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पहाड़ी IAS मंगेश से क्यों डरा खड़िया माफिया

मंगेश घिल्डियाल के मासूम चेहरे और शर्मीले स्वभाव से यह लगता नहीं कि निर्णय लेने में वे इतने सख्त हो सकते हैं। उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब रहता है। जनता के लिए हर हमेशा सुलभ रहने वाले ये आई.ए.एस. अधिकारी आजकल कुमाऊँ-गढ़वाल में जनता के दिलोदिमाग में छाए हुए हैं। उनके तबादले से बागेश्वर में उपजे जबर्दस्त जन आक्रोश के बाद हर कोई उनके बारे में जानने को आतुर है कि आखिर एक अधिकारी जनता के बीच इतना लोकप्रिय कैसे हो जाता होगा ?

जनपद पौड़ी गढ़वाल के तहसील धुमाकोट के टांडियों गाँव में जन्मे मंगेश का बचपन साधारण ढंग से ही बीता। पिता प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। आठवीं तक की पढ़ाई गाँव में करने के बाद वे अपने ताऊ मनोरथ प्रसाद घिल्डियाल के पास देहरादून चले गए। नौवीं से बी.एससी. तक की शिक्षा देहरादून में पूरी की। बी.एससी. में उन्हें स्वर्ण पदक भी मिला। कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से भौतिकी में स्नातकोत्तर परीक्षा और स्वर्ण पदक प्राप्त करने के बाद उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से एम.टेक. किया। इसी दौरान ‘लेजर तकनीक’ पर शोध करने के लिए उन्हें वैज्ञानिक के रूप में नियुक्ति मिल गई। उन्होंने 2010 में पहली बार सिविल सेवा परीक्षा बिना कोचिंग के ही दी। उस वक्त वे काफी दबाव में रहे। सप्ताह में 2-3 दिन 18 से 20 घंटे तक प्रयोगशाला में काम करना पड़ता था। महीने में करीब दो हफ्ते यात्रा में निकल जाते थे। शोध के मॉडलों को लेकर कभी पोखरण तो कभी चाँदीपुरम जाना होता था। परीक्षा में 131वीं रैंक हासिल करने पर उनका चयन पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, हैदराबाद के लिए हो गया। इस बीच वे फिर से सिविल परीक्षा की तैयारी में जुटे रहे। 2011 में मुख्य विषय भौतिकी और भूगोल लेकर वे दूसरी बार सिविल सेवा परीक्षा में प्रविष्ट हुए और चौथा स्थान प्राप्त किया। अपने गृह राज्य के लिए कुछ करने की चाह में उन्होंने अपना कैडर उत्तराखंड चुना। पहली नियुक्ति चमोली में मुख्य विकास अधिकारी के रूप में मिली। उसके बाद में रुड़की में जॉइंट मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात हुए। जिलाधिकारी के पद पर उनकी पहली तैनाती बागेश्वर जिले में हुई।

हालाँकि मंगेश घिल्डियाल खाली बातों में वक्त जाया नहीं करते थे, इसके बावजूद सामान्य से सामान्य व्यक्ति उनसे सीधे संवाद कर सकता था। हर कोई उनसे उनके मोबाइल नंबर पर बात कर सीधे अपनी परेशानियाँ कह सकता था। बागेश्वर में पदभार संभालते ही उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ ही जनता की मूलभूत परेशानियों को दुरुस्त करने का अपना लक्ष्य रखा। उन्होंने रैफरल सेंटर बन चुके अस्पताल के डॉक्टरों के लिये यह अनिवार्य किया कि उचित कारण बताने पर ही बाहर रैफर करें। इससे आम मरीजों का इलाज जिला अस्पताल में होने लगा।

दर्जनों सरकारी स्कूलों में जाकर उन्होंने वहाँ की स्थिति का जायजा लिया और उनकी बदहाली को सुधारने के लिए कई प्रयोग किए। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल भ्रमण कर विकास की मंथर गति पर सम्बन्धित अधिकारियों को आड़े हाथों लिया। कपकोट विधानसभा के झूनी-खलझूनी जैसे सुदूरवर्ती गाँवों, जहाँ पटवारी तक नहीं जाते, तक वे पहुँचे। इससे विभागों में होने वाला भ्रष्टाचार काफी हद तक कम हुआ। उन्होंने मेधावी छात्रों को सिविल परीक्षा देने के लिए स्वयं कोचिंग देने का मन बनाया था, लेकिन राजनैतिक कारणों से उनका स्थानांतरण रुद्रप्रयाग कर दिया गया। बागेश्वर से जाने से पहले वे डिग्री कालेज के प्रधानाचार्य को सिविल परीक्षा से संबंधित अपने नोट्स तथा करीब 150 किताबें दे गए।

उनके स्थानांतरण के विरोध में बागेश्वर की जनता खुलकर सड़कों में आई। बाजार बंद कर स्थानीय विधायक का घेराव किया गया। सोशल मीडिया पर जनपद के दोनों विधायकों पर जम कर भड़ाँस निकाली गई। जनता का कहना था कि कपकोट के विधायक बलवंत सिंह भौर्याल ने मंगेश घिल्डियाल का तबादला करवा कर जनपद के विकास के प्रति अपनी घटिया सोच प्रदर्शित की है। उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी की दो गाडि़यों से शराब और पैसे जब्त किये थे। खडि़या के अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाही की थी। उन्होंने बागेश्वर जनपद की पवित्र नदियों-नालों से सफाई अभियान की शुरूआत की, जो 100 साल से जन प्रतिनिधि नहीं कर सके। इससे जनता का विश्वास अपने निर्वाचित जन- प्रतिनिधियों से उठ गया। निर्वाचित जनप्रतिनिधि एक अधिकारी के सामने बौने दिखाई देने लगे।

जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल के तबादले का विरोध कर रहे आन्दोलनकारियों का कहना था कि जनपद के जनप्रतिनिधि इस बात से खिन्न हैं कि अब जनता उनको नहीं बल्कि हर काम के लिये जिलाधिकारी को पूछने लगी थी। खनन माफिया और खनन माफिया के सरताज स्थानीय विधायक ने चुनाव परिणाम आने के बाद से ही जिलाधिकारी को हटाने के लिये सरकार पर दबाव बनाना प्रारम्भ कर दिया था। कुछ लोगों का कहना था कि जिलाधिकारी को कहीं भी जाकर कभी भी कामकाज देख लेने की आदत थी। उन्होंने सबको टाइट कर रखा था। उनके जाते ही फिर सब पुराने ढर्रे पर आ गये हैं। स्कूलों के टीचर बड़े परेशान थे कि मंगेश साहब पता नहीं कब किस स्कूल में जा धमकेंगे। जब वे धमक जाते तो ऐसे-ऐसे सवाल पूछ देते कि मास्साप लोग ही चकरिया जाते। अब योजनाओं से जुड़े इंजीनियर बाबू, ठेकेदार खुश हैं कि चलो बला कट गयी।

बागेश्वर में आम आदमी जो कभी भी, कहीं पर भी डी.एम. साब से मिल सकता था, इन दिनों उदास है कि धरना, बन्द, जलूस निकाल कर भी उनकी बात उन नेताओं ने नहीं सुनी जो चुनाव के दौरान, दो महीने पहले ही, लोगों के पैर धोते फिर रहे थे। एक विधायक ने लोगों से साफ बोल दिया कि मुख्यमंत्री उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। दूसरे विधायक ने बंद, चक्काजाम, धरने प्रदर्शन को चुनौती देने के अन्दाज में नये डी.एम. का भव्य स्वागत कर डाला कि भाड़ में जायें वे लोग जो मंगेश का तबादला रुकवाने के लिये जोर लगाये हुए थे।

बहरहाल, बागेश्वर का खनन माफिया और जन प्रतिनिधि एड़ी-चोटी का जोर लगा कर मंगेश घिल्डियाल को जिले से बाहर करने में कामयाब हो ही गए। फिलहाल यहाँ पहली महिला जिलाधिकारी रंजना वर्मा ने कार्यभार संभाल लिया है। वे 2010 बैच की आई.ए.एस. हैं। शासन में कई उच्च पदों पर कार्य करने के बाद वे हरिद्वार में मुख्य विकास अधिकारी और रुद्रप्रयाग में जिलाधिकारी रहीं। रुद्रप्रयाग में लगभग छः माह तक काम करने के बाद उन्हें जिलाधिकारी बागेश्वर का दायित्व सौंपा गया है। उनका कहना है कि अधिकारी जब जनता के लिये काम करता है तो जनता भी उसे सहयोग करती है। वे जनता की कसौटी पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करेंगी। मगर रंजना वर्मा का रास्ता आसान नहीं होगा, क्योंकि बागेश्वर की जनता उनके हर काम की तुलना मंगेश घिल्डियाल के कामकाज से करेगी।

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