गोल्डन फॉरेस्ट की जमीनों की भी होगी एसआइटी जांच

देहरादून : गोल्डन फॉरेस्ट की विवादित जमीनों पर भी भ्रष्टाचार की बू आने लगी है। पिछले माह जिला प्रशासन ने करीब 26 साल पहले तक अपंजीकृत श्रेणी में रखी गई रजिस्ट्रियों की जो रिपोर्ट शासन को भेजी थी, उसमें भी घालमेल पाया गया। इस पर शासन ने प्रशासन की रिपोर्ट को अस्वीकार करते हुए प्रकरण की एसआइटी जांच कराने की तैयारी कर ली है। खास बात यह कि इन रजिस्ट्रियों के अलावा गोल्डन फॉरेस्ट की अब तक चिह्नित की जा चुकी करीब 500 हेक्टेयर भूमि को भी जांच के दायरे में लिया जा सकता है। पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हुई तो यहां भी  एनएच-74 की तर्ज पर बड़ी कार्रवाई से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

गोल्डन फॉरेस्ट ने वर्ष 1995 से 1997 के बीच दून के विभिन्न क्षेत्रों जमीनें खरीदी थीं। इनकी बाकायदा रजिस्ट्री कर इसे सब रजिस्ट्रार कार्यालय में दाखिल भी किया। मगर, इन पर स्टांप ड्यूटी आवासीय की जगह कृषि दर पर दी गई। यहीं से जमीनों में भ्रष्टाचार का खेल शुरू हुआ। इसके अलावा जमीनों को सरप्लस दिखाते हुए सरकारी और प्राइवेट संस्थान को आवंटित करने का खेल भी किया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के साथ ही शासन ने खरीदी गई और सरप्लस हुई जमीनों की रिपोर्ट जिला प्रशासन से मांगी थी। इस पर 30 जुलाई 2018 को अपर जिलाधिकारी और सहायक महानिरीक्षक निबंधन ने एक रिपोर्ट शासन को भेजी।

शासन ने इसका अध्ययन किया तो रिपोर्ट में भारी घालमेल सामने आया। शासन ने प्रकरण में गड़बड़ी का अंदेशा जताते हुए कहा कि सरप्लस होने से बचने के लिए लेखा पत्रों के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी नहीं किए गए हैं। ऐसे में पूरे मामले की जांच कराई जानी जरूरी है।

इस संबंध में जिलाधिकारी देहरादून को गोपनीय पत्र भेजते हुए कहा गया कि हो सकता कि कूट रचित अभिलेखों से जमीनों की रजिस्ट्री भी हुई होगी। शासन ने रिपोर्ट के आधार पर पूरे मामले में अपराध होने की प्रबल आशंका जताई है। साथ ही प्रकरण में गैर जमींदारी विनाश भूमि (नॉन जेडए) का क्रय-विक्रय करने की भी बात कही गई।

ऐसे में शासन ने अपर जिलाधिकारी और सहायक महानिरीक्षक निबंधन की आख्या रिपोर्ट बिना जांच के अस्वीकार कर ली है। शासन के राजस्व विभाग ने इस मामले में एसआइटी जांच कराने की आवश्यकता बताते हुए प्रकरण में जिलाधिकारी को 15 दिन के भीतर गोपनीय जांच आख्या प्रस्तुत करने को कहा गया है। ताकि शासन इस मामले में एसआइटी जांच पर यथोचित निर्णय ले सके।

यह है पूरा मामला 

यह मामला गोल्डन फॉरेस्ट व उसकी सहायक कंपनियों से जुड़ा है। कंपनी की संपत्तियों को नीलाम करने के लिए जो सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई है, उसमें इनका जिक्र तक नहीं किया गया है। 400 एकड़ से अधिक की इन जमीनों की रजिस्ट्रियों को सब रजिस्ट्रार कार्यालय में दाखिल तो किया गया है, मगर इन्हें पंजीकृत नहीं किया गया।

यह जमीनें जांच के दायरे में

क्यारकुली भट्ठा, आरकेडिया ग्रांट, फतेहपुर, धर्मावाला, सुद्धोवाला, भिरतली, जस्सोवाला, आमवाला तरला।

इन कंपनियों के नाम थी आवंटित 

वर्ष 1995 से 1997 में गोल्डन फॉरेस्ट की क्रेता कंपनी में गोल्डन टूरिस्ट रिजार्ट, गोल्डन कम्युनिकेशन, हास कंस्ट्रक्शन प्रा.लि., जित्या कंस्ट्रक्शन प्रा.लि., कामा एस्टेट, जंगजा एस्टेट, धु्रवा सेल्स, जीवा आदि के नाम जमीन आवंटित थी।

इनसे खरीदी थी जमीनें 

राय सिंह, इंद्र सिंह, संजय घई, योगेश्वर दयाल, पवन नेगी, दीवान सिंह, हर प्रसाद, राम स्वरूप, सामा पन्ना लाल, हुगलाल, कालू, मोर सिंह, ललती सिंह, गंगाराम, रिडकू लाल, इंदर सिंह, राम सिंह आदि से जमीन खरीदी थी।

संयुक्त सचिव राजस्व कृष्ण सिंह ने बताया कि जिलाधिकारी से इस मामले में विस्तृत जांच आख्या मांगी गई है। जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने की बाद ही एसआइटी जांच की संस्तुति की जाएगी। रिपोर्ट में कुछ कमी थी, इसलिए इसे अस्वीकार किया गया है।

 

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