने के बाद उत्तराखंड और हिमाचल के कबायली इलाकों में मिलने वाली यह दुर्लभ बूटी पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के तस्करों के निशाने पर है। इस दुर्लभ बूटी की तस्करी को लेकर हर वर्ष उत्तराखंड और हिमाचल में वन विभाग और पुलिस विभाग के फ्लाइंग स्क्वैड मुस्तैद कर दिए जाते हैं।

हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में करीब एक दशक से लोग इसे अपने स्तर पर इकट्ठा करते हैं और इसे छिपे हुए स्थानीय व्यापारियों को बेच देते हैं। हिमाचल में कीड़ा जड़ी के ऑन रिकॉर्ड कोई केस नहीं पकड़े गए हैं, चूंकि इस बूटी को तिब्बत के साथ लगते गांवों में कुछ वर्ष पूर्व ही तलाश किया गया है।

प्रदेश की खुफिया एजेंसी को इस बात की खबर है और वह अपने स्तर पर सतर्क है। उत्तराखंड में एक दशक पूर्व इस बूटी का कारोबार शुरू हुआ। उत्तराखंड में हर वर्ष करीब पांच किलो कीड़ा जड़ी तस्करों से बरामद की जा रही है। नेपाल में इस बूटी का कारोबार कभी वैध था और लम्बे समय तक यहां से यह बूटी वैध रूप से बेची जाती थी। बाद में इस पर नेपाल सरकार ने भी प्रतिबंध लगा दिया। गांव में एक कीड़ा जड़ी को एकत्रित करने पर 150 से 200 रुपए तक मिल जाते हैं। कुछ लोग तो एक दिन में 40 ऐसे फफूंद इकट्ठे कर लेते हैं।

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