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गुजरात की राजनीति में प्रवीण तोगड़िया का उदय और अंत

(हरबंश सिंह)

साल 1995 में, भाजपा की सरकार गुजरात में बन चुकी थी, इस सरकार की सबसे बड़ी बात थी कि कुछ आम लोगों को जनता ने चुनकर सत्ता की गद्दी पर बिठाया था। इस सरकार के निर्माण में बहुत से ऐसे लोग थे जो ना ही सरकार में शामिल थे और ना ही परोक्ष या अपरोक्ष रूप से किसी भी तरह से सरकार के लाभार्थी थे। मसलन राजनीतिक नहीं थे, लेकिन राज्य की राजनीति में इनका बहुत बड़ा और अहम स्थान था। प्रवीण तोगड़िया, इसी तरह के शख्स थे जिनकी सरकार में सुनी भी जाती थी और इनके कहने पर विभाग के मंत्री भी बदल जाते थे। शायद यही वजह थी कि जो इंसान 95 के पहले गुमनाम था अब उसके आगे पीछे मीडिया के कैमरो की नज़र बनी रहती थी।

साल 95 में जहां भाजपा गुजरात में मौजूद थी वहीं 96 के बाद 99 तक दो बार श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री बन गए थे और 1999 के चुनाव में, भाजपा अपने मित्र राजनीतिक पार्टी के साथ मिलकर अगले 5 वर्ष के लिये केंद्र की सत्ता में स्थायी हो गयी जिसका प्रधानमंत्री चेहरा बन कर श्री वाजपयी जी ही उभरे थे। 1995 ओर 2002 तक, गुजरात और केंद्र दोनों जगह भाजपा मौजूद थी, अब ये कहने की ज़रूरत नहीं थी कि यह हिन्दुतत्व का प्रचार करने का एक सटीक समय था, जिसका पूरा फायदा प्रवीण तोगड़िया ने उठाया।

मुझे याद है इन दिनों, टीवी के कैमरा पर, तोगड़िया अक्सर दिखाई देते थे। अपने भाषण में हिंदी भाषा को गुजराती भाषा की शैली में बोलते हुये अक्सर, उत्तेजित शब्दों को ऊंचा स्वर देकर, सभा का रंग बदल देते थे। एक छोटे से त्रिशूल, जिसे जेब में भी रखा जा सकता है, वो अक्सर अपनी सभाओं में बंटवाया करते थे।

वो मंच से ये ऐलान करते थे कि हर हिंदू को शस्त्रधारी होना ज़रूरी है। लेकिन ये विचार करने वाला तथ्य है कि मुख्यतः इनका त्रिशूल वाला प्रोग्राम उसी राज्य में होता था जहां गैर भाजपा सरकार थी। इसकी सुर्खियां अखबार और टीवी मीडिया में बनती थी। इस कार्यक्रम के कड़े विरोध के कारण कई बार तोगड़िया को जेल भी जाना पड़ा, लेकिन इनकी लोकप्रियता और अखबार की सुर्खियों की स्याही का रंग और गहरा होता चला गया।

शायद साल 2003 ही रहा होगा जब अहमदाबाद की सड़क के किनारे, खड़े होकर मैंने व्यक्तिगत रूप से तोगड़िया जी के काफिले को आते हुए देखा, जहां ये किसी अस्पताल में जा रहे थे। वहीं एक अंजान व्यक्ति ने बताया कि तोगड़िया, MBBS स्नातक हैं और इसके पश्चात इन्होंने कैंसर विशेषज्ञ के रूप में पढ़ाई की है और कई वर्षों से ये बतौर डॉक्टर स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हुए हैं। मेरे लिये ये अचंभित कर देने वाला तथ्य था खासकर तब जब तोगड़िया और इनकी संस्था विश्व हिंदू परिषद पर, 2002 के दौरान गुजरात दंगों में हिंसा फैलाने के आरोप लग रहे थे। जंहा सैकड़ों की तादाद में जान गई वहीं तोगड़िया का एक डॉक्टर होना ये दोनों विरोधाभाषी तथ्य मुझे समझ नहीं आ रहे थे, खासकर, इतने पढ़े लिखे इंसान की कट्टर धार्मिक छवि, समाज की किस मानसिकता को बयान कर रही थी मैं समझ नहीं पाया।

इसी संदर्भ में यहां विषय से हटकर डॉक्टर माया कोडनानी का उदाहरण भी दिया जा सकता है जो तोगड़िया की तरह ही एक डॉक्टर हैं। इनका खुद का अस्पताल है, लेकिन 2002 दंगो के दौरान बहुचर्चित नरोडा पाटिया केस, जंहा भीड़ द्वारा कई मुस्लिम लोगों की निर्मम हत्या की गई थी। इस केस में डॉक्टर कोडनानी को सजा हो चुकी है जो कि फिलहाल जमानत पर रिहा हैं।

कहने का तात्पर्य जो इंसान शिक्षित है, अच्छा बुरा समझ सकता है, खुद का अस्पताल है, पैसा भी है, असुरक्षा की भावना भी नहीं है, वह किस तरह एक कट्टर छवि को स्वीकार करता है? क्या यंहा राजनीतिक उभार या सत्ता एक कारण है ?

शायद यही वजह थी कि कई डॉक्टर्स ने मिलकर, श्री प्रवीण तोगड़िया के खिलाफ मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया के समक्ष एक अर्ज़ी दी जिसमें विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 28 फरवरी 2002 के दिन गुजरात बंद का ऐलान और इसी सिलसिले में VHP से जुड़े श्री प्रवीण तोगड़िया के उत्तेजित किये जाने वाले भाषण से राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया गया और इनसे तुरंत डॉक्टर की डिग्री वापस लेने की मांग भी की गई।

तोगड़िया जी की कट्टर छवि को समझने के लिये थोड़ा सा इनके इतिहास को समझना ज़रूरी है, खासकर तोगड़िया और नरेंद्र मोदी को, जहां ये दोनों अहमदबाद शहर के मणिनगर स्थिति आरएसएस की मुख्य शाखा में अग्रसर होकर हिस्सा लेते थे। 1983 में तोगड़िया विश्व हिंदू में शामिल हुए वहीं 1984 में आरएसएस प्रचारक से हटकर मोदी भाजपा में शामिल हो गए। लेकिन तोगड़िया ओर मोदी, दोनों साथ मिलकर पूरे गुजरात प्रांत में हिदुत्व और भाजपा का प्रचार कर रहे थे। और समय-समय पर एक दूसरे को सहयोग देते रहे।

1995, में बनी भाजपा की सरकार का सेहरा, अक्सर मोदी ओर तोगड़िया के सर भी बांधा जाता है लेकिन इसके पश्चात मोदी को गुजरात की राजनीति से संन्यास दिलवा कर दिल्ली ले जाया गया। ऐसा कहा जाता है कि इस समय गुजरात भाजपा में मोदी जी को कोई पसंद नहीं करता था और वह जब भी आते थे, तब अक्सर VHP के दफ्तर में ही मिलते थे। इसी दौरान तोगड़िया ओर केशु भाई पटेल के राजनीतिक संबंध ओर नज़दीक आ गएं।

खैर राजनीति ने अपना रुख बदला और 2001 में मोदी जी गुजरात प्रांत के मुख्यमंत्री बने, ऐसा सुनने में आता है कि इस समय आडवाणी ने तोगड़िया से भी इस पर विचार विमर्श किया था। शायद यही वजह थी कि तोगड़िया ने अपने खास कहे जाने वाले गोरधन झड़पिया को मोदी जी के कैबिनेट में गृह मंत्रालय में बतौर मंत्री नियुक्त करवा दिया, ये वही मंत्री है जिन पर 2002 के दंगों के दौरान, हिंदू भीड़ के प्रति नरम रुख रखने का आरोप अक्सर लगता रहता है।

लेकिन 2002 दंगो के बाद, चुनाव में प्रवीण तोगड़िया ने भाजपा और मोदी प्रचार के लिये हैलीकॉप्टर में उड़ कर 100 से ज़्यादा रैलियां की, शब्दों के जाल में 2002 दंगों को भुनाया भी। लेकिन 2002 चुनाव में मोदी जी की सरकार बनने के बाद, सबसे पहला जो काम हुआ वह यह कि मोदी मंत्रिमंडल में उन्हीं मंत्रियों को जगह मिली जिन्हें मोदी चाहते थे और जिसके लिए कोई दबाव नहीं था, यही वजह रही कि अब गोरधन जडफिया मोदी मंत्री मंडल से बाहर हो गए थे।

ये कड़ा संदेश तोगड़िया के लिये भी था कि अब उनकी सरकार में कोई हैसियत नहीं है, तोगड़िया को आरएसएस से भी निराशा हाथ लगी, जो मोदी के खिलाफ नहीं जाना चाहती थी और भविष्य में मोदी जी को केंद्र की सत्ता में एक नाम के रूप में भुनाना चाहती थी।

शायद यही वजह थी कि 2003 के बाद, अब हालात बदल गए थे और अब अक्सर तोगड़िया जी मोदी के विरोध में खड़े हुए नज़र आने लगे। फिर चाहे विकास की आड़ में मोदी गुजरात सरकार द्वारा 2008 में गांधीनगर में कई हिंदू धार्मिक स्थानों को तोड़ना हो या 2002 दंगों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की आज्ञा के पालन अनुसार राज्य सरकार द्वारा विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं पर कानूनी शिकंजा कसना हो, हर वक्त तोगड़िया, आम सभाओं में, सड़क पर खुलकर मोदी जी का विरोध कर रहे थे।

लेकिन अब तोगड़िया को कोई मीडिया कवरेज नहीं मिल रहा था, ना ही लोग उनसे जुड़ रहे थे, जैसे मोदी जी राजनीतिक मंच पर अपना कद बढ़ाते चले गए वैसे-वैसे तोगड़िया जी का कद कम होते चला गया, आज ऐसा कहा जाता है कि तोगड़िया जी की गाड़ियों का काफिला सिर्फ उनकी गाड़ी तक सीमित रह गया है।

शायद तोगड़िया जी के राजनीतिक जीवन का अब अंत है, लेकिन राजनीतिक मंच के पुराने खिलाड़ी के रूप में तोगड़िया जी ज़रूर एक बार फिर दहाड़ेगे। मंच कौन सा होगा, अगर इसी नज़रिये से समझेंगे तो पटेल आंदोलन इतना विशाल कैसे बन गया जिसके कारण आज मोदी जी की गुजरात में लोकप्रियता में कम हो रही है ? इस आंदोलन के पीछे कोई ना कोई मज़बूत हाथ तो ज़रूर रहा होगा। अफवाहों का दौर गर्म है।

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