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चाय से लेकर विज्ञापन की दुनिया के बेताज बादशाह

अगर आपने 90 दशक को जिया है, तो यकीनन आप इन पंक्तियों से वाकिफ होंगे। फेविकोल के उस प्रचार को भला कौन भूल सकता है, जो उन दिनों टी वी पर छाया हुआ था! इस प्रचार के पीछे एक रोचक कहानी है और उस से भी अधिक रोचक है उस व्यक्ति की कहानी जिसने इस लोकप्रिय प्रचार को बनाया।

पियूष पाण्डेय का नाम भारतीय विज्ञापन जगत में मशहूर है और इनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि रचनात्मकता असीमित होती है।

पियूष देश के कई प्रतिष्ठित अभियानों के पीछे रहे हैं, पर इनके करियर की शुरुआत विज्ञापन की चमक-धमक की दुनिया से बहुत दूर हुई थी। पेशे से क्रिकेटर रहे पियूष ने गुडरिक ग्रुप में टी-टेस्टर के रूप में की थी।

हांलाकि विज्ञापन से इनका लगाव शुरू से था। सन 1979 में, २४ वर्ष की आयु में इन्होंने मुंबई स्थित ओगिलवी एवं मैथेर में पद ग्रहण करने के लिए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इनका साक्षात्कार वहां के रंगन कपूर ने लिया और इन्हें अकाउंट एग्जीक्यूटिव के रूप में नौकरी करने का प्रस्ताव दिया ।

इस तरह के कदम कईयों को अपनी राह से भटका देते हैं पर पियूष ने इस मौके को आगे बढ़ने की सीढ़ी बना लिया । वेर्व इंडिया  को दिए अपने एक साक्षात्कार में पियूष ने बताया कि किस प्रकार वे लोगो से छुपा कर विज्ञापनों के कॉपी या टैग लाइन (प्रचार वाक्य) लिखा करते थे

 “मेरा पहला काम सनलाइट डिटर्जेंट पाउडर के लिए था। मुझे याद है कि इसमें सुप्रिया पाठक थीं, जो कहती थी सनलाइट की दाम बस इतनी, और चमक… चमक धूप सी ।”

पियूष को एक रचनात्मक लेख तक पहुँचने में छः साल लग गए, पर पियूष ने हार नहीं मानी ।

पियूष ने कई महत्वपूर्ण विज्ञापनों को लिखा है। पर इनमे से सबसे अधिक प्रचिलित फेविकोल रहा, जिसने इन्हें एब्बी और ए एंड एम् मैगज़ीन अवार्ड दिलवाया।

उन दिनों, ओगिलवी के लिए फेविकोल इतना महत्वपूर्ण उत्पाद नहीं था और पियूष भी एक कम बजट वाले उत्पाद फेवीटाइट रैपिड के लिए कॉपीराइटर का काम कर रहे थे। स्क्रॉल के एक आर्टिकल के अनुसार, अन्विल अलीखान, जो उस वक़्त ओगिलवी के साथ काम कर रहे थे, याद करते हैं कि किस प्रकार पियूष एक 10 सेकंड के रस्साकशी के  विचार  के साथ आये जिसमे दम लगा के हईशा का नारा था।

वह अभियान तो आगे बढ़ा नहीं पर फविकोल ने अपने पुराने विज्ञापन को हटा कर नये रस्साकशी के विचार को अपना लिया।

‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के साथ ही लूना मोपेड, डेरी मिल्क, और एशियन पेंट्स के विज्ञापनों की सफलता के पीछे पियूष का ही हाथ हैं। उन्होंने कई बार माना है कि उनकी सबसे अधिक प्रचिलित पंक्तियाँ किसी बातचीत या किसी संस्कृति से ली गयी है।

1994 में, 40 वर्ष की उम्र में कई सफल अभियानों के बाद, पियूष को ओ एंड ऍम का नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर नियुक्त किया गया।

पियूष को न सिर्फ मशहूर विज्ञापनों के लिए, बल्कि इस जगत में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए भी जाना जाता है। राजस्थान की गलियों में बड़े हुए पियूष हिंदी भाषा, साहित्य और संगीत से जुड़े रहे।मशहूर पाशर्व गायिका इला अरुण इनकी बहन है और विज्ञापन की दुनिया में ही मशहूर प्रसून पाण्डेय इनके भाई हैं ।

वेर्वे इंडिया को पियूष बताते हैं, “हमारे घर पर हिंदी ही बोली जाती थी; हिंदी में ही हम चीज़े समझते थे। इसलिए हिंदी में मैं सबसे अधिक सहज हूँ ठीक उसी तरह जैसे बंगालियों के लिए बंगाली है या इसी तरह किसिस की भी मातृभाषा उनके लिए है। फर्क सिर्फ़ ये है कि कुछ लोग अपनी इच्छा से अपनी भाषा को पीछे छोड़ देते है और यह उनकी सबसे बड़ी गलती होती है।”

इनका करियर उस समय आरम्भ हुआ जब टेलीविज़न की बढती लोकप्रियता के कारण विज्ञापनों में बदलाव लाये जा रहे थे और हिंदी उस वक्त विज्ञापन संचार के माध्यम के रूप में प्रचलित हो रही थी। पियूष ने इस बदलाव में भागीदारी नहीं ली बल्कि इस बदलाव को एक नया रूप दिया।

अपने अलग तरह के विज्ञापनों के कारण, पियूष ने अनगिनत पुरस्कार जीते हैं और असीमित प्रशंसा बटोरी है।

कैडबरी के इनके मुहीम को क्रिएटिव ऐब्बीज़ द्वारा ‘कैंपेन ऑफ़ द सेंचुरी’ के टाइटल से नवाज़ा गया जबकि एड क्लब मुंबई ने ‘कैंपेन ऑफ द सेंचुरी’ पुरस्कार, फेविक्विक को दिया। 2002 के कान्स में दो बार स्वर्ण जितने के बाद इन्हें 2004 में कान्स एडवरटाइजिंग अवार्ड के जूरी का प्रेसिडेंट बनाया गया । 52 वर्ष के इतिहास में, इस स्थान पर पहुँचने वाले ये पहले भारतीय है।

2006 में ओगिलवी एंड मैथेर वर्ल्डवाइड बोर्ड में इन्हें शामिल किया गया और 2010 में इन्हें एडवरटाइजिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया। 2012 में न्यू यॉर्क के शेली लज़ारस द्वारा क्लीओ लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड पाने वाले ये पहले ऐशियाई बने ।

लगातार 9 वर्षों तक इन्हें द इकनोमिक टाइम्स द्वारा भारतीय विज्ञापन जगत का सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति घोषित किया है। 2016 में, इन्हे अपने योगदान और उपलब्धियों के लिए पद्मश्री से नवाज़ा गया।

मज़ाक में ऐसा कहा जाता है कि लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार देने का सांकेतिक मतलब होता है कि अब उस व्यक्ति को काम में विराम लगा कर सेवानिवृत हो जाना चाहिए, पर रचनात्मकता से ओत प्रोत पियूष के दिमाग को कोई पुरस्कार रोक नहीं पाया। इसके बाद पियूष ने कई फिल्मों में अदाकारी की और पाण्डेयमोनियम : पियूष पाण्डेय ओन एडवरटाइजिंग नामक पुस्तक की रचना की ।

बीते सालों में, पियूष के काम ने कई अवरोध तोड़े और कई कलात्मक सीमाएं लांघी।

अमिताभ बच्चन ने पियूष के साथ काम करने के बारे में कहा है, “ मेरा अपना अनुभव इस जीवंत व्यक्ति के साथ काम करने का बहुत शिक्षाप्रद रहा है।”

यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है कि पियूष ने अपना करियर, विज्ञापन की दुनिया में शुरू नहीं किया और न ही ये किसी अतिरिक्त योग्यता के साथ यहाँ आये। इन्होने अपने हुनर को तराशा और अपने आगे आने वाले हर मौके का फायदा उठाया और इस क्षेत्र का चेहरा सदा के लिए बदल दिया ।

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