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राजनीति राहुल गांधी के बस की बात नहीं !

(मिन्हाज मर्चेन्ट)

19 जून को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 47 साल के हो गए हैं. इस वक्त राहुल गांधी इटली में छुट्टी पर हैं. राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की जब चेन्नई के निकट श्रीपेरंबुदुर में हत्या की गई थी तब 47 साल का होने में उन्हें तीन महीने बाकी बचे थे. मौत के पहले राजीव गांधी 5 साल के लिए देश के प्रधानमंत्री और 18 महीने तक विपक्ष के नेता भी रह चुके थे.

लेकिन अपने पिता के विपरीत राहुल गांधी ने सत्ता की सीढ़ियां धीरे-धीरे चढ़ी. हालांकि उनका ये रास्ता जाना-पहचाना था: राजवंश वाला. राजीव प्रधान मंत्री बने क्योंकि 34 साल की उम्र में छोटे भाई संजय गांधी की जून 1980 में और 1984 में माता इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई थी. मनमोहन सिंह के बजाय राजीव गांधी पहले एक्सिडेंटल प्राइममिनीस्टर थे.

जागीर

मई 1991 में गांधी परिवार के साथ हुए दुखद घटना के बाद से सोनिया गांधी ने परिवार के राजनीतिक जागीर की कमान संभाली. लेकिन अब समय आ गया है कि मशाल को अगले हाथों में दे दिया जाए. माना जा रहा है कि शायद अक्टूबर में राहुल गांधी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राज्याभिषेक कर दिया जाएगा. याद रखें उन्हें नियुक्त नहीं किया जाएगा बल्कि उनका राज्याभिषेक होगा. जिन लोगों ने शुरूआत में राहुल गांधी को भविष्य के नेता के रूप में बनने और उनके परिपक्व होने में समय लगने का भरोसा जताया था अब उन लोगों ने भी अपनी राय बदल ली है और पीछे हट गए हैं.

राहुल गांधी द्वारा पार्टी के नेता संदीप दीक्षित को निष्काषित करने से इंकार करना पार्टी में फैले आक्रोश में उनकी सहभागिता को दर्शाता है. कुछ दिनों पहले संदीप दीक्षित, सेना प्रमुख जनरल बिपीन रावत को ‘सड़क का ठग’ कहकर विवादों के घेरे में आ गए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद पार्टी में राहुल गांधी का नेता के रूप में विकास रुक गया है. 29 सितंबर, 2016 को पाकिस्तानी आतंकवादियों पर हुए सर्जिकल स्ट्राइक पर उनका बयान विशेष रूप से निराशाजनक था, जिसकी खुद पार्टी के अंदर भी दबे शब्दों में आलोचना हुई थी.

अपने सभी गलतियों के बावजूद पिता राजीव गांधी ने राष्ट्रीय हितों की हमेशा रक्षा की थी. लेकिन राहुल ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. 2004 में अमेठी की पारंपरिक सीट से अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत करने वाले राहुल गांधी शुरु से ही राजनीति के प्रति उदासीन रहे हैं. इन 13 सालों में उन्होंने संसदीय बहसों में न के बराबर हिस्सा लिया, संसद में इक्का-दुक्का ही सवाल पूछे हैं और महत्वपूर्ण बहसों से दूर ही रहे हैं.

राहुल बाबा को नई नौकरी खोज लेनी चाहिए

हालांकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद से राहुल गांधी ने थोड़ी सक्रियता बढ़ाई है. वो जानते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार संभावित है इसलिए वो 2024 के चुनावों पर फोकस कर रहे हैं. यहां तक की खुद कांग्रेस पार्टी में भी यही सोच है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा एनडीए को फिर से सत्ता में लाएगी. लेकिन 2024 तक लोगों का मोह भंग जरुर होगा.

2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 74 साल के हो जाएंगे. जबकि राहुल गांधी सिर्फ 54 साल के होंगे. 2024 तक राहुल गांधी संसद में 20 साल पूरे कर लेंगे, इसलिए ये समय उनका हो सकता है. अगर इस समय तक देश में वास्तविक आर्थिक और सामाजिक बदलाव नहीं हुए तो भाजपा के साथ जनता का मोहभंग होने की प्रबल संभावना है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी 70 साल के हो चुके होंगे. अरविंद केजरीवाल 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हार सकते हैं और राजनीतिक गुमनामी में खो चुके होंगे. ममता बनर्जी समेत अन्य क्षेत्रीय नेता सीमित राष्ट्रीय अपील के साथ हैं. इसलिए कांग्रेस की रणनीति राहुल को इस मैराथन के लिए तैयार करने की है.

हिंसा

मध्य प्रदेश के मंदसौर में हुई हिंसा का ‘सूत्रधार’ कांग्रेस के होने की असली वजह मोदी की गरीबों के मसीहा वाली छवि को नष्ट करना ही है. मोदी की इसी छवि ने भाजपा को लगातार चुनावों में जीत दिलाई थी. अब आखिर बीजेपी को नुकसान पहुंचाने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता था कि पार्टी के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वालों में से एक शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ ही किसानों को भड़का दिया जाए. जिसके कारण 2018 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी जीत मुश्किल होगी?

सोनिया गांधी के लगातार खराब स्वास्थ्य के कारण कांग्रेस का भविष्य राहुल और प्रियंका के ही हाथ में है जो पर्दे के पीछे से सोनिया गांधी की भूमिका को समर्थन देंगे. हालांकि पृष्ठभूमि में रॉबर्ट वाड्रा भी मौजूद होंगे. क्या 2024 में भारत की जनता इस तरह के कांग्रेस को वोट देगी? क्या सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा नेताओं जो उस वक्त तक 50 वर्ष के हो चुके होंगे हाशिए पर ही रखे जाएंगे?

तेजी से बदलते देश की विचारधारा और देश में हो रहे आधुनिकीकरण की बात क्या जनता ऐसे सामंती परिवार को स्थापित करने में दिलचस्पी दिखाएगी?

राजवंश

इसका सिर्फ एक ही और सपाट सा जवाब है- नहीं. अगर कांग्रेस को एक प्रभावी विपक्ष के रूप में भी देश की सेवा करनी है, जीत की बात तो दूर की है तो फिर उन्हें इस राजवंश को त्यागना होगा. पार्टी को फिर से संगठित करने के लिए नेताओं को पार्टी के अंदर ऊपर उठने का मौका देना चाहिए.

आखिरकार, भारत में दो ध्रुव होंगे. पहला- भाजपा. जो सेंटर-राईट विचारधारा का समर्थन करेगी और दूसरा- कांग्रेस, जिसके हाथ में सेंटर-लेफ्ट विचारधारा का कब्जा होगा. देश की आजादी के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को भंग करना चाहते थे क्योंकि उन्हें पता था कि राजवंश पार्टी को कमजोर कर देगी. लेकिन इसके ठीक उल्टा राजवंश ने भारत को गरीब बना दिया है और खुद के लिए फलते-फूलते रहा. अगर आज महात्मा गांधी जिंदा होते तो सोमवार को राहुल गांधी के 47वें जन्मदिन पहली सलाह वो उन्हें कोई दूसरा काम करने की देते. वैसा काम जो राहुल गांधी के मन का हो. जिसे करने में राहुल गांधी को मजा आता.

इस बीच भाजपा को भी अब अपने में सुधार लाना पड़ेगा. जनता के विश्वास को वो अनदेखा नहीं कर सकते. अब भाजपा को भी पार्टी के अंदर हर स्तर पर नई प्रतिभाओं की खोज करनी चाहिए. बेहतर शासन पर ध्यान देना चाहिए और लोकपाल की नियुक्ति करें. लंबे समय में भाजपा का अच्छा आर्थिक प्रशासन और संस्था निर्माण ही किसानों और गरीबों के वोट बैंकों की तुलना में प्रभावी ढंग से चुनावों में जीत दिलाएगा.

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