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गरीब चोर क्यों होते हैं ?

(शशांक पाठक, राज्यसभा टीवी )

यह सवाल बार-बार दिमाग में कौंध रहा है कि आखिर गरीब चोर क्यों होता है? वो आपके आस-पास हो तो ऐसा क्यों लगता है कि अब नहीं तो तब… कुछ-ना-कुछ चुराएगा जरूर, आपको लूट लेगा। गरीबों के पास जाओ तो संभल के जाओ, उनका कोई भरोसा नहीं क्या कर दें। आखिर सारे गरीब चोर क्यों होते और कोई काम क्यों नहीं करते, मेहनत क्यों नहीं करते? मध्यमवर्गीय और अमीरों के लिए ये वर्ग सबसे बड़ा दुश्मन क्यों बन जाता है?

गरीब… सब के सब चोर हैं!

कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक झुग्गी इलाके में जाना हुआ। वहाँ को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करनी थी। उनके साथ हो रही प्रशासनिक ज्यादती आपको भी सोचने को मजबूर कर देगी, हालांकि वो एक अलग मुद्दा है। हुआ यूं कि वहाँ जाने के लिए जैसे ही ऑफिस की गाड़ी में बैठा तो ड्राइवर ने पूछा कि कहाँ जाना है…? मैंने बताया कि फलानी जगह… कितना समय लगेगा… देर शाम हो जाएगी। इसके बाद भी ड्राइवर बात करता रहा और सलाह देता रहा कि वहाँ कैसे जाना है, क्या करना है। “शशांक भाई वो बहुत खराब जगह है, संभल कर जाना और पर्स-वर्स ठीक से रख लेना… बैग का भी ख्याल रखना… जा ही क्यों रहे हो वहाँ… सब चोर हैं… कब्जा करके बैठे हैं… इन्हें तो वहाँ से उठा देना चाहिए… ऐसे लोगों पर बिल्कुल तरस नहीं खाना चाहिए… पूरी शहर को गंदा करके रखा है” वह और भी बातें बताता रहा जैसे कि वे लोग क्या करते हैं… उसका दावा था कि वहाँ देह व्यापार भी होता है और वो भी बड़े स्तर पर। मैंने अपने तरीके से उसे समझाने की कोशिश तो की पर उसके दिमाग में जो तस्वीर थी, उसे बदलना आसान नहीं लग रहा था। मैं अपनी रिपोर्टिंग के बारे में भी सोच रहा था, तो उससे गाड़ी में ज्यादा बहस नहीं करना ही मुनासिब समझा। तभी से सोच रहा हूँ कि गरीब वर्ग अमीरों की आंखों में चोर हो, ये नई बात नहीं है, पर मध्यवर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए भी गरीब अब चोर हो चुका है। क्या ये पूंजीवाद का ही परिणाम है या हमारी दिमागी लकवाग्रस्तता जो उन्हें चोर मान चुका है? हालांकि मैं उस बस्ती में दो दिन गया लेकिन मेरे साथ कोई ऐसी बात या घटना नहीं हुई जो चोर होने के तर्क को पुख्ता कर सके। वहाँ दूसरे तरह की परेशानी का सामना किया मैंने जिसे अपनी रिपोर्ट में साझा करूंगा।

एक और सहकर्मी भी बार-बार वही हिदायत देते दिखे कि ऐसा करना वैसा करना, बहुत गंदा इलाक है… ये है वो है… तमाम बातें। ख़ैर… वहाँ से वापस आ गए तो ऑफिस में कई लोगों ने पूछा कि क्या स्टोरी है। सबको बताता रहा कि ये समस्याएं हैं उनके साथ, ऐसा-ऐसा हो रहा। सब ठीक था, मैं अपने दूसरे काम में लग गया और ये सब बातें भूल गया। लेकिन दो-चार दिन बात एक और शख्स से बात हुई, फिर वही सब सुनने को मिला। इनके सामने मैंने कई तर्क रखे लेकिन सब बेकार गए। वे बोले कि तुम नहीं जानते मैं (वे) उस इलाके को सालों से जानता हूँ, कैसे लोग हैं, खूब देखा है मैनें। मुझे लगा कि हो सकता है कि इन सब की बातें ठीक हों क्योंकि सब एक ही बात कह रहे हैं और इन सबका एक ही निचोड़ है कि गरीब चोर होते हैं। असल में ये बात तो हमें बचपन से ही बताई जाती रही कि गरीबों के आसपास संभल कर रहना है, क्योंकि वे चोर होते हैं। तर्क ये है कि वे गरीब है और कुछ करते नहीं और ना ही करना चाहते हैं, जिंदा भी रहना है, इसलिए चोरी करते हैं, और चोरी तो सबसे आसान काम है ही। जो बात हमें बचपन से सिखाई जा रही है वो ग़लत तो नहीं हो सकती? ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच रही हैं, यानि ये पीढ़ियों का अनुभव है। गरीब चोर होते हैं, और चोर गरीब। मैं बार-बार इस बात को सोचता रहा कि बचपन से तो मैं भी गरीबों को चोर मानता था। भले वो मेहनत करके अपना पेट भरता हो, उससे हमें क्या? है तो वो गरीब जो इस प्रमाणित करने के लिए काफी है कि वो चोर है। दरअसल ये एक वैचारिक वर्ग संघर्ष है, हालांकि गरीब तबका मध्यवर्ग और उच्च वर्ग के लिए क्या सोचता है, ये नहीं पता।

हम और आप क्या करते हैं… रिक्शे से घर आते हैं और अगर घर के अंदर से पैसे लाने पड़ जाएं तो उससे ये साफ बोल कर जाते हैं कि, भैया आप बाहर ही रहना पैसे अभी ला रहे हैं। क्यों? क्योंकि हमें डर रहता है कि वो रिक्शे वाला है… गरीब है… अंदर आ गया तो कुछ भी कर सकता है… चोरी तो हर हाल में वो कर ही लेगा, उसके लिए छोटी सी बात है।

घर में खाना बनाने या कोई और काम करने के लिए जब कोई आता है तो हम सतर्क हो जाते हैं। आसपास मंडराते रहते हैं ताकि उस पर दवाब बनाए रखें जिससे वह चोरी ना कर सके। लेकिन अगर फिर भी हमारी कोई चीज गुम हो जाए तो सबसे पहले उसी शख्स का ध्यान आता है, क्योंकि वो गरीब है और चोर तो है ही।

तमाम टीवी विज्ञापनों और फिल्मों में भी दिखाया जाता रहा कि गरीब तबका खतरनाक है, चोर है। हाल ही में एक सीसीटीवी कैमरा बनाने वाली कंपनी सीपी प्लस का विज्ञापन आता था… जिसमें आपके घर काम करने वालों को चोर दिखा कर अपने घर में उनका सीसीटीवी कैमरा लगाने की सलाह दी जाती थी, ताकि चोरी को बचाया जा सके। तर्क था कि ऊपर वाला सब देख रहा है, ऊपर वाला यानि उनका कैमरा।

हमारा समाज अपने से निचले तबके को हमेशा चोर ही समझता है और उन्हें संदेह से देखता है। अमीर वर्ग के लिए मध्यम और निम्न वर्ग संदेहात्मक है, मध्यम के लिए निम्न-मध्यम और निम्न यानि गरीब वर्ग संदेह में है, अब निम्न वर्ग के नीचे कुछ है नहीं तो वे चोरी ही करेंगे।

बात अगर संदेह की करें तो इस पूंजीवाद के दौर में हमें सब पर संदेह है। ऑफिस में एक बॉस को हमेशा संदेह रहता है कि उसके जूनियर काम ठीक से नहीं करते। सालों से लाख मेहनत करने के बावजूद भी जूनियर्स, सीनियर्स के मन से ये संदेह खत्म नहीं कर सके और मजे की बात है कि वहीं जूनियर जब सीनियर बनता है तो अपने जूनियर पर यही संदेह करता है।

एक कारखाने में दिन रात मेहनत करने वाल मजदूरों के लिए कारखाना मालिक कभी ये नहीं कहता कि ये मजदूर दिल से काम करते हैं, उसे हमेशा संदेह रहता है कि वे अपना पूरा ध्यान और समय काम पर नहीं देते। ऐसे तमाम उदाहरण हैं।

ये गरीब एक दिन दुनिया को लूट लेंगे

एक गरीब बच्चे को रेस्टोरेंट में घुसने नहीं देते, क्यों वह गरीब है और रेस्टोरेंट गरीबों के लिए नहीं। हम नहीं चाहते कि गरीब बस्ती हमारे इलाके के आसपास हो, क्योंकि इससे माहौल बिगड़ जाएगा। गरीबों के लिए सरकार योजनाएं लाती हैं तो हम कहते हैं कि अरे वे नहीं सुधरेंगे योजनाओं का लाभ भी लेंगे और गरीब भी बने रहेंगे ताकि चोरी कर सकें। हम अपने बच्चों को गरीब बच्चों के साथ पढ़ने के लिए नहीं भेज सकते, खेलने के लिए नहीं भेज सकते, क्योंकि गरीब बच्चे तो बरबाद होते हैं, हमारी-आपकी पीढ़ियां भी बरबाद हो जाएंगी।

कई दिनों तक दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद भी हाथ कुछ नहीं लगा। कई सवाल और खड़े हो गए हैं कि सबसे पहली बार कब किस गरीब को चोर माना गया होगा? ये प्रथा कि गरीब चोर होता है, कब से शुरु हुई होगी… और सबसे बड़े सवाल कि आखिर ये गरीब चोर क्यों होते हैं। फिलहाल यही समझता हूँ कि गरीब, क्योंकि गरीब होता है इसलिए चोर होता है, एक चोर को चोर सिद्ध करने के लिए उसका गरीब होना काफी है।

“ये गरीब एक दिन दुनिया को लूट लेंगे, ये डर कब तक बना रहेगा, उन्हें सच में इस दुनिया को लूट लेना चाहिए…” इसका तो पता नहीं लेकिन शायद इतना तय है कि वे गरीब हैं आर्थिक तौर पर… और ऐसा सोचने वाले हम कंगाल हैं दिमागी तौर पर…।

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