अनाथ होने के दर्द की छटपटाहट से अनाथो के लिए खोला स्कूल

अरुणाचल प्रदेश का खूबसूरत शहर है तवांग। प्राकृतिक खूबसूरती से भरपूर इस इलाके में ज्यादातर लोग खेती और पशुपालन से अपना गुजारा करते हैं। इसके अलावा पर्यटन भी यहां आय का प्रमुख स्रोत है। थुपटेन का जन्म तवांग के एक गरीब किसान परिवार में हुआ। बचपन झीलों और पहाड़ी वादियों के बीच बीतने लगा। पांच साल के हुए, तो पिताजी ने गांव के स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक जिंदगी बदल गई। तब वह नौ साल के थे। मां बीमार हुईं और अचानक चल बसीं। थुपटेन अकेले हो गए। कोई नहीं था उनके मन की बात समझने वाला।

मां के जाने के बाद वह बहुत उदास रहने लगे। कहीं मन नहीं लगता था उनका। एक दिन वह स्कूल से लौट रहे थे। रास्ते में दो बौद्ध भिक्षु मिले। भिक्षुओं ने उनको देखा और उदासी की वजह पूछी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, तुम्हें बौद्ध धर्म की दीक्षा लेनी चाहिए। थुपटेन बताते हैं, भिक्षुओं की बात सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई। मैंने तय किया कि मैं लामा बनूंगा। अगले दिन वह मठ पहुंचे। इसके बाद उनका जीवन बदल गया। उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। शुरुआत में लामा का जीवन कठिन लगा। घर से दूर रहकर कड़े अनुशासन में जीना पड़ा। मगर वह अपने जीवन की दिशा तय कर चुके थे। धीरे-धीरे मठ ही उनका परिवार बन गया। थुपटेन कहते हैं, एक बौद्ध भिक्षु की जिंदगी आम लोगों के जीवन से काफी अलग होती है। शुरू के कुछ महीने कठिन लगे। मगर बाद में अच्छा लगने लगा। यहां बड़ा सुकून था।

थुपटेन आगे की पढ़ाई के लिए दक्षिण भारत चले गए। वहां की संस्कृति उन्हें रास आने लगी, लेकिन वह अपने दिल से तवांग को कभी दूर नहीं कर पाए। कुछ दिनों के बाद उन्होंने घर लौटने का फैसला किया। गरीब परिवार से होने के कारण उनके मन में तवांग के गरीब व अनाथ बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा थी। इसी इरादे से वह अपने शहर लौटे। थुपटेन बताते हैं, मठ में प्रवास के दौरान मैंने कई बार बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा को सुना। वह इस बात पर जोर देते हैं कि हमें अपने गृह-क्षेत्र के लिए कुछ करना चाहिए। उनकी बातें सुनकर मेरे अंदर तवांग के बच्चों के लिए कुछ करने की प्रेरणा जगी।

वापस लौटने के बाद थुपटेन एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाने लगे। स्कूल से अच्छा वेतन मिल रहा था। टीचर होने के नाते इलाके में काफी सम्मान था। मगर वह खुश नहीं थे। उन्हें हमेशा उन बच्चों की फिक्र सताती रहती थी, जो फीस नहीं देने के कारण स्कूल नहीं जा पाते थे। मन में हमेशा यह बात कचोटती रहती कि वह नौकरी करने के लिए तवांग नहीं लौटे हैं। उनका मकसद तो गरीब बच्चों की मदद करना है। थुपटेन बताते हैं कि जिस स्कूल में मैं पढ़ाता था, वहां संपन्न परिवार के बच्चे आते थे। मैं उन अनाथ व विकलांग बच्चों को देखकर दुखी होता था, जो स्कूल नहीं जा पाते थे। इसलिए मैंने नौकरी छोड़ स्कूल खोलने का फैसला किया।

थुपटेन जानते थे कि स्कूल बनाने के लिए जमीन की जरूरत होगी। उन्होंने तवांग में सस्ती जमीन की तलाश शुरू की। जमीन खरीदने के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी। इसके बाद स्कूल की इमारत खड़ी करने में धन की कमी आडे़ आई। तमाम लोगों से मदद की गुहार लगाई। 1993 में स्थानीय प्रशासन और जन-सहयोग से स्कूल तैयार कराया। स्कूल पूरी तरह गरीब बच्चों के लिए समर्पित था। मगर मुश्किल अभी हल नहीं हुई थी। गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए जुटाना भी एक मुश्किल काम था। थुपटेन बताते हैं, ज्यादातर गरीब बच्चे मजदूरी करते हैं। अगर वे पढ़ने आते, तो उनका घर कैसे चलता? इसलिए ऐसे परिवार अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते। उनकी मुश्किल जायज थी, पर हम उन्हें यूं नहीं छोड़ सकते थे।

थुपटेन ने गांव-गांव जाकर जन-संपर्क किया। गरीब किसानों और मजदूरों से मिले। उन्हें समझाया कि गरीबी से छुटकारा पाने के लिए बच्चों को पढ़ाना जरूरी है। बड़ी मुश्किल से 17 बच्चे पढ़ने को तैयार हुए। इस तरह उनके स्कूल की शुरुआत हुई। स्कूल में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहने और खाने का इंतजाम भी किया। धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया। 1998 में उन्होंने मंजूश्री विद्यापीठ की स्थापना की। इस स्कूल में अनाथ और विकलांग बच्चों को प्राथमिकता दी गई। थुपटेन कहते हैं, मैंने बचपन में अपनी मां को खो दिया था, मैं अनाथ होने का दर्द समझता हूं। मैंने कोशिश की कि ऐसे बच्चों को स्कूल में परिवार का एहसास हो। हमारा मकसद बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और उन्हें नेक इंसान बनाना है, ताकि वे भी आगे चलकर गरीब व असहाय लोगों की मदद कर सकें।

थुपटेन चुपचाप समाजसेवा में लगे रहे। उनके काम की धमक पूरे अरुणाचल में गूंजने लगी। आज मंजूश्री विद्यापीठ में सैकड़ों बच्चे नि:शुल्क शिक्षा हासिल कर रहे हैं। साल 2004 में प्रदेश सरकार ने उन्हें सामाजिक कार्यों के लिए गोल्ड मेडल से सम्मानित किया। 2006 में उन्हें उत्तर-पूर्व अवॉर्ड से नवाजा गया। साल 2007 में उन्हें पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

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