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पहाड़ के वीरान गावों को ‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ ने बनाया कैसे बनाया सतरंगी!

किसी जगह की पहचान वहां रहने वाले लोग, वहां की संस्कृति और उस इलाके के पर्यावरण से होती है। उत्तराखंड  के कई सीमावर्ती गांव रोजगार की तलाश में खाली हो रहे हैं, ऐसे खाली गांवों को रोजगार से जोड़ने और उस इलाके की सुंदरता को और ज्यादा निखारने का काम कर रहे हैं दीपक रमोला । ‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ (Project Fuel) के जरिये वो खाली हुए गांव में जाते हैं और वहां की टूटी दीवारों को ठीक कर उसमें सुंदर चित्रकारी करते हैं। इस चित्रकारी की खास बात ये होती है कि वो किसी कहानी या उस इलाके के रीति रिवाज से जुड़ी होती है। पेशे से कलाकार और पत्रकार दीपक रमोला  रहते तो हैं उत्तराखंड की राजधानी देहरादून  में, लेकिन वो ये काम कर रहे हैं टिहरी गढ़वाल  के सौड इलाके  में। उनके इस काम से ना सिर्फ इलाके के लोगों की आमदनी बड़ी है, बल्कि राज्य सरकार को भी उनका ये आइडिया इतना पसंद आया कि वो अब इस काम को दूसरे इलाकों में ले जाना चाहती है।

टिहरी गढ़वाल  के सौड गांव एक सीमावर्ती इलाका है। कभी यहां पर 3 सौ से ज्यादा परिवार रहते थे, लेकिन आमदनी का साधन ना होने के कारण लोग यहां से पलायन कर गए। आज हालात ये हैं कि यहां पर केवल 12 परिवार रह गए हैं। दीपक रमोला ने News Trust of India  को बताया कि

हमने यहां रहने वाले 12 परिवारों और पलायन कर चुके लोगों से संपर्क कर उनसे बात की। उनसे ये जानने की कोशिश की कि वो गांव में किस तरह रहते थे और क्या काम करते थे। जानकारियां इकट्ठा करने के लिए मैंने कई परिवार से खुद मुलाकात की।

इस तरह की रिसर्च में उनको 2 महीने का वक्त लगा। इसके बाद उन्होने एक महीने तक लोगों के इंटरव्यू लिए और फिर शुरू किया दीवारों में पेंटिंग करने का काम। इसमें लोगों की यादों के आधार पर ही उन्होने वहां की दीवारों को रंगना शुरू किया। इस दौरान उन्होने इस बात पर ध्यान दिया कि लोग जब यहां रहते थे तो कौन सा रेडियो इस्तेमाल करते थे, परिवारों की लोककथाएं, गांव के पहला मुखिया, 5 पत्थर खेलते हुए बच्चे, देवी की आराधना करते हुए लोग, हुक्का पीते लोग, इलाके की जीवन शैली, उनका खान पान, उनके मवेशी, जंगली जानवरों के चित्र दीवारों पर पेंटिंग के जरिए दिखाने की कोशिश की। इस तरह उन्होने सौड गांव के करीब 70 घरों की दीवारों में पेंटिंग की है।

दीपक रमोला का मानना है कि

आज की युवा पीढ़ी अपनी कला और संस्कृति के बारे में पढ़ना नहीं चाहती बल्कि उसे देखकर समझना चाहती है। इसके लिए हमें चित्रकारी (Painting) सबसे अच्छा माध्यम लगा। जिससे हम गांव की कला और संस्कृति को पेंटिंग की मदद से लोगों को बता सकते थे।

दीपक रमोला ने जब इस काम की शुरूआत की तो उनके सामने सबसे बड़ी दिक्कत मकानों की दीवारें थी जो पत्थर और मिट्टी की बनी होने के कारण एक समान नहीं थीं। इस कारण उन पर पेंटिंग का ब्रश चलाना आसान काम नहीं था। बावजूद उनकी टीम में देश की मशहूर वॉल आर्टिस्ट पूर्णिमा सुकुमार थीं। जो इस प्रोजेक्ट को देख रही थीं उन्होने इस काम को आसान बना दिया। इसके अलावा इलाके के लोगों को ये समझाना थोड़ा मुश्किल था कि गांव की पुरानी यादों को इस तरह भी संरक्षित किया जा सकता है।

‘प्रोजेक्ट फ्यूल’ (Project Fuel) के तहत सौड गांव  की दीवारों में पेटिंग करने के दौरान ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की गई। जिससे पर्यटकों को वहां रहने वाले लोगों के बारे में सही जानकारी मिल सके कि इलाके के लोग किस तरह के घरों में रहते हैं। इन दीवारों को रंगने के लिए उनके पास दुनिया भर से वालंटियर आये। दीवारों में पेटिंग करने का काम करीब 110 लोगों ने मिलकर किया। इनमें देश के ही नहीं विदेश से आए लोग भी शामिल थे। दीपक रमोला और उनकी टीम के 20 से 30 लोग हर हफ्ते गांव में जाकर दीवारों में पेंटिंग बनाने का काम करते थे। इस काम के लिए उन्हें ‘राउंड ग्लास’ फैलोशिप के तहत ग्रांट मिली। इस वजह से उनको फंडिंग की ज्यादा दिक्कत नहीं आई। दीपक रमोला  की इन कोशिश से भूतों के गांव (Ghost Village) के नाम से मशहूर सौड गांव  में अब पर्यटक आ रहे हैं और यहां के लोगों से मिल रहे हैं। इससे यहां रहने वाले लोगों की आमदनी तो बढ़ी ही है साथ ही गांव को भी एक नई पहचान मिली है। साथ ही सरकार भी उनके इस काम से प्रभावित होकर इस तरह के प्रोजेक्ट दूसरे खाली हुए गांवों में भी लागू करना चाहती है।

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