समाज में महिलाओं के लिए प्रेम सामाजिक बोझ है?

किशोरावस्था और युवावस्था में प्रेम सार्वभौमिक किंतु समाज द्वारा अनपेक्षित और अस्वीकृत रिश्ता है। समर्पण और निष्ठा जैसे मूल्यों पर आधारित होने के कारण ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां स्त्री और पुरूष के बीच गैर-बराबरी का स्तर कम होगा।

अक्सर प्रेम के इस रिश्ते का निर्माण आपसी समझ और भावनात्मक सहयोग जैसे विशेषणों के आधार पर किया जाता है।

क्रमशः यह रिश्ता स्त्री और पुरूष के बीच जैविक संबंधों के चरम की ओर अग्रसर होता है और उसे सामाजिक स्वीकृति के साथ मर्यादा के बांध में बांधा जाता है। ऐसा माना जाता है स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे की गरिमा, वैयक्तिक स्वतंत्रता, निजता और विश्वदृष्टि का सम्मान करेंगे। ऐसा होने के लिए उन्हें सामाजिक जकड़न से मुक्त होना होता है जो एक स्त्री और पुरूष का निर्माण करते हैं। शायद यह जकड़न अब तक ढीली नहीं हो पाई है।

एक महिला मित्र जो किशोरियों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन से जुड़ी हैं, उन्होंने एक घटना साझा की। मुबंई में एक किशोरी अपने मित्र के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहती थी। इस किशोरी का पुरूष मित्र प्रेम के घनिष्ठतम क्षणों में थप्पड़ों की बौछार किया करता था। यह किशोरी इस हिंसक व्यवहार को पुरूष का स्वभाव मानकर झेल लेती थी।

प्रथम दृष्टया यह घटना एक अपवाद लगती है लेकिन जब डेटिंग अब्यूज़ स्टैटिक्स के आंकड़ों को देखते हैं तो इसकी व्यापकता का प्रमाण मिलता है। इसके अनुसार 16 से 24 वर्ष की महिलाओं को अपने पुरूष मित्र या प्रेमी द्वारा सर्वाधिक यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। 16-19 वर्ष की आयु वर्ग में यह 94 प्रतिशत है जबकि 20-24 वर्ष के आयुवर्ग में यह 70 प्रतिशत है।

चेहरे पर तेजाब फेंकना हो, वीडियो बनाकर लीक करना हो, शारीरिक-मानसिक शोषण के बाद संबंध भंग करना हो या लड़की के लिए भययुक्त माहौल बनाना, इन जैसी  घटनाओं के अनगिनत उदाहरण खोजे जा सकते हैं। इस जैसी घटनाओं में लड़के के लिए प्रेम, वासना के स्तर से ऊपर नहीं उठ पाता है जबकि लड़की प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए हिंसा को भी स्वीकार करती है। लड़के के लिए लड़की एक वस्तु है जो उसके संवेगों को संतुष्ट कर रही है, जबकि लड़की ‘प्रेम’ के अपने फैसले को किसी भी कीमत पर गलत सिद्ध नहीं होने देना चाहती।

अन्ततः वह लड़का एक दिन देर रात में उस वस्तु (प्रेयसी) को अपने घर से जबरन निकाल देता है। ऐसा करना उसके हिंसक व्यवहार का चरम है, जो इस मान्यता पर किया जा रहा है कि इसके माध्यम से लड़की के ‘स्व’ (सेल्फ) को सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाई जा सकती है। यहां प्रेम स्त्री-पुरूष के बीच शोषण के अलावा क्या कुछ और रूप ले सका? यदि नहीं तो क्यों? क्योंकि पुरूष और महिला दोनों ही प्रेमी-प्रेयसी बनने के बदले केवल एक पुरूष और महिला के किरदार बन कर रह गए।

प्रेम संबंधों में केवल दैहिकता और यौनिकता का पक्ष ही हावी रहा। क्या हिंसा जन्य शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बीच बने इस रिश्ते को प्रेम की संज्ञा दी जा सकती है?

क्या स्त्री के लिए प्रेम अन्य सामाजिक बोझों की तरह एक बोझ है, जिसे निभाना उसका कर्त्तव्य है? प्रेम और पुरूष के बीच स्त्री का अस्तित्व कहां हैं?

प्रेम में एकाधिकार का रागात्मक पक्ष कब नियंत्रण द्वारा हिंसा में बदल जाता है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पहले उदाहरण की तरह यह हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती बल्कि मानसिक हिंसा और रोज़मर्रा के उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा में प्रकट होती है। प्रेम संबंधों की एक सामान्य प्रवृत्ति यह भी है कि इसमें अनकहे तरीके से वैवाहिक स्थिति के प्रोटोकॉल को अपना लिया जाता है। अर्थात महिला एक प्रेमी के नियंत्रण और निगरानी को वैसे ही स्वीकार कर लेते हैं जैसे वह उसका पति हो।

भारतीय समाज में पति होना, एक खास तरह का पुरूष होना है जो पत्नी के पक्ष में हर निर्णय का अधिकारी होता है। इसी भूमिका में प्रेमी तय करता है कि प्रेमिका क्या पहनेगी? किससे मिलेगी? क्या करेगी? वह बराबर निगरानी करता है कि प्रेमिका किससे बात करती है? कितना देर बात करती है? सोशल मीडिया पर उसके मित्र कौन हैं? आदि।

प्रेम में डूबी स्त्री भी इस नियंत्रण का आलिंगन करती है। उदाहरण के लिए एक बार एक महिला ने साझा किया उसने अपने ‘प्रेम’ को बचाने के लिए पाश्चात्य शैली के वस्त्रों और नृत्य करने के शौक को त्याग दिया, क्योंकि ये बातें ‘उसे’ (प्रेमी) को पसंद नहीं थी। जब इस प्रेम का वास्तविक चेहरा सामने आता है तो प्रेयसी को भी अपने अधिकार, स्वतंत्रता और अस्तित्व का एक बार पुनः बोध होता है।

यदि प्रेयसी में यह बोध जग जाए तो प्रेमी भययुक्त माहौल बनाने में नहीं कतराता। इसके लिए वह प्रेम को समाज में सार्वजनिक करना, अभिभावकों और दोस्तों के बीच अन्तरंगता के प्रमाण प्रस्तुत करने जैसे हथियार अपनाता है। ऐसी स्थिति में स्त्रियों को स्वीकारना होगा कि प्रेम यदि उत्पीड़न बन जाए तो उन्हें उसे भंग करने का अधिकार है।

स्त्री और पुरूष के बीच प्रेम जीवन की स्वाभाविक गति का हिस्सा है। यह ऐसा रिश्ता है जो अपने अस्तित्व को दूसरे के ‘होने’ में तलाशता है। अपने को प्रेमी के साथ एकाकार कर पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। तभी तो प्रेम को ऐसा रिश्ता माना गया है जिसके द्वारा भक्त, ईश्वर के साथ एकाकार हो सकता है। प्रेम की सरसता और दैवीयता असीम आनंद और पूर्णता के लिए है। शायद इसी भाव की सार्वभौमिकता के कारण प्रेम मानव संस्कृति में लोकव्यापी है। इसी कारण प्रेम में निष्ठा और समपर्ण के साथ अधिकार का भाव होता है।

लेकिन भारतीय समाज में स्त्री और पुरूष के बीच प्रेम संबंध में न जाने कैसे एकाधिकार और अधिपति होने का भाव पैदा हो जाता है जिसकी परिणति मानसिक, शारीरिक और यौन हिंसा में होती है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि भावना के धरातल पर हम रूमानियत के साथ रिश्ते की शुरूआत करते हैं और पता ही नहीं चलता कि कब वह रिश्ता पुरूष बनाम स्त्री के संघर्ष में बदल गया। इस संघर्ष में नुकसान का पलड़ा अधिकांशतः महिलाओं के पक्ष में झुका रहता है। मनोवैज्ञानिकों की माने तो हिंसा और उत्पीड़न के तरीके सीखे हुए व्यवहार है। ये व्यवहार व्यक्ति समाज के अवलोकन और अनुकरण से सीखता है। मीडिया जैसे माध्यम इसकी व्याप्ति और स्वीकृति को बढ़ावा देते हैं। इसी कारण पितृसत्तात्मक समाजों के पुरूष जो महिलाओं के प्रति हिंसा को पुरूष के सामान्य व्यवहार का हिंसा मानते हैं, प्रेमी की भूमिका में केवल पुरूष बनकर रह जाते हैं और महिलाएं ऐसी प्रेमिका जिनके लिए प्रेम, रिश्ते का बोझ बन जाता है।

प्रायः पुरूषत्व को ताकत और नियंत्रण के विशेषण से समझा जाता है। यदि यह मान लें कि ये विशेषण पुरूष की विशेषता हैं, तो क्या इनका प्रयोग प्रेयसी या पत्नी के उत्पीड़न के लिए होना चाहिए? या फिर इनका प्रयोग उन पुरूषों और पुरूषोचित मानसिकता के खिलाफ होना चाहिए जो स्त्री को कैद रखने और भोग्या मानने की दृष्टि से प्रेरित हैं?

अब तक इस लेख में पुरूषों की नकारात्मक छवि को प्रस्तुत किया गया है लेकिन एक सकारात्मक और प्रेरणास्पद नोट पर लेख को समाप्त करने के लिए एक आख्यान और साझा करना चाहूंगा। वर्ष 2000 के आसपास एक मित्र ने दूसरे धर्म की लड़की को प्रेयसी के रूप में अपना लिया। उन्होंने इस संबंध को मर्यादा के साथ लगभग 4 वर्षों तक निभाया।

व्यावसायिक जीवन में सफल होने के बाद जब उन्होंने अपने परिवार में विवाह की बात की तो समाज ने उनके प्रेम के अस्तित्व पर करारा प्रहार करते हुए ऐसा माहौल बनाया कि कोई भी भारतीय पुरूष प्रेम के बदले परिवार को प्राथमिकता देते हुए प्रेम और प्रेयसी दोनों को तिलांजलि दे सकता था।

आपने पुरूषोचित व्यवहार का परिचय देते हुए इन दबावों को खारिज किया और कहा कि मैंने अपनी प्रेयसी का हाथ इस विश्वास और वादे के साथ थामा है कि अपने अस्तित्व के अंतिम क्षण तक अपने समर्पण और निष्ठा को कायम रखूंगा। इस भाव के साथ इस पुरूष ने एक महिला के पक्ष में खड़े होकर उसकी अस्मिता, निष्ठा, समर्पण और विश्वास को संबल प्रदान किया। मेरे अनुसार प्रेमी की भूमिका में पुरूष होने की सार्थकता इसी आचरण में है।

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