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भष्टाचार के खिलाफ बुलंद आवाज उठाने वाला IFS ऑफिसर

हमारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज ऊठाना एक दुष्कर कार्य है। एक सामान्य अवधारणा है कि व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनना पड़ेगा। परंतु अब इस कथन की चमक खोने लगी है। बाहूलसंख्य को कोई अकेला या मुठ्ठी भर लोग नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। यह बदलाव अपने अन्दर में जगानी होगी, यह लहर पूरे देश में फैलनी चाहिए।

यह महत्वपूर्ण है कि IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के सकारात्मक प्रयास को मान्यता मिलनी चाहिए। 2002 बैच के IFS अधिकारी संजीव ने हरियाणा और दिल्ली में सेवारत रहने के बाद AIIMS में भी मुख्य निगरानी अधिकारी के रुप में भी काम किया है। वे अपने काॅलेज के दिनों में बहुत गुण संपन्न रहे जिसकी दमक उनके IFS के प्रशिक्षण में भी ऊभर कर आयी। वे IFS परिक्षा में दूसरे स्थान पर रहे और उन्हें प्रशिक्षण के दौरान भी उत्कृष्ठता के दो-दो अवार्ड मिले।

शुरुआत से ही एक नेकनीयत अधिकारी रहे और उन्होंने बेईमान साझीदारों पर अपका पंजा कसना शुरु कर दिया, जो स्पष्टतः भ्रष्टाचारियों को रास नहीं आई। उन्होंने सरस्वती वन्यजीव अभयारण्य के ठेकेदारों के विरुद्ध अवैध वृक्ष कटाई और हिरण के अवैध शिकार का F.I.R. दर्ज कराया। उन्हें वन प्रधान सचिव से फटकार मिली और उनका तबादला कर दिया गया।

उनका नया पदस्थापन फतेहाबाद में हुआ, जहाँ उन्होंने औषधीय पौधों के संस्थान परियोजना में भ्रष्टाचार के तहत काँग्रेस के विधान सभा सदस्य प्रह्लाद सिंह गिलकरे और उनके रिश्तेदारों को अभियुक्त बनाया। जो करदाताओं के पैसे से खरीदे गये पौधों का प्रयोग अपने निजी उद्यानों में कर रहे थे। यह उनके करियर में एक बहुत बड़े विघात के रुप में आया जब 3 अगस्त 2007 को उन्हें हरियाणा सरकार ने बिना किसी अधिसूचना के पद से बरखास्त कर दिया। ऐसे समय में उन्हें नसीहत मिलने लगी की वे ईमानदारी का बिगुल बजाना बंद कर दें।

बिल्कुल सत्य था कि उन्हें भ्रष्टाचार के प्रतिकार की सजा मिली थी। अप्रैल 2008 में, एक स्वयंसेवक संगठन एकता परिषद् ने इस मामले के विषय में न्यायालय का रुख किया और प्रधानमंत्री कार्यालय तक से जवाब की माँग की परंतु हुड्डा सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। यह फाईल समीक्षा हेतु हरियाणा सरकार के वन मंत्री से हुड्डा सरकार तक वापस पहुँची। मगर समीक्षा देने की बजाए हुड्डा सरकार ने वह फाईल तीन वर्षों तक के लिए वहीं
पर रखी जिससे संजीव की पदोन्नति अटक गई।

जनवरी 2008 में, इस तकरारी घटना के बाद उनकी बर्खास्तगी पत्र राष्ट्रपति द्वारा वापस ले लिया गया और उनका पदस्थापना झझर में कर दिया गया। ऐसा लगता था मानो यही काफी नहीं हुआ था। उन्हें एक नाॅन-कैडर पद पर नियुक्त किया गया। केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा आपत्ति जाहिर किए जाने पर 2009 में उनका पदस्थापन प्रभागीय वन अधिकारी के पद पर कर दिया गया। अगला प्रतिकार जैसे उनका रास्ता देख रहा हो। उन्होंने
झूठे वृक्षारोपन के मामले का केस लगाया जिसमें करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का गबन था। इस खुलासे के तहत 40 कर्मचारियों पर चार्जशिट दाखिल किया गया और 10 को बर्खास्त किया गया। चतुर्वेदी को शक था कि कई वरिष्ठ अधिकारी भी इस कई करोड़ के घोटाले में संलिप्त थे। उन्होनें निगरानी विभाग से जाँच की दरख्वास्त की।

हुड्डा सरकार और संजीव के बीच की जंग जारी रही और सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों से उन्हें झटका दिया सिर्फ उन्हे नीचा करने के लिए और गलत ढ़ग से केस बनाने के लिए लिखित क्षमा पत्र माँगा गया।

इस घटना के फौरन बाद संजीव का आकस्मिक स्थांतरण 2009 में हिसार कर दिया गया। वहाँ उन्होंने फिर से एक वृक्षारोपण घोटाले का खुलासा किया। जनवरी 2010 में उन्होंने एक प्लाईवुड ईकाई को भ्रष्टाचार के कारण सील कर दिया। उस ईकाई ने लाईसेंस शुल्क के तौर 22 लाख रुपये की बजाय मात्र 26,000 रुपये अदा किए थे।

संजीव पर भ्रष्टाचार के कई दोषारोपण हुए मगर वे अडिग रुप से सबका सामना किया। अपने ऊपर हो रहे उत्पीड़नों के लिए उन्होंने राष्ट्रपति कार्यालय को खत लिखा। 2008 से 2014 तक कई जाँच हुए। भारत के राष्ट्रपति के संबल से चतुर्वेदी चार बार हुड्डा सरकार के आदेशों को निष्क्रिय किया। यद्यपि, इन सब उथल पुथल के बीच संजीव के ससुराल वालों ने उनपर दहेज की माँग का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दायर कर दी। सब कुछ नजरअंदाज करते हुए संजीव ने अपना पूरा ध्यान देश की सेवा में लगाया।

29 जून 2012 को संजीव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के सहायक सचिव के रुप में नियुक्त किए गए। यहाँ उन्हें मुख्य निगरानी अधिकारी (CVO) का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। CVO के रुप में उन्होंने अनाधिकृत रुप से विदेश दौरा करने वाले डाॅक्टरों पर कार्यवाही की। इसी दरम्यान पुलिस ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के एक कार से 6 करोड़ की दवा जब्त की। तत्कालीन स्वास्थ मंत्री गुलाम नवी आजाद ने संजीव के विशिष्ठ कार्यों को दर्ज किया।

वह कहते है, “ईमानदारी ही मेरी शक्ति है और मैं हमेशा न्याय और सही मार्ग के लिए लड़ता रहूँगा जबतक मुझे इसके लिए अवसर प्राप्त होता रहेगा।”

चतुर्वेदी ने अबतक 200 मामलों पर कार्यवाही की पहल की। उन में से 78 मामलों में सजा हुई, 87 मामलों में चार्जशिट फाईल किए गए जबकि 20 मामलों में केस केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंपा गया है। 2014 में संजीव को CVO के कार्यभार से मुक्त कर दिया तथापि वे AIIMS के सह सचिव के पद पर बरकरार रहे। उन्होंने तत्कालिन स्वास्थ्य मंत्री पर टिप्पणी की थी जिस कारण गलत आधार पर उन्हें हटा दिया गया। AIIMS के कर्मचारी उनके समर्थन में आगे आए और उन्होंने प्रधानमंत्री को उनके पुर्ननियुक्ति के लिए पत्र लिखा।

तत्कालिन 10वें स्वास्थमंत्री हर्ष वर्द्धन ने कहा कि उन्हें इसलिए हटा लिया गया क्योंकि CVO जैसा कोई पद नहीं है। संजीव को अस्थाई तौर पर प्राधिकृत किया गया था जिसे फिर विघटित कर दिया गया। नई सरकार ने जे.पी. नड्डा को स्वास्थ्य मंत्री का कार्यभार सौंपा। उन्होंने उनके प्रदर्शन को उत्कृष्ठ से कमजोर करने का प्रयास किया। परंतु जून 2015 में केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने ऐसा करने में उन्हें रुकावट डाल दी।

वर्तमान में नैनिताल, उतराखण्ड के हल्दवानी में वन संरक्षक के में पदस्थापित है। साल 2015 में उन्हें नेतृत्व क्षमता के लिए रेमन मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। संजीव चतुर्वेदी की यह हिम्मत और सच्चाई की लगन एक सबल प्रशासनिक सेवा के कर्तव्यों को ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करने की अनूठी मिसाल है। हर तरह के दवाब में भी अडिग संजीव ने सच्चाई के लिए जीवटता का जो परिचय दिया है वह चिरअंनत शाश्वत रहेगा।

 

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