किराए के हथियारों और बदमाशों के बल पर UP में डकैतों की सल्तनत

कानपुर.  एमपी और यूपी के कई जिलों में सैकड़ों किलोमीटर में फैले पाठा के जंगलों में आजादी के बाद से अब तक डकैतों की बूटों की आहट कायम है। 60 के दशक मेें एक 16 साल के लड़के ने अपने पिता की मौत का बदला देने के लिए बंदूक उठाई औैर 20 साल तक उसकी यहां हुकूमत चलती रही। उद्देश्य पूरा होते ही उसने तो हथियार डाल दिए, लेकिन तब तक कई और खुंखार डकैत पैदा हो गए। सरकारों ने इन्हें खत्म करने के लिए अभियान चलाया। ददुआ, ठोकिया, बलखड़िया का खात्मा किया, पर इनके हथियार पुलिस ने बरामद नहीं किया। जिसका नतीजा ये रहा कि मरने के बाद इनके हथियार आज भी दहशत कायम किए हुए हैं। पूर्व दस्यू गया पटेल कहते हैं कि ददुआ गैंग के पास अनेक आधुनिक असलहे थे, एनकाउंटर के बाद वो सीधे ठोकिया के पास चले गए। उसकी मौत के बाद आज यही औजार अपराधी बबली कोल के पास हैं। जिनके बल पर वह 2 सौ घंटे से ज्यादा देर तक पुलिस के साथ मुठभेड़ करता रहा और फरार होने में कामयाब रहा।

बस हाथ बदलते जा रहे हैं

पाठा में दहशत फैलाने वाले कई बड़े नाम इस समय में मंडल कारागार में बंद हैं। इनमें ददुआ के दत्तक पुत्र सूबेदार सिंह उर्फ राधे, तहसीलदार सिंह उर्फ लक्खू, रामप्रसाद उर्फ भोंडा, भोले उर्फ गोप्पा, धर्मपाल सिंह, संग्राम सिंह जैसे दस्यु शामिल हैं। इनमें कई तो जेल में बंद होने के बाद भी बाहर मौजूद साथियों के माध्यम से गैंग चला रहे हैं। अपराध के साथ साथ ग्रामीण समस्याओं की पंचायत इनके फरमानों से संचालित होती है। कई ने तो अपने असलहे तक दूसरे गिरोहों को किराए पर दे रखे हैं। यानी फायर पावर आज भी ददुआ व ठोकिया के समय का है, बस हाथ बदलते जा रहे हैं। जिन असलहों के दम पर ददुआ व ठोकिया ने बीहड़ में राज किया था, वही असलहे आज भी जवानों का सीना छलनी कर रहे हैं। ज्यादातर मुठभेड़ में पुलिस को डकैतों की लाशें तो मिलीं पर उनके असलहे हाथ नहीं लगे।

किराए पर लिए जाते हैं बदमाश

गया पटेल कहते हैं कि जब हम पाठा में थे तो हमारा खुद का गैंग था और हमारे साथी शराब व पैसे के लिए जंगल में नहीं उतरे, बल्कि एक मकसद के तहत हम बागी बने। गया ने बताया कि ददुआ के मारे जाने के बाद गैंग के सदस्य या तो जेल में हैं, या अपने घरों पर। लेकिन ठोकिया, बलखड़िया औ बबुली कोल सिर्फ अयाशी के चलते बदमाश बने। इनके गैंग में सदस्यों की जगह महज नाम मात्र की थी। जिसके चलते ये लोग गरीब और बेरोजगार
युवकों को वारदात अंजाम देने से पहले पैसे का लालच देकर अपने साथ लेते हैं। वारदात को अंजाम देने के बाद डकैत इन्हें पैसे देकर जंगल से निकाल देते हैं। बबुली कोल आज नहीं तो कल जरूर मारा जाएगा। हम चाहते हैं कि इनका खत्मा हो और जंगल के आसपास रहने वाले लोग खुशहाल जिंदगी जिएं।

इसी के चलते जिंदा हैं गैंग

वहीं पूर्व दस्यू सुंदरी भी कहती हैं कि बीहड़ हो या पाठा, मारे गए डकैतों के हथियार पुलिस बरामद करने में कामयाब नहीं रही। इसी के चलते छुटभैया गैंग आज भी जिंदा हैं। वहीं मामले पर डीआइजी ज्ञानेश्वर तिवारी, ने बताया कि यह सही है कि बदमाशों के पकड़े जाने और मारे जाने पर गिरोह के असलहों की बरामदगी नहीं हो पाती। ददुआ व ठोकिया के गिरोहों के बचे सदस्य ही वह असलहे तैयार गिरोहों तक पहुंचाते रहे हैं। किराए में देने जैसी बात नहीं है। कोई यदि जेल गया भी तो बाकी गिरोह के पास असलहे बने रहते हैं। हालांकि इस बार मुठभेड़ में अलग-अलग बोर की तीन रायफलें बरामद की जा चुकी हैं।

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