Templates by BIGtheme NET

आखिर 50 देशों के राजनयिक मोहन भागवत को मिलने क्यों आये ?

समय के साथ-साथ उदारवादियों, धर्मनिरपेक्ष लोगों, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने गौरी लंकेश की हत्या से जुड़ी ऐसी कहानी बनाने की कोशिश की कि देश के अंदर और विश्व समुदाय में भी यह समझा जाए कि बीजेपी और आरएसएस ने सत्ता की मदद से नफरत, असहिष्णुता और हिंसा का वातावरण तैयार किया है.

ऐसे में मोहन भागवत ने असाधारण कदम उठाते हुए दुनिया भर के राजनयिकों से मिलकर उनके सामने अपनी बात रखने की पहल की.

आमंत्रित राजनयिकों के लिए आरएसएस प्रमुख व सत्ताधारी बीजेपी के वैचारिक प्रमुख के साथ मुलाकात का यह पहला मौका था, जहां अपनी जानकारी दुरुस्त करने के लिए वे कुछ भी पूछ सकते थे और चीजों को उचित संदर्भ में समझ सकते थे. 50 देशों के राजनयिकों के लिए यह अवसर था कि वे उनके (मोहन भागवत के) बारे में राय बनाते, जो दुनिया के सबसे बड़े ‘सामाजिक’ संगठन को चलाते हैं और उस दल के संरक्षक हैं जिसका दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर शासन है.

आरएसएस को समझने का था मौका

चूंकि आरएसएस प्रमुख या फिर इसके शीर्ष पदाधिकारियों के साथ सीधे संवाद करने का मौका या तो नहीं के बराबर रहा है या फिर ऐसे बहुत सीमित अवसर रहे हैं, इसलिए इन राजनयिकों की और संबंधित देशों के सक्षम अधिकारियों की जो राय बनी हुई है उसका आधार मीडिया रिपोर्ट रहा है या फिर संघ के दूसरे स्तर के लोगों की ब्रीफिंग. और, यहां तक कि आरएसएस के आलोचकों और विरोधियों के विचार भी इस राय का आधार रहे हैं.

निश्चित रूप से आरएसएस के लिए यह कोई स्वस्थ परिस्थिति नहीं थी. इतना ही नहीं, चूकि कभी संघ प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी ने बीजेपी का नेतृत्व करते हुए उसे केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के साथ-साथ 18 राज्यों में बीजेपी की सरकार दी है इसलिए ऐसा महसूस किया गया कि आरएसएस के नेतृत्व को खुलकर सामने आना चाहिए.

ये एक बदलाव

बहुत लंबे समय से संघ के आलोचक और विरोधी कहते रहे थे कि यह ऐसा संगठन है जिसका गोपनीय मकसद है. हालांकि संगठन पिछले कुछ सालों से इस स्थिति को सही करने की कोशिशों में जुटा हुआ है लेकिन मीडिया और संघ परिवार से बाहर के लोगों के साथ संगठन ने पिछले कुछ सालों से मेलजोल बढ़ाया है. यहां तक कि इसने मीडिया विंग और आधिकारिक प्रवक्ता भी बनाए हैं लेकिन इसके वर्तमान प्रमुख मोहन भागवत विदेशी राजनयिकों के साथ सीधे घुलमिल रहे हैं तो यह कुछ अलग है, जिसका चाहे जो भी मतलब निकाला जा सकता है.

दुनिया के सभी हिस्सों से आए उच्च स्तरीय करीब 50 राजनयिकों ने, चाहे वे पश्चिम से हों या इस्लामिक देशों से, ने यही संकेत दिया कि वे वास्तव में उनसे मिलने, उन्हें और उनके संगठन को जानने आए हैं.

बीजेपी और आरएसएस का रिश्ता

कुछेक मिलती जुलती घटनाओं की ओर ध्यान देना दिलचस्प रहेगा.

जुलाई 2005 में जब हिन्दुत्व के कट्टर नेता माने जाने वाले एल.के आडवाणी ने पाकिस्तान की यात्रा की थी और बड़ी संख्या में मीडिया का ध्यान आकृष्ट किया था, किसी प्रमुख व्यक्ति ने टिप्पणी की थी- ‘वे सभी देखने आ रहे हैं कि आडवाणी के पास सींग हैं या नहीं… मुझे नहीं  मालूम कि क्या वे निराश हैं या खुश हैं कि उनके पास ऐसी कोई सींग नहीं है.’

दूसरा मुद्दा आरएसएस की स्वीकार्यता का है. सितंबर 2000 में अमेरिका दौरे पर गए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुचर्चित टिप्पणी की थी, ‘मैं भी स्वयंसेवक हूं.’ लेकिन यह भी सच है कि उनके कार्यकाल के दौरान ऐसे कई मौके आए जब उनके, उनकी सरकार और आरएसएस के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे. यह संबंध इतना तनावपूर्ण हो गया कि मीडिया से दूर रहने वाले तत्कालीन आरएसएस प्रमुख के.एस सुदर्शन ने एक इंटरव्यू में उनकी सरकार पर तीखी टिप्पणी कर डाली.

हालांकि नरेंद्र मोदी ने कभी भी ‘मैं भी स्वयंसेवक हूं’ जैसी टिप्पणी नहीं की या फिर उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कि जिससे उनके सैद्धांतिक रुख का स्वाभाविक तौर से पता चलता हो, लेकिन उनके व्यक्तित्व को संघ के दर्शन के सांचे में ढलता हुआ माना गया. यह भी सच्चाई है कि परिस्थितियों से निपटने का उनका तरीका वास्तविक राजनीतिक धरातल और सरकार की जरूरतों के अनुरूप होता है, फिर सैद्धांतिक आवरण में भी उसे परख लिया जाता है. इसके बावजूद वाजपेयी काल के 6 सालों के मुकाबले बीजेपी और आरएसएस के बीच सभी स्तरों पर समन्वय बहुत अच्छा और बाधारहित है. इससे आरएसएस प्रमुख की अहमियत बढ़ जाती है.

ये रहे मुद्दे और प्रतिक्रियाएं

विदेशी राजनयिकों के साथ ब्रेकफास्ट ब्रीफिंग में भागवत ने विस्तार से बताया कि संगठन का ढांचा और इसके काम करने के तरीके क्या हैं और फिर सवालों के आमंत्रित करते हुए कहा कि उन्हें पता है कि सबके मन में बहुत सवाल हैं. नयी बात ये रही कि इस बैठक और उसका चुनिंदा विवरण के बारे में वास्तव में मुख्य स्रोत के जरिए सामने नहीं, बल्कि राम माधव और ए सूर्य प्रकाश के ट्वीट्स से यह दुनिया को पता चला. यही वजह है कि ट्वीट के जरिए ही इस पर प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरीके से आईं,

‘भागवतजी ने राजनयिकों से कहा- संघ बीजेपी को नहीं चलाता है. बीजेपी संघ को नहीं चलाती है. स्वयंसेवक के तौर पर हम परामर्श देते हैं, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं लेकिन कामकाज में स्वतंत्र होते हैं.’

दुनिया के बहुतेरे लोगों को इससे क्या मतलब और इसलिए भागवत की राय पर लोगों की ट्रॉलिंग में हर तरह के रंग देखने को मिले. एक ऐसा मुद्दा, जिस पर उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष लोग ‘राष्ट्रवादियों’ और संघ परिवार के समर्थकों पर बरसने लगे.

‘संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत: हम ट्रॉलिंग और आक्रामक व्यवहार का नेट पर समर्थन नहीं करते.’

About News Trust of India

News Trust of India is an eminent news agency

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful