आंबेडकर के नाम पर ‘वोट बैंक’ साधने में जुटीं पार्टियां

लोकसभा उपचुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत तेजी से जातिवादी मोड़ लेती दिख रही है. अचानक दलितों को लेकर सभी पार्टियों में प्रेम सामने आ रहा है. लोकसभा चुनाव नजदीक हैं, लिहाजा आंबेडकर जयंती को लेकर सभी पार्टियों ने खास रणनीति बनाई है. बीजेपी जहां पहली बार बूथ स्तर पर तमाम कार्यक्रम आयोजित करेगी, वहीं सपा और बसपा के नेता भी पहली बार एक साथ कार्यक्रम में शिरकत नजर आएंगे. कांग्रेस की अपनी रणनीति है. लक्ष्य सभी का एक है दलित मतदाता को लुभाना.

दरअसल उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित वोटर अहम किरदार अदा करता है. प्रदेश में दलितों की करीब 21 फीसदी आबादी मानी जाती है. सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से 14 सीटें दलित समाज के लिए आरक्षित हैं. इन सभी पर बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी. वहीं 403 विधानसभा सीटों में से 86 सीटें आरक्षित हैं. इनमें से 76 सीटें पिछली बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने नाम की थीं. 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने इन्हीं 86 सीटों मे से 55 पर कब्जा जमाया था और सत्ता तक पहुंच गई थी.

डैमेज कंट्रोल के मोड में बीजेपी

बीजेपी ने आंबेडकर जयंती को लेकर​ विशेष तैयारी की है. एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के विरोध में हुए दलित संगठनों के भारत बंद के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) डैमेज कंट्रोल के मोड में है. बीजेपी ने तय किया है कि 14 अप्रैल को डॉ भीमराव आंबेडकर की जयंती के मौके पर उत्तर प्रदेश के हर जिले में जश्न मनाकर बाबा साहेब को याद किया जाएगा.

बीजेपी आंबेडकर जयंती हर बूथ पर मनाएगी. इसमें प्रदेश के सभी डेढ़ लाख बूथ शामिल हैं. इसी क्रम में ब्रज के सभी 24000 बूथों पर कार्यक्रम तय कर लिए गए हैं. इन कार्यक्रमों में मंत्री, सांसद, विधायक से लेकर पार्टी के नेता तक हिस्सा लेंगे. यह पहली दफा है जब इतना बड़ा कार्यक्रम होने जा रहा है.

सपा और बसपा कार्यकर्ताओं को साथ लाने की कोशिश 

वहीं आंबेडकर जयंती पर हर साल सिर्फ रस्म अदायगी करने वाली सपा भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती. ​जयंती पर सपा नेता भी बाबा साहेब के प्रति प्रेम और सम्मान खुलकर जाहिर करते नजर आएंगे. उपचुनावों में मिली जीत के बाद 2019 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन के रूप में आगे बढ़ रही सपा और बसपा ने 14 अप्रैल को अबंडेकर जयंती को सूबे के जिले, ब्लॉक और गांव स्तर पर मनाने की योजना बनाई है. इस कवायद के पीछे कोशिश है कि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत सामंजस्य स्थापित हो सके.

सपा के प्रवक्ता सुनील साजन कहते हैं कि पार्टी ने जिले से लेकर गांव स्तर पर 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का फैसला किया है. सपा-बसपा गठबंधन के बाद ये पहला कार्यक्रम है. जब दोनों पार्टी के कार्यकर्ता गांव से लेकर जिले तक एक साथ खड़े नजर आएंगे. सपा की कोशिश है कि अंबेडकर जयंती पर ज्यादा बड़ा कार्यक्रम करने से ज्यादा बूथ स्तर पर इसे किया जाए. दोनों पार्टी के नेता और कार्यकर्ता एक साथ आएं और अंबेडकर जी के विचारों और सिद्धांतों को समझें. तैयारी है कि प्रदेश के हर जिले में गांवों तक डॉ.अंबेडकर पर बनी शॉर्ट फिल्म दिखाई जाए. उनके जीवन पर किताब बांटी जाएंगीं. इसके अलावा जिलों में संगोष्ठी का आयोजन भी किया जाएगा.

मायावती हर साल की तरह देंगी श्रद्धांजलि, जिलों में बड़े कार्यक्रम

वहीं बीएसपी सुप्रीमो मायावती हर साल लखनऊ में अंबेडकर पार्क में जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देती हैं और अपने कैडर को संबोधित करती हैं. इस बार बाबा साहेब के जन्मदिन में बसपा अपने इन कार्यक्रमों के अलावा जिलों में अलग से बड़े कार्यक्रम करेगी, जिसमें पार्टी के बड़े नेता अलग-अलग जिलों में शामिल होंगे.

जनजागरण अभियान चलाएगी कांग्रेस

वहीं दलित वोटों की वापसी के लिए बेचैन कांग्रेस की उम्मीदें बहुजन समाज पार्टी व भारतीय जनता पार्टी के बीच जारी खींचतान से जगी हैं. दलित मतदाता को जोड़ने की खातिर पार्टी अपने दलित सुरक्षा व संविधान बचाओ सम्मेलनों के बाद अब ब्लॉक स्तर तक संपर्क व संवाद बढ़ाने के लिए जनजागरण अभियान चलाएगी. इसमें शीर्ष नेताओं की भागीदारी रहेगी और अन्य राज्यों के प्रमुख दलित नेता भी रहेंगे. भारत बंद को समर्थन देने के बाद कांग्रेस ने दलितों की गिरफ्तारी व उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कराने का खुलकर विरोध शुरू किया है.

कांग्रेस के प्रवक्ता द्विजेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि दलित उत्पीड़न के खिलाफ राहुल गांधी हमेशा मुखर रहे हैं. गुजरात में दलित उत्पीड़न हो या रोहित वेमुला कांड, सहारनपुर जिले का शब्बीरपुर प्रकरण हो या बीजेपी शासित राज्यों में दलितों पर बढ़े अत्याचार के खिलाफ केवल कांग्रेस ही लड़ती रही है. केंद्र में बीजेपी का विकल्प कांग्रेस ही है, ये दलित समाज समझ गया है. जानकारी के अनुसार कांग्रेस अपने दलित एजेंडे को धार देने के लिए स्थानीय नेताओं के साथ अन्य राज्यों के चर्चित दलित नेताओं को नए अभियान में जोड़ेगी.

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