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उत्तराखंड के विकास मॉडल को तत्काल बदलना जरुरी

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया)

उत्तराखंड की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकास की नीतियां बनाई जाने की जरूरत है। उत्तराखंड में कोई भी विकास की योजना लोगों, वहां के पेड़, भू-भौतिकी और इकोलॉजी को ध्यान में रखकर ही बननी चाहिए। पर जो वर्तमान विकास का मॉडल अपनाया गया है, वह विनाशकारी साबित हो रहा है। पहाड़ों में विनाशकारी त्रासदियों का बढ़ना दुखदायी तो है ही, साथ ही उत्तराखंड के नीति-निर्माताओं पर सवाल भी खड़े करता है।

राज्य बनने से पूर्व व राज्य बनने के बाद भी सरकारों का यही हाल रहा है। पहाड़ की जनता ने सरकारों की इन्हीं नीतियों के चलते पहाड़ी राज्य की मांग की, जिसमें पहाड़ का दर्द झेल रहीं यहां की महिलाओं ने सबसे अधिक संख्या में भागीदारी की। क्योंकि वे समझ रहीं थीं कि राज्य बनेगा तो पहाड़ के विकास की नीति मैदानी क्षेत्र से अलग व पहाड़ के हित में होगी।

महिलाओं का मानना था कि राज्य बनेगा तो उनके पिता, भाई, पति, पुत्र का यहां से पलायन रुकेगा, विकास के नाम पर केवल शराब ही यहां नहीं पिलायी जायेगी, युवाओं को रोजगार के भरपूर अवसर भी मिलेंगे और उनके गांव विकास की ओर बढ़ेंगे व विस्थापन रुकेगा। लेकिन राज्य बनने के बाद यह सब तो नहीं हुआ, पर उन्होंने विकास के नाम पर बढ़ती तबाही, विस्थापन व अपने जल-जंगल तथा जमीन से बढ़ती दूरियां जरूर देखीं। सरकार, नेता, माफिया व लुटेरे पूंजीपति यहां आकर न तो उनके पहाड़ों को इस बेकदरी से लूटते व न ही ऐसी तबाही आती और न आज उन्हें इन पहाड़ों को छोड़ कहीं और बसने के बारे में सोचने को मजबूर होना पड़ता।

उत्तराखंड के विकास के इस मॉडल को तत्काल बदलना होगा। पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में यहां पर्वत व पर्वतवासियों के हित व संरक्षण को ध्यान में रखते हुए राज्य के जल, जंगल, जमीन व अन्य प्राकृतिक संपदाओं पर जनता के अधिकार को मजबूत करते हुए ही राज्य की विकास योजनाओं को बनाना व क्रियान्वित करना होगा। इसके लिए राज्य में किसी भी प्रकार की बड़ी परियोजनाओं को न लगाकर स्थानीय लोगों के स्वामित्व से छोटी परियोजनाओं को विकसित करना होगा, यह राज्य व राष्ट्र के हित में है। यहां की विशिष्ट भौगोलिक-आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए विकास के एक ऐसे नये मॉडल की जरूरत है जिसमें पहाड़ के गांवों में बसने वाले लाखों पहाड़वासियों के हितों को सर्वोपरि रखा जाय, न कि उनको अपनी जड़-जमीन से विस्थापित करने की नौबत आये।

यह भी समझने की बात है कि यह तभी संभव होगा जब गांवों को स्वावलंबी बनाने की सोची जाय और उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार बहाल किया जाय। पहाड़ के जंगल, पानी व जमीन पर उनका अधिकार हो, वन खेती व अपने विकास के लिए छोटी-छोटी परियोजनाएं बनाने का अधिकार उन्हें दिया जाय। लोगों की क्षमता विकास के लिए उन्हें अधिकार संपन्न बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास व कार्य करने की इच्छा शक्ति जब सरकार की होगी, तभी उत्तराखंड का समुचित विकास होगा।

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