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‘इंदु सरकार’ पर सियासी तकरार

(जय प्रकाश जय )

फिल्में बनती तो राजनीति पर हैं लेकिन उसमें चाशनी तालियां पिटवाने के लिए मिलाई जाती है, न कि देश के राजनीतिक यथार्थ के पीछे खड़े जनद्रोहियों के चेहरे से नकाब खींचने के लिए। शायद इसीलिए राजनीतिक फिल्मों में जो हीरो हिट हो जाते हैं, राजनीति में शामिल होते ही उनकी छवि पिट जाती है। ‘राजनीति’ बनाने वाले प्रकाश झा खुद भी राजनीति में हाथ आजमा कर पीछे लौट चुके हैं।

राजनीति सब्जेक्ट पर जब भी कोई फिल्म आती है परदे पर आने से पहले ही वह चर्चित हो जाती है। गांधी परिवार को केंद्र में रखकर कई फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। अब आ रही है ‘इंदु सरकार’।

भारत बनाम पाकिस्तान की पटकथा वाली फिल्मों की वही कहानी है, जो क्रिकेट के मैदान से उपजी हवाहवाई ललकार और पटाखेबाजियों की। इन दिनों आपात काल को केंद्र में रखकर बनी मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म ‘इंदु सरकार’ सुर्खियों में है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण इस फिल्म को लेकर भंडारकर की पहली प्रेस कांफ्रेंस पुणे में रद्द करनी पड़ी और फिर नागपुर में।

हिंदी सिनेमा में धर्म-जाति और राजनीति का पाखंड बार-बार छोटे-बड़े पर्दे पर बेपर्दा होता रहता है। राजनीति सब्जेक्ट पर जब भी कोई फिल्म आती है परदे पर आने से पहले ही वह चर्चित हो जाती है। गांधी परिवार को केंद्र में रखकर कई फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। अब ‘इंदु सरकार‘ आ टपकी है। फिल्में बनती तो राजनीति पर हैं लेकिन उसमें चाशनी तालियां पिटवाने के लिए मिलाई जाती है, न कि देश के राजनीतिक यथार्थ के पीछे खड़े जनद्रोहियों के चेहरे से नकाब खींचने के लिए। शायद इसीलिए राजनीतिक फिल्मों में जो हीरो हिट हो जाते हैं, राजनीति में शामिल होते ही उनकी छवि पिट जाती है। ‘राजनीति’ बनाने वाले प्रकाश झा खुद भी राजनीति में हाथ आजमा कर पीछे लौट चुके हैं।

फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा कहते हैं – “विशुद्ध और सच्ची राजनीतिक फिल्म बनाना हमारे देश में असंभव है क्योंकि उसके लिए अभिव्यक्ति की आजादी की जरूरत पड़ेगी जो हिंदुस्तान में नहीं मिलती है।” किसी जमाने में देश की परतंत्रता और स्वतंत्रता हिंदी फिल्मों की पटकथाओं के केंद्र में हुआ करती थी। धर्म पर बनी फिल्मों में भिरुता का पाठ पढ़ाया जाता था, जो सिलसिला आज भी जारी है। कमर्शियल हिंदी सिनेमा भारतीय जनमानस पर अपने आप ऐसा घटाटोप तैयार कर चुका है, जिसका भारतीय राजनीति की हकीकत से कोई लेना-देना नहीं हैं। भारत बनाम पाकिस्तान की पटकथा वाली फिल्मों की वही कहानी है, जो क्रिकेट के मैदान से उपजी हवाहवाई ललकार और पटाखेबाजियों की। इन दिनों आपात काल को केंद्र में रखकर बनी मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म ‘इंदु सरकार’ सुर्खियों में है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण इस फिल्म को लेकर भंडारकर की पहली प्रेस कांफ्रेंस पुणे में रद्द करनी पड़ी और फिर नागपुर में।

नागपुर के होटल पोर्टो में प्रेस कॉन्फ्रेंस होने वाली थी मगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर दिया। इसके बाद भंडाकर ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को ट्वीट किया कि ‘प्रिय राहुल गांधी पुणे के बाद आज मुझे नागपुर की प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी रद्द करना पड़ा है। क्या आप इसे गुंडागर्दी नहीं कहेंगे? क्या मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है?

‘इंदु सरकार’ के ट्रेलर से शोर उठा है कि फिल्म में इंदिरा गांधी, उनके बेटे संजय गांधी को प्रकारांतर से प्रस्तुत किया गया है। कांग्रेस इस पर विरोध प्रकट कर रही है। कहा जा रहा है कि फिल्म के बहाने यह कांग्रेस की छवि खराब करने की कोशिश है। भंडारकर पर आरोप लग रहा है कि वह भाजपा को सामाजिक समर्थन दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। मगर भंडारकर कहते हैं कि उन्हें सेंसर बोर्ड ने आसानी से सर्टीफिकेट नहीं दिया है। उन्हें आरएसस, कम्यूनिस्ट, किशोर कुमार, अकाली, जेपी नारायण जैसे शब्द हटाने को कहा गया है।

हिंदी सिनेमा की राजनीतिक पटकथाओं में माफिया राजनीति, सत्ता के अंदरूनी फेर-बदल तक जाकर बाद समाप्त हो जाती है। उसकी तह में जो होता है, उस पर राजनीतिक उद्दंडता, सत्ता और सेंसर के डर से फिल्म निर्माता आज तक कैमरा फोकस नहीं कर सके हैं। वह सच को ऐसे झूठ में घोल कर परोसते हैं, ताकि भारतीय दर्शकों की आंखें उधर जाएं ही नहीं, न उनकी सोच अपने आसपास की, अपने देश की राजनीति के सच से वाकिफ हो सके। इस तरह जान पड़ता है कि हमारी ऐसी हर हिंदी फिल्म स्वयं में एक खूबसूरत अर्द्धसत्य होती है।

अब तक राजनीति को केंद्र में रखकर बनी फिल्मों में ‘आंधी’, ‘राजनीति’, ‘शहीद’, ‘क्रांति’, ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘शूल’, ‘इंकलाब’, ‘मैं आजाद हूं’, ‘तूफान’, ‘लीडर’ और ‘पैगाम’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘लालकिला’, ‘शाहजहां’ ‘पुकार’, ‘रोटी’ ‘मुगले आजम’ ‘त्रिकाल’ ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ ‘गांधी’ ‘बोस’ ‘आम्बेडकर’ ‘सरदार’, ‘समर’, ‘दामुल’, ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘अपहरण’, ‘रंग दे बसंती’, ‘लगे रहो’, ‘दिल्ली-6’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘गांधी माई फादर’, ‘किस्सा कुर्सी का’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘गणशत्रु’, ‘कलकत्ता-71’, ‘तमस’, ‘सुराज’, ‘चाणक्य’, ‘रणक्षेत्र’, ‘रोजा‘, ‘द्रोहकाल’, ‘न्यू देहली टाइम्स’, ‘बाम्बे’, ‘सूखा’, ‘मुखामुखम’, ‘काला पानी’, ‘दिल से’ ‘मुखामुखम’, ‘सूखा’, ‘गर्म हवा’, ‘अर्थ’, ‘अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘धर्म’, ‘हल्ला बोल’, ‘सरकार राज’, ‘पार्टी’, ‘सत्ता’, ‘कलयुग’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ आदि उल्लेखनीय रही हैं।

इन फिल्मों से जुड़ा एक और सच भारतीय दर्शकों के लिए चिंता का विषय माना जाता है कि ‘राजनीति की तरह ही फिल्म जगत में भी कुछ परिवारों का कब्ज़ा है। दादाजी फिल्म बनाते थे। उसके बाद उनके बेटे बनाने लगे। फिर यह सिलसिला उनके परपोतों तक पहुंच चुका है।’ इस सिलसिले में, सियासत के इस सच में भारतीय दर्शक के प्रति कितनी ईमानदारी बरती जा रही है, एक गंभीर प्रश्न आज भी जस का तस बना हुआ है। राजनीति, प्रशासन और भ्रष्टाचार के घालमेल की पटकथा वाली फार्मूला फिल्मों से तो देश और समाज को यथार्थ के निकट पहुंचना संभव नहीं रहा। गैरव्यावसायिक फिल्मों में झांकें तो वहां भी कई अर्द्धसत्य उन्हें मसालेदार भर साबित कर जाते हैं।

अब जबकि ‘इंदु सरकार‘ पर बवाल मचने लगा है, फिल्म प्रदर्शन से पहले ही सुर्खियां बटोरने लगी है। भंडारकर मीडिया को बताते हैं कि “हम अपने होटल के कमरे में बंधक जैसे बनकर रह गए हैं। हमें कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा है। होटल प्रबंधन ने हमसे कमरे से कदम बाहर नहीं निकालने को कहा है क्योंकि कार्यकर्ता यहां दोपहर एक बजे से ही जमा हैं। हमारी पूरी टीम एक कमरे में बंद है।” वह परेशान होकर कहते हैं- “मैं किसी को ‘इंदु सरकार’ नहीं दिखाऊंगा। वह एक जिम्मेदार नागरिक हैं और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और पद्मश्री हैं। वह फिल्में प्रचार पाने के लिए नहीं बनाते हैं।

इंदु सरकार‘ में मुख्य भूमिका निभाने वाली कीर्ति कुल्हार कहती हैं कि केवल ट्रेलर देखकर प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है। उन्हें पहली बार फिल्म उद्योग में इस तरह के विवाद का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि कीर्ति इससे पहले ‘पिंक‘ फिल्म से मशहूर हो चुकी हैं।

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