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जाति व्यवस्था को बढ़ावा देता आरक्षण

(दीपा धामी )

आधुनिक हिन्दुस्तान के सबसे विवादित विषयों में से एक है, आरक्षण। आरक्षण सरकारी नौकरियों में और सरकारी शिक्षण संस्थानों में। गौरतलब है कि हमारे संविधान के मुताबिक़ शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का प्रावधान है। इस तकनीकी लफ्ज़ “शैक्षिक और सामजिक पिछड़ेपन” का सरल अर्थ है “जाति” के आधार पर आरक्षण। क्योंकि ये माना गया है कि सदियों से चली आ रही वर्ण और जाति व्यवस्था के कारण कुछ जातियां तरक्की की दौड़ में पिछड़ गयीं या यूँ कहें कि गैर बराबरी के सामाजिक नियमों के कारण उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिले।

कुछ इसी तरह के तर्कों के आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में किया गया था। मूल रूप से ये प्रावधान 10 वर्षों के लिए था, लेकिन समय सीमा लगातार बढ़ाती रही गयी और यह आज भी लागू है। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद यह 49.5 फ़ीसदी तक पहुँच गया है जिसमें 27 फ़ीसदी ओबीसी को और 22.5 फ़ीसदी अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलता है।

ये तो थी संक्षिप्त भूमिका, वर्तमान में चल रही आरक्षण व्यवस्था के बारे में। आपको हजारों दलीलें आरक्षण के समर्थन में मिल जायेंगी और उतनी ही इसके विरोध में। यहाँ उद्देश्य यह नहीं है कि ये सिद्ध किया जाए कि आरक्षण की व्यवस्था सही है या गलत बल्कि कोशिश ये समझने की है कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आरक्षण की शुरुआत की गयी थी क्या वह पूरे हो रहे हैं? इस सन्दर्भ में हमें डॉ अम्बेडकर को याद करना चाहिए जिनके कहने पर आरक्षण व्यवस्था को संविधान में जगह मिली। डॉ अम्बेडकर के सबसे प्रसिद्ध लेखन में से एक है “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” यानी कि जाति का उन्मूलन। यह मूल रूप से एक भाषण के लिए लिखा गया लेकिन डॉ अम्बेडकर वह भाषण दे नहीं सके और बाद में यह लेख के रूप में सामने आया। लेख पढ़ने से ये स्पष्ट हो जाता है कि डॉ अम्बेडकर जाति जैसी संस्था को गैर बराबरी वाली और शोषण की संस्था मानते थे और उसके पक्ष में नहीं थे।

आरक्षण के पीछे यही उद्देश्य माना जा सकता है कि जो वर्ग तरक्की में पिछड़ गए हैं उनके आगे आने के बाद जाति व्यवस्था कमजोर होगी, और अंततोगत्वा ख़त्म हो जायेगी। लेकिन क्या ऐसा हुआ या हो रहा है? क्या भारतीय राजनीति में जाति के उन्मूलन के गंभीर प्रयास हुए हैं? या फिर जातिगत अस्मिताओं को बरकरार रखने की कोशिश ही हुई है। जो राजनीतिक दल दलितों, पिछड़ों या यूँ कहें सामजिक न्याय की राजनीति करते हैं उन पर गौर करें तो पाते हैं कि उन्होंने जाति के उन्मूलन के बजाय जातिगत अस्मिताओं को उभारने पर ही बल दिया। अम्बेडकर, लोहिया जैसे कुछ लोग अपवाद जरुर हैं। चाहे वह दलित हों अथवा ओबीसी की राजनीति करने वाले उनका मुख्य ध्यान जातिव्यवस्था को तोड़ने में कम और अपनी जातियों के गौरवगान में ज्यादा रहा है। दरअसल दोष इनका कम है। ऐसी राजनीति को खाद मिलती है जातिगत श्रेष्ठता की ब्राह्मणवादी सोच से।

हालांकि, मूल प्रश्न अब भी यही है कि क्या जातिव्यवस्था कमजोर हुई है? इमानदारी से कहें तो निश्चित तौर पर। अंतर्जातीय विवाह बढ़े हैं और समाज का एक तबका एसा है जो किसी प्रकार की जातिगत श्रेष्ठता की भावना में यकीन नहीं करता लेकिन क्या ये आरक्षण की वजह से संभव हुआ है। आप आश्वस्त होकर ये तो कह सकते हैं कि आरक्षण की वजह से दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों की सामजिक, आर्थिक स्तर में बदलाव आया है लेकिन जब बात जाति-व्यवस्था की आती है तो ये कहना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि आरक्षण का लाभ लेने के लिए ही पहली शर्त है कि आप जाति-विशेष से हों। मायने यह हुआ कि आपकी जातिगत पहचान तो बनी ही हुई है और जबकि आरक्षण का परम उद्देश्य था “जाति का उन्मूलन।”

मसला ये भी है कि वैश्वीकृत दौर में पल बढ़ रही युवा पीढ़ी का एक बड़ा तबका जो शहरों में है वह कठोर जाति व्यवस्था से उतना परिचित नहीं होता लेकिन अक्सर 12वीं के बाद दाखिले लेते समय या नौकरी के समय उसे अपने ही दोस्त के अपने से अलग होने का एहसास होता है| और ऐसी दलीलें कि पूर्वजों के समय काफी अत्याचार हुए थे, उस व्यक्ति को संतुष्ट नहीं कर पातीं जो ये अपने पुरखों के किये काम का दंड भुगतने को तैयार नहीं है। दरअसल जब तरह की दलील दी जाएगी तब उसी दलील से आप औरंगजेब के किये कामों के लिए आज के मुसलमानों को सजा देने निकल पड़ेंगे। और इसी लॉजिक से ब्रिटिश हुकूमत के अपराधों के लिए डेविड कैमरून से बदला लेने की बात करेंगे|

ध्यान रहे यहाँ ये सरलीकृत करने का प्रयास नहीं किया जा रहा है कि वर्तमान में जातिगत भेदभाव नहीं हो रहा वरन चिंतन इस बात पर है कि आरक्षण ने अपने परम लक्ष्य “जाति का उन्मूलन” में क्या योगदान दिया है और कहीं ये जाति जो मजबूत तो नहीं कर रहा? क्योंकि नौजवानों के मन में बैठती टीस कहीं से भी जाति को तोड़ती नहीं दिखाई देती। यहाँ ये मानना भूल होगी कि केवल सामान्य वर्ग के लोगों में ऐसी भावना है। अन्य पिछड़े वर्गों और मुसलमानों के बड़े तबके को आरक्षण का कोई ख़ास लाभ नहीं मिलता। अब ओबीसी कट ऑफ़ भी बहुत सी नौकरियों में जनरल के आस पास ही रहती है तो इस वर्ग में भी आरक्षण को लेकर पहले जितना उत्साह नहीं रहा है। हाल ही में हुए पाटीदारों और जाटों के आन्दोलन इसी कसक का नतीजा हैं जो आरक्षण से वंचित रहने वाले तबके में होती है। अगर आप जाट और पाटीदार आन्दोलन के दौरान दिए गए बयानों को देखेंगे तो पाएंगे कि ये खुद आरक्षण की मांग से ज्यादा दूसरे को आरक्षण देने से समस्या के खिलाफ हैं और समाधान के तौर पर इन्हें भी आरक्षण चाहिए। कुल मिलाकर जातिगत आधार पर आरक्षण के लिए बढ़ती मांग जाति को मजबूत ही करती दिख रही है।

बहरहाल, आरक्षण व्यवस्था संवैधानिक अधिकार के रूप में दम ख़म के साथ जारी है और पूरी संभावना है कि आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगी। ये दुहराना जरुरी है कि आरक्षण की वजह से एक बड़े तबके को मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिला लेकिन क्या यही सबसे बेहतर रास्ता है? क्या जाति पूछकर आरक्षण देने से डॉ अम्बेडकर का “एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट” का स्वप्न पूरा हो जायेगा। ये डगर मुमकिन नहीं लगती क्योंकि इसका आधार ही जाति है और जिस व्यवस्था की नींव ही जाति हो वह क्या जाति तोड़ेगी!

 

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