छोटे से गांव से निकल कर “लल्लनटॉप” बनाने का दिलचस्प सफर

उत्तर-प्रदेश के छोटे से गांव से निकल कर लल्लनटॉप पत्रकार बनने का दिलचस्प सफर जब पत्रकार की बात आती है तो एक झोला लिए हुए कुर्ता पहने आदमी की तस्वीर यकायक मष्तिष्क में उभर कर आ जाती है लेकिन आधुनिकता के दौर में पत्रकारों के काम काज में भी बहुत परिवर्तन आ गया है । सोशल मीडिया के दौर में भ्रामक और अफवाह का एक तूफान मचा हुआ है , सब कॉपी-पेस्ट के जंजाल में उलझे हुए है । सोशल मीडिया ने खबर और उसके असर को अब व्यापक कर दिया है और पत्रकारिता भी अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है क्योंकि खबरों की सार्थकता और सत्यता को बचाना अभी सबसे कठिन कार्य बनता जा रहा है ।

आज हम ऐसे ही बदले हुए पत्रकारिता के नए चेहरे के मजबूत स्तम्भ के बारे में बात कर रहे है जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को इंटरनेट के युग में नए सिरे से स्थापित करने के लिए लल्लनटॉप कोशिश कर रहे है । आज उस पत्रकार की बात जो उत्तर-प्रदेश के कानपुर के उरई गांव से निकल कर एक नयी तरह की वेबज़ीन ” लल्लनटॉप के सरपंच बन जाते है । गणित में स्नातक सौरभ द्विवेदी कैसे एक पत्रकार बन जाते है , यह कहानी बहुत ही रोचक और संघर्षमय है ।

तो कहानी शुरू होती है उत्तर-प्रदेश के कानपूर से । कानपूर का अपना एक अलग ही स्वैग है और यह वो ही लोग समझ सकते है जो या तो कानपूर के है या कभी उनका कानपूर से पाला पड़ा है । कानपूर के उरई के पास के ही गांव में जन्मे सौरभ ने अपनी शुरुआती पढाई गांव में ही की थी । आगे की पढाई के लिए वो उरई से होते हुए पहुंच गए कानपूर के बोर्डिंग में । कानपूर में गणित में स्नातक करने के बाद JNU पहुँच गए । JNU में हिंदी साहित्य में मास्टर्स की और पत्रकारिता में पढाई के बाद फिर JNU से MPhil किया ।

सौरभ की पत्र्कारिता में जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है । हिंदी माध्यम में पढाई करने वाले सौरभ को पत्रकारों की ज़िन्दगी बहुत सही लगती थी क्योंकि देश में ताकतवर माने जाने वाले राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों पर भी पत्रकार अपनी बेबाक खबर लिखते थे । साथ ही सत्ता-पक्ष की आलोचना करना बहुत ही पावरफुल और जिम्मेदारी का काम है तो फिर जैसे-जैसे और पढ़ते गए तो समझ में आता गया की यह उस से भी ज्यादा जिम्मेदारी का काम है क्यूंकि आप एक तरह से अपने समय का इतिहास दर्ज करते हो । शुरू से ही भाषा में अच्छी पकड़ थी और भाषण आदि भी दिया करते थे और पॉलिटिकल रीडिंग में बहुत दिलचस्पी थी, इन सब वजहों से मीडिया में इंटरेस्ट आया और पहुंच गए पत्रकारिता की पढाई करने IIMC में ।

पत्रकारिता की पढाई के दौरान सौरभ इंटर्नशिप के चलते स्टार न्यूज़ में दो महीने के लिए काम किया । शुरुआत छोटी-मोटी ख़बरों से करने वाले सौरभ ने वहां पर एक एस्ट्रो शो शुरू करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । उसके बाद सौरभ ने टाइम्स ग्रुप ज्वाइन किया और वहां पर उन्होंने कोआपरेट न्यूज़ वर्ल्ड का पहली बार सामना किया , यहाँ का अनुभव उनके लिए बहुत काम आया और उन्होंने पत्रकारिता की कुछ बहुत जरूरी चीज़े नवभारत टाइम्स में काम करते हुए सीखी ।

नवभारत टाइम्स में तीन साल के सफर के बाद उन्होंने भास्कर ग्रुप को ज्वाइन किया जो अभी भास्कर.कॉम नाम से भारत का सबसे बड़ा न्यूज़ पोर्टल चला रहा है । नवभारत में की गयी मेहनत यहाँ पर काम आयी और सौरभ ने भास्कर ग्रुप में मिले मौकों को दोनों हाथ लिया और सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए । जब वो सिर्फ 26-27 साल के थे तब वो न्यूज़ राइटर बने और बिलकुल नए सिरे से काम सीखा । न्यूज़ कैसे बनानी है , उसकी क्या डिज़ाइन काम में लेनी है और उनमे क्या कंटेंट होना चाहिए, ये सारे अनुभव सौरभ द्विवेदी के लिए बहुत काम आये ।

उसके बाद सौरभ ने इंडिया टुडे ग्रुप ज्वाइन किया जो हिंदी में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले न्यूज़ चैनल आज तक की स्वामित्व कंपनी है । इंटरनेट पर हिंदी के बढ़ रहे चलन ने सौरभ को काफी प्रभावित किया और कुछ सार्थक और कुछ रेलेवेंट करने की चाह में लल्लनटॉप का जन्म हुआ जो आज भारत की सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाली न्यूज़ साइट्स में से एक बन चुकी है । कानपूर के उरई से निकल कर लल्लनटॉप के सरपंच बनने वाले सौरभ की जिंदगी कम संघर्षमय नहीं रही है लेकिन अपनी कलम की धार और मेहनत ने कभी भी सौरभ को किसी भी संघर्ष में घबराने नहीं दिया और आज सौरभ एक नयी प्रजाति ” डिजिटल पत्रकार ” के रोल मॉडल बन चुके है ।

एक इंटरव्यू में सौरभ ने कहाँ है कि ” लल्लनटॉप” के सफल होने की एक बड़ी वजह यह है कि इसमें पत्रकार बहुत कम हैं । लल्लनटॉप पत्रकारों की तरह नहीं सोचता । हमारी टीम की ताकत वह लोग हैं जो जर्नलिज्म के बैकग्राउंड से नहीं आये हैं, जिन्होंने उसकी पढ़ाई नहीं की है. लेकिन वो स्मार्ट और क्रिएटिव हैं। उनके पास पत्रकारिता का हैंगओवर नहीं है।”

सौरभ आगे कहते है कि ” लल्लनटॉप में हमने बहुत स्पष्ट रखा था कि हम जो मिलेनिअल क्राउड है, जो अच्छी चीजें जानना चाहता है हिन्दी की, उनको कैटर करेंगे। जो लोग काम कर रहे हैं उनमें एक बाइंडिंग फ़ोर्स भी होती है। वे लल्लनटॉप के आईडिया में यकीन करते हैं, जो बहुत जरूरी है. क्यूंकि जो लोग काम कर रहे हैं अगर वह यकीन नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

एक आखिरी और सबसे जरूरी चीज है कंटेंट, अगर आप इन्टरनेट पर उपलब्ध चीजों को कट-कॉपी-पेस्ट करके डालेंगे तो आप ज्यादा दिन चलेंगे नहीं । अगर चल भी जायेंगे तो आपकी ब्रांड इमेज नहीं बनेगी ।तो कंटेंट के लिए आपको बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, फील्ड में जाना पड़ेगा, किताबें पढ़नी पड़ेगी, सिनेमा देखना पड़ेगा। इस तरह सौरभ नए युग की पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ बन कर उभरे है और हम आशा करते है कि आप ऐसे ही युवा पत्रकारों और लल्लनटॉप के रीडर्स को प्रेरित करते रहेंगे ।

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