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शिक्षा का काला कारोबार चरम पर

(मोहन भुलानी)

शिक्षा महंगी होती जा रही है और उस में भरपूर बेईमानी भी घुस रही है. पहले शिक्षा देने वाले अपने धंधों में चाहे बेईमानियां करते हों वे स्कूल, कालेजों को दान भी देते थे और उन के प्रबंध में समय भी. अब उलटा हो गया है और शिक्षा चाहे सरकारी हो या प्राइवेट दोनों में धांधली ही धांधली है. मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला इसी का नतीजा है. दिल्ली के समीप गुड़गांव में अंसल विश्वविद्यालय में आजकल हंगामा मचा हुआ है. अंसल विश्वविद्यालय अंसल बिल्डरों द्वारा चलाया जा रहा है और उन्होंने शिक्षा में भी छात्रों को अट्रैक्ट करने के लिए वे ही गुर अपनाए थे जो वे अपने फ्लैटों और प्लाटों को बेचने में अपनाते हैं : सब्जबाग दिखा कर पैसा वसूल करो.

छात्रों को कहा गया था कि उन्हें स्विमिंग पूल, जिम और स्पोर्ट्स सैंटर दिया जाएगा और उस के लिए मोटा पैसा ले लिया गया. पर छात्रों के हितों को तो आजकल के शिक्षा प्रबंधक ध्येय समझते ही नहीं हैं. उन्होंने छात्रों के फ्लैटों को खरीदारों के बराबर मान कर वादों को टरकाना शुरू कर दिया और नतीजा यह हुआ है कि अंसल विश्वविद्यालय के छात्र हड़ताल व धरने पर बैठे हैं. यह कई निजी विश्वविद्यालयों में हो रहा है, क्योंकि वहां प्रबंधक शिक्षा के माध्यम से अगली पीढ़ी को तैयार करने नहीं आ रहे, अपने लिए पैसा बनाने के लिए शिक्षा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

शिक्षा आज देश का एक बड़ा काला धंधा बन गया है. आज के मातापिता जानते हैं कि शिक्षा ही बच्चों का भविष्य बना सकती है और इसलिए बच्चों की पढ़ाई पर पेट काट कर खर्च कर रहे हैं, पर शिक्षा देने वाले इसे मातापिता की मजबूरी मान कर उन्हें लूटने में लग गए हैं. सरकारी शिक्षा में कौपीइंग, एबसैंटिज्म और ट्यूशन की भरमार है तो निजी में फीस के नाम पर डोनेशन और चार्जेज का बोलबाला है. प्रबंधक चाहे सरकारी शिक्षा के हों या निजी शिक्षा के, नई पीढ़ी के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूल चुके हैं और उसे कमाई और सिर्फ कमाई का धंधा मान कर चलते हैं. अफसोस यह है कि मातापिता अपने को इतना लाचार व असहाय समझते हैं कि हर पग पर कंप्रोमाइज करने को तैयार हैं. वे किसी भी गलत काम पर हल्ला नहीं मचाते.

गनीमत है कि देश की आबादी इतनी ज्यादा है कि कामचलाऊ संख्या में प्रतिभाशाली छात्र निकल ही आ रहे हैं. तभी तो 95 और 98त्न वालों को भी दाखिला नहीं मिल रहा है, पर यह भी संभव है कि जो 95 व 98त्न वाले बेईमान शिक्षा के प्रौडक्ट हों और डिग्री की प्रतिष्ठा को भी नष्ट कर रहे हों, पर इतना जरूर है कि हमारे युवाओं ने इन विषम स्थितियों में भी कुछ लाभ तो कमा लिया कि अमेरिका की सिलीकौन वैली भारतीयों  से भरी पड़ी है और अमेरिका में डौनल्ड ट्रंप के निशाने पर मुसलिम आतंकवादी कम और भारतीय मेधावी छात्र ज्यादा हैं. अगर हमारे शिक्षा प्रबंधक जरा से देशभक्त हो जाएं तो वे अगली पीढ़ी ऐसी तैयार कर सकते हैं कि भारत ही भारत दिखे.

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