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हाईकोर्ट ने किया खण्डूरी सरकार के एक आदेश को रद्द

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही पुराने और बेमानी कानूनों को खत्म करने का संकल्प लिया हो लेकिन, उत्तराखण्ड में ठीक इसके उलट हुआ है. उत्तराखण्ड में अंग्रेजों के जमाने का एक कानून खत्म होने के बाद फिर से लागू हो गया है. इस कानून को साल 2011 में सीएम रहते भुवनचन्द्र खण्डूरी ने रद्द किया था लेकिन, लापरवाह नौकरशाही ने इसे जिन्दा होने  का फिर से मौका दे दिया है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संकल्प उत्तराखण्ड में दम तोड़ता नजर आ रहा है. पुराने और बेमानी कानूनों को खत्म करने के पीएम के अभियान को इस हिमालयी राज्य में जबरदस्त झटका लगा है. प्रधानमंत्री खत्म किए जा रहे कानून गिना रहे हैं तो यहां खत्म करने के बाद एक कानून फिर ज़िंदा हो गया है. दरअसल अंग्रेजों ने 1893 में एक कानून बनाकर ऐसी सभी जमीनों को रक्षित वन या प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट घोषित कर दिया गया था जिनकी पैमाइश नहीं हुई थी.

कानून के मुताबिक ऐसी जमीन पर किसी भी विकास कार्य जैसे सड़क,बिजली के खंभे लगाने, पानी की लाइन बिछाने, स्कूल, अस्पताल या पुल बनाने और खनन के लिए केन्द्र सरकार से पहले अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया था. दिक्कतें तब शुरू हुईं जब आबादी बढ़ती गई. अनुमति मिलने में लेटलतीफी से विकास कार्य प्रभावित होने लगे. लिहाजा 2011 में भुवनचन्द्र खण्डूरी के सीएम बनने के तुरंत बाद इस कानून को कैबिनेट की मुहर लगाकर खत्म कर दिया गया.

छह साल तक मुर्दा पड़ा रहने के बाद यह कानून फिर से उठ खड़ा हुआ और लागू हो गया है. नैनीताल हाईकोर्ट ने भुवन चन्द्र खण्डूरी सरकार के उस आदेश को ही खारिज कर दिया है जिसके तहत 1893 के अंग्रेजों के कानून को खत्म किया गया था. बीते 26 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार को ऐसा करने से पहले केन्द्र सरकार की अनुमति लेनी चाहिए थी. उत्तराखण्ड के प्रमुख वन संरक्षक राजेन्द्र कुमार ने NTI को बताया कि चूंकि हाईकोर्ट ने 2011 के खण्डूरी सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दिया है लिहाजा अब रक्षित वन घोषित की गई ज़मीन पर किसी भी विकास कार्य के लिए भारत सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी.

नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा खण्डूरी सरकार के आदेश को रद्द किए जाने के बाद साल 2011 से पहले की स्थिति बहाल हो गई है. लिहाजा रक्षित वन की जमीन पर किसी भी विकास कार्य के लिए अब फिर से भारत सरकार की पहले अनुमति लेना अनिवार्य हो गया है. हैरान करने वाली बात तो नैनीताल हाईकोर्ट ने अपना फैसला डेढ़ महीने पहले ही 26 अक्टूबर को सुना दिया था लेकिन, आज तक वन विभाग से लेकर शासन तक के अफसरों को इसकी जानकारी ही नहीं है.

जब NTI ने वन विभाग और शासन के अफसरों को इसकी जानकारी दी तब हचलच शुरू हुई. चौंकाने वाली बात यह भी है कि डेढ़ महीना बीतने के बावजूद अभी तक इस मामले में सरकार या शासन की तरफ से कोई भी पहल नहीं हुई है. यह तक नहीं सोचा गया है कि नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए या नहीं. वन और पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉक्टर रणवीर सिंह को भी NTI ने ही जानकारी दी. उन्होंने बस इतना कहा कि इस मामले का अध्ययन करने के बाद ही वे कुछ बोल पायेंगे. समझना असान है कि जिस फैसले को लेकर कभी उत्तराखण्ड की सरकार बेहद उत्साहित थी उसके पलटे जाने के बाद जिम्मेदार अफसर कितना सुस्त रवैया अपनाए हुए हैं. प्रदेश के वन विभाग के मुखिया प्रमुख वन संरक्षक राजेन्द्र कुमार ने तो इस मामले से अपना पल्ला ही झाड़ लिया. कुमार ने NTI को बताय़ा कि जिस जमीन को लेकर यह आदेश है वह राजस्व विभाग के अंतर्गत है. लिहाजा हाईकोर्ट के फैसले के बाद क्या करना है ये राजस्व विभाग ही तय करेगा.

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